देश की सबसे लंबी जल सुरंग: 17 साल बाद पूरा होने जा रहा MP का ड्रीम प्रोजेक्ट, 1450 गांवों तक पहुंचेगा नर्मदा का पानी - Haribhoomi

Published on 16 जुल॰ 2026

Sleemanabad Water Tunnel: मध्यप्रदेश की स्लीमनाबाद जल सुरंग परियोजना अंतिम चरण में है। 17 साल बाद तैयार हो रही देश की सबसे लंबी जल सुरंग से 1450 गांवों की 2.45 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई का लाभ मिलेगा।

Sleemanabad Water Tunnel

स्लीमनाबाद जल सुरंग परियोजना: देश की सबसे लंबी जल सुरंग

  • Published: 16 Jul 2026, 07:57 PM IST
  • Last Updated: 16 Jul 2026, 07:57 PM IST

Sleemanabad Water Tunnel: मध्यप्रदेश की बहुप्रतीक्षित स्लीमनाबाद जल-सुरंग परियोजना अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। करीब 17 साल बाद देश की सबसे लंबी और तकनीकी रूप से जटिल इस जल सुरंग का सपना साकार होने जा रहा है। कटनी जिले में बनी लगभग 12 किलोमीटर लंबी यह सुरंग नर्मदा का पानी गुरुत्वाकर्षण के जरिए विंध्य और महाकौशल क्षेत्र के करीब 1450 गांवों तक पहुंचाएगी, जिससे 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को स्थायी सिंचाई का लाभ मिलेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शुक्रवार को परियोजना का निरीक्षण करेंगे।

जानकारी के अनुसार, कटनी जिले में नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा निर्मित की जा रही देश की सबसे लंबी और सबसे जटिल जल-सुरंग , यानी स्लीमनाबाद टनल, अब अपनी पूर्णता की ओर है। 11.952 किलोमीटर लंबी महा-सुरंग का काम लगभग पूरा हो चुका है, जिसमें अब मात्र अंतिम एक मीटर का ब्रेक-थ्रू सफर शेष रह गया है।

यह जल-सुरंग केवल कंक्रीट और पत्थरों को जोड़कर बनाई गई कोई यांत्रिक संरचना नहीं है, बल्कि यह सदियों पुराने एक पौराणिक विरह को मिटाने वाला पवित्र महासेतु है। लोक मान्यताओं के अनुसार, अमरकंटक के मैकल पर्वतों से निकलने वाली मां नर्मदा और सोनभद्र विपरीत दिशाओं में बहकर हमेशा के लिए एक-दूसरे से दूर चले गए थे। प्रोजेक्ट के चलते विंध्य पर्वतमाला से अमृत-धारा सीधे सोन नदी के कछार में मिलने के लिए आतुर खड़ी है।

असंभव को कर दिखाया संभव
तकनीकी रूप से विंध्य की 40 मीटर ऊंची रिज लाइन को भेदना पूरी दुनिया के इंजीनियरों के लिए एक स्वप्न जैसा था। जमीन से लगभग 30 मीटर नीचे चल रहे इस महा-अभियान में मार्बल-लाइमस्टोन की चमकती कठोरता, डोलोमाइट की दृढ़ता और पानी में घुली चूने की विशालकाय भूमिगत गुफाओं ने हर कदम पर रास्ता रोका। 

टनल के भीतर प्रति मिनट 25 हजार लीटर तक उफनते पानी के रिसाव और अचानक धंसने वाली मिट्टी जैसी विकट परिस्थितियों में जब पूर्व में काम कर रही अमेरिकी मशीन भी टूटकर पस्त हो गई, तब अत्याधुनिक जर्मन हेरेनकनेक्ट मशीन और विशेष टेम ग्राउटिंग तकनीक को युद्धस्तर पर उतारा गया। यह मध्यप्रदेश सरकार की संवेदनशीलता ही थी कि, घनी आबादी, राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे ट्रैक के ठीक नीचे से गुजरने के बावजूद इस टनल को बिना किसी क्षति के पूरी सुरक्षा के साथ पूर्ण कर लिया गया।

विश्व स्तरीय निर्माण तकनीक
इस टर्न-की (Turn-key) आधार पर स्वीकृत महा-परियोजना को धरातल पर उतारने का जिम्मा हैदराबाद की प्रतिष्ठित निर्माण एजेंसी मेसर्स पटेल-एस.ई.डब्ल्यू. (संयुक्त उपक्रम) को सौंपा गया था। वर्ष 2008 में जब इस विशाल परियोजना का अनुबंध हुआ था, तब इसकी शुरुआती लागत 799 करोड़ रुपये थी। 

अब तक 1610.47 करोड़ रुपये हुए खर्च
हालांकि, विंध्य के भू-गर्भ की अप्रत्याशित और असाधारण भौगोलिक बाधाओं, अभूतपूर्व जल रिसाव को रोकने के लिए किए गए विशेष प्रयासों और वैश्विक तकनीक के समावेश के कारण इस पर अब तक कुल 1610.47 करोड़ रुपये का व्यय किया जा चुका है। 

इस कुल व्यय में जहां मूल कार्यमद पर 772.33 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, वहीं समय के साथ हुए मूल्य समायोजन पर 573.71 करोड़ रुपये, उच्च क्षमता के आधुनिक डीवॉटरिंग सिस्टम पर 123.99 करोड़ रुपये, वर्टिकल शाफ्ट के निर्माण पर 19.36 करोड़ रुपये और चट्टानों के स्थिरीकरण के लिए की गई केमिकल ग्राउटिंग पर 121.08 करोड़ रुपये की राशि व्यय की गई है।

भौतिक प्रगति के नये कीर्तमान और शत-प्रतिशत पूर्णता
सरकार की इसी अनवरत वित्तीय और तकनीकी मदद का सुखद परिणाम है कि आज इस पूरे अनुबंध का 96.66 प्रतिशत भौतिक कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किया जा चुका है। परियोजना के तहत आने वाली 12.135 किलोमीटर लंबी ओपन कट नहर और 11.952 किलोमीटर लंबी मुख्य ऐतिहासिक जल-सुरंग का भौतिक निर्माण शत-प्रतिशत पूरा हो चुका है। 

वहीं, कट एंड कवर तकनीक से बनाई जा रही 0.913 किलोमीटर नहर का भी 0.725 किलोमीटर हिस्सा पूरा कर लिया गया है और अब केवल नाममात्र का 0.188 किलोमीटर का काम शेष है, जिसे अंतिम लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ाया जा रहा है।

विंध्य और महाकौशल के 5 जिलों में समृद्धि
यह विशाल जल-सुरंग देश की पहली ऐसी इंजीनियरिंग मिसाल बनने जा रही है, जहां 10.14 मीटर व्यास की टनल से लाखों क्यूसेक नर्मदा जल बिना किसी बिजली या भारी पंपों के, केवल प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण यानी ग्रेविटी फ्लो के सहारे बहेगा। बरगी दायीं तट मुख्य नहर के माध्यम से जबलपुर, कटनी, सतना, मैहर, रीवा और पन्ना जिलों के लगभग 1450 गांवों की 2 लाख 45 हजार हैक्टेयर भूमि हमेशा के लिए सिंचित हो जाएगी। 

टनल के क्रियाशील होते ही इसके सीधे कमांड क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कटनी जिले की 21 हजार 823 हैक्टेयर, मैहर जिले की 54 हजार 227 हैक्टेयर, सतना जिले की 1 लाख 4 हजार 970 हैक्टेयर, रीवा जिले की 3 हजार 84 हैक्टेयर और पन्ना जिले की 448 हैक्टेयर सूखी भूमि को हरा-भरा जीवन मिल जाएगा।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव के मार्गदर्शन में टनल के बाद के सभी आठ ग्रुपों का काम इस समय पूरी ताकत से चल रहा है। इस सजग मॉनिटरिंग के चलते मार्च 2026 तक ही 44 हजार 160 हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता को धरातल पर उतारकर किसानों को लाभान्वित करना शुरू कर दिया गया है। राज्य सरकार ने इसके बाद का भी पूरा रोडमैप तैयार कर लिया है, जिसके तहत दिसंबर 2026 तक 87 हजार 433 हेक्टेयर और दिसंबर 2027 तक कुल 1 लाख 54 हजार 693 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की पूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित कर ली जाएगी।