सचिवालय पर तिरंगा फहराते शहीद हुए थे सतीश झा: 11 अगस्त 1942 को प्राण न्योछावर किए, बांका के खड़हारा गांव में सुरक्षित हैं यादें - Banka News

Published on 15 अग॰ 2026

बांका के बाराहाट प्रखंड स्थित खड़हारा गांव के शहीद सतीश चंद्र झा की यादें आज भी उनके पुश्तैनी घर में सुरक्षित हैं। सतीश चंद्र झा ने 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के दौरान देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।

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हालांकि, उनके नाम पर बना गांव का प्रवेश द्वार जर्जर हो चुका है और ढाकामोड़ स्थित उनकी प्रतिमा के आसपास सौंदर्यीकरण का कार्य अपेक्षित है।

अंग्रेजों के तंबू में लगाई थी आग

सतीश चंद्र झा की प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में पांचवीं कक्षा तक हुई थी। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना प्रबल थी। ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने गांव के पास अंग्रेजों के तंबू में आग लगाने जैसी घटना को भी अंजाम दिया था।

बाद में, पिता के साथ मुंगेर में रहते हुए वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। पटना कॉलेजिएट हाई स्कूल में 11वीं के छात्र के रूप में उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।

शहीद सतीश चंद्र झा के छोटे भाई गोपीकांत झा की दूसरी पीढ़ी आज भी उनके पुश्तैनी घर में निवास कर रही है। उनके भतीजे माहेश्वरी झा गांव में एक छोटी किराना दुकान चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं।

पूरा परिवार बलिदान के लिए तैयार

परिवार के एक सदस्य राजस्थान में निजी नौकरी करते हैं, जबकि दूसरे शिक्षा विभाग से क्लर्क पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। परिवार के लिए शहीद सतीश चंद्र झा की विरासत आज भी सबसे बड़ी पूंजी है।

माहेश्वरी झा ने बताया कि उनके पिता बचपन से ही सतीश चंद्र झा के साहस और देशभक्ति की कहानियां सुनाया करते थे। उन्होंने यह भी कहा कि परिवार को सरकार से किसी विशेष सुविधा की अपेक्षा नहीं है। उन्हें अपने चाचा की शहादत पर गर्व है और देश के लिए आवश्यकता पड़ने पर पूरा परिवार किसी भी बलिदान के लिए तैयार है।

गांव के बुजुर्ग जटाशंकर झा के अनुसार, बाराहाट रेलवे स्टेशन का नाम शहीद सतीश चंद्र झा के नाम पर रखने की मांग वर्षों से लंबित है। इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है।

गांव के प्रवेश द्वार की हालत जर्जर है। ढाकामोड़ में स्थापित शहीद की प्रतिमा के आसपास भी समुचित विकास नहीं हुआ है।

गाथाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना श्रद्धांजलि

ग्रामीणों का कहना है कि शहीदों का सम्मान केवल जयंती, पुण्यतिथि या समारोहों में माल्यार्पण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनके स्मारकों का संरक्षण और उनकी गाथाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

खड़हारा के लोग चाहते हैं कि शहीद सतीश चंद्र झा की स्मृतियों को संरक्षित कर गांव को उनके त्याग और देशभक्ति की प्रेरणा का केंद्र बनाया जाए।