हरियाणा मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी द्वारा आमजन की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए प्रदेश के शहरी निकायों में गठित की गई 1646 वार्ड समितियों के अस्तित्व पर बड़ा कानूनी और संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वकील और नगर-निकाय कानूनों के जानकार हेमंत कुमार ने प्रदेश की सभी 87 नगर पालिकाओं/निकायों में गठित इन वार्ड कमेटियों को गैर-कानूनी और असंवैधानिक करार देते हुए हरियाणा सरकार के शहरी स्थानीय निकाय विभाग के आयुक्त, सचिव और महानिदेशक को कानूनी नोटिस भेजा है।

विवाद के 3 बड़े कारण…
- नगर निगमों पर लागू ही नहीं होता 2008 का कानून: सरकार ने 2008 के 'हरियाणा म्युनिसिपल सिटिजन्स पार्टिसिपेशन एक्ट' को आधार बनाकर कमेटियां बनाई हैं। लेकिन इस कानून की धारा 2(G) केवल 1973 के एक्ट वाली नगर परिषदों और नगरपालिकाओं पर लागू होती है। प्रदेश के 11 नगर निगम 1994 के कानून के तहत बने हैं, इसलिए 2008 का कानून उन पर लागू ही नहीं होता।
- निगम सदनों के पास गठन का अधिकार ही नहीं: 1994 के नगर निगम कानून की धारा 10 के अनुसार, निगमों में वार्ड कमेटियां गठित करने का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास है, न कि मेयर, निगम सदन या कमिश्नर के पास। इसलिए सदनों द्वारा खुद कमेटियां बनाना सीधा-सीधा अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है।
- संविधान के अनुच्छेद 243(S) का उल्लंघन: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243(S) के तहत वार्ड समितियां केवल वहीं बनाई जा सकती हैं जहां की आबादी 3 लाख या उससे अधिक हो। हरियाणा के 1973 के कानून के अनुसार किसी भी नगर परिषद (आबादी 50 हजार से 3 लाख) और नगरपालिका समिति (आबादी 50 हजार तक) की जनसंख्या 3 लाख नहीं है। ऐसे में प्रदेश की सभी 76 नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में वार्ड समितियां बनाना पूरी तरह असंवैधानिक है।
केवल निगमों को मिल सकती है राहत
एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार, यदि राज्य सरकार विधानसभा में संशोधन लाकर 2008 के कानून की धारा 2(G) में 'नगर निगमों' को शामिल कर ले और 1994 के कानून की धारा 10 में संशोधन करके गठन का अधिकार निगम सदनों को दे दे, तो केवल 11 नगर निगमों की वार्ड कमेटियों को कानूनी वैधता मिल सकती है।
प्रदेश की 76 नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में बनी कमेटियों को राज्य सरकार संशोधन करके भी वैध नहीं ठहरा सकती, क्योंकि संविधान का 3 लाख की आबादी वाला नियम राज्य के किसी भी कानून से ऊपर है। यदि सरकार ने इन कमेटियों को रद्द नहीं किया, तो इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।