भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 28 सितंबर को भारी बिकवाली देखने को मिली। ग्लोबल बाजारों से मिले कमजोर संकेत, कच्चे तेल की बढ़ती कीमत और अमेरिका में बॉन्ड यील्ड के ऊंचे स्तर ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। इसका असर घरेलू बाजार पर साफ नजर आया और सेंसेक्स तथा निफ्टी दोनों में 1.5% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई।
कारोबार के अंत में BSE सेंसेक्स 1,124.02 अंक यानी 1.52% टूटकर 72,771.72 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि Nifty 50 में 360.25 अंक यानी 1.56% की गिरावट रही और यह 22,780.25 पर बंद हुआ। दोनों प्रमुख इंडेक्स करीब छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गए।
बैंकिंग शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव
सोमवार की बिकवाली का असर लगभग पूरे बाजार में देखने को मिला। बैंकिंग और दूसरे प्रमुख सेक्टरों के शेयरों में दबाव रहा। निफ्टी PSU Bank इंडेक्स में 3% से ज्यादा की गिरावट आई, जबकि मेटल, ऑयल एंड गैस, रियल्टी और ऑटो सेक्टर भी दबाव में रहे।
सेंसेक्स के ज्यादातर शेयरों में गिरावट रही और बाजार की कमजोरी व्यापक रही। निवेशकों की नजर खास तौर पर कच्चे तेल, रुपये की चाल और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड पर बनी हुई है।
निवेशकों की वेल्थ 7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा घटी
बाजार में तेज बिकवाली का सीधा असर BSE में लिस्टेड कंपनियों के कुल मार्केट कैप पर पड़ा। शुक्रवार के कारोबार के अंत में यह करीब ₹482 लाख करोड़ था, जो सोमवार की गिरावट के बाद करीब ₹475 लाख करोड़ के आसपास आ गया। यानी एक ही कारोबारी दिन में करीब ₹7 लाख करोड़ की मार्केट वैल्यू कम हुई।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि निवेशकों ने वास्तव में इतनी रकम कैश में गंवा दी। शेयर की कीमत गिरने से पोर्टफोलियो की मौजूदा वैल्यू कम हो जाती है। इसे आम तौर पर कागजी या अनरियलाइज्ड लॉस कहा जाता है।
एक आसान उदाहरण से समझिए
मान लीजिए राम कुमार ने किसी कंपनी के 10 शेयर ₹10 हजार में खरीदे। बाजार में गिरावट के बाद उन्हीं शेयरों की मौजूदा कीमत घटकर ₹8 हजार रह गई।
अगर राम कुमार ने शेयर बेचे नहीं हैं, तो ₹2 हजार का नुकसान अभी बुक नहीं हुआ है। भविष्य में अगर शेयर की कीमत दोबारा बढ़ती है तो पोर्टफोलियो की वैल्यू भी बढ़ सकती है। वहीं, अगर वह ₹8 हजार की कीमत पर शेयर बेच देता है, तब ₹2 हजार का नुकसान वास्तविक यानी रियलाइज्ड लॉस बन जाएगा।
बाजार में गिरावट की 3 बड़ी वजह
1. अमेरिका-ईरान तनाव और महंगा कच्चा तेल
ग्लोबल मार्केट सेंटीमेंट पर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का असर बना हुआ है। 28 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब $106–107 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है। इससे रुपये पर दबाव और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है। यही वजह है कि महंगे क्रूड को भारतीय शेयर बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम माना जा रहा है।
2. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में भी तेजी बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। 28 सितंबर को अमेरिकी 10-year Treasury yield 5.2% से ऊपर कारोबार कर रही थी और रिपोर्टों के मुताबिक यह करीब दो दशक के ऊंचे स्तरों में पहुंच गई थी।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर अमेरिकी परिसंपत्तियों में निवेश का आकर्षण बढ़ सकता है। ऐसे माहौल में विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालने या निवेश कम करने पर विचार कर सकते हैं। भारतीय बाजार में हालिया FII आउटफ्लो भी निवेशकों की चिंता बढ़ाने वाले फैक्टर्स में शामिल रहा है।
3. विदेशी निवेशकों की बिकवाली
भारतीय शेयर बाजार पर विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव भी बना हुआ है। 28 सितंबर को उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने करीब ₹3,694 करोड़ की बिकवाली की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब ₹2,838 करोड़ की खरीदारी की।
यानी घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी के बावजूद विदेशी फंड की बिकवाली बाजार पर दबाव बनाए हुए है।
पिछले हफ्ते भी बाजार में रही थी गिरावट
सोमवार की तेज गिरावट से पहले भारतीय शेयर बाजार लगातार सातवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ था। 25 सितंबर को खत्म हुए सप्ताह में Nifty 50 करीब 0.9% और सेंसेक्स करीब 0.5% नीचे रहा था। ऊंचे क्रूड प्राइस, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी को बाजार पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारणों में गिना गया था।
अब आगे बाजार की नजर किन चीजों पर रहेगी?
आने वाले कारोबारी दिनों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमत, अमेरिका-ईरान तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, रुपये की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर रहेगी।
अगर क्रूड की कीमतों में तेजी जारी रहती है और वैश्विक बॉन्ड यील्ड ऊंची बनी रहती है, तो बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। वहीं, भू-राजनीतिक तनाव कम होने और तेल की कीमतों में नरमी आने पर बाजार की धारणा में बदलाव देखने को मिल सकता है।
इसलिए मौजूदा बाजार में केवल सेंसेक्स या निफ्टी की एक दिन की गिरावट देखने के बजाय ग्लोबल संकेतों, सेक्टरवार प्रदर्शन और विदेशी-घरेलू निवेश प्रवाह पर नजर रखना महत्वपूर्ण रहेगा।