5 नवंबर 2009, दोपहर 1 बजे। अमेरिका के टेक्सस प्रांत का फोर्ट हूड मिलिट्री बेस। अमेरिकी मेजर निदाल हसन ने दो पिस्टल निकालीं और वहां मौजूद सैनिकों पर गोलियां बरसाने लगा। 13 लोग मारे गए और 32 घायल हुए।
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अब 17 साल बाद निदाल हसन को मौत दी जाएगी। ठीक उसी जगह, उसी वक्त। अमेरिकी सेना इसका लाइव टेलीकास्ट पूरी दुनिया को दिखाएगी।
आखिर कौन है निदाल हसन, उसने अपने ही साथियों की हत्या क्यों की और अमेरिका लाइव टीवी पर उसकी सजा-ए-मौत क्यों दिखाना चाहता है; पूरी कहानी आज के एक्सप्लेनर में...
सवाल-1: कौन है निदाल हसन? जवाब: 56 साल के निदाल मलिक हसन की पैदाइश अमेरिका के वर्जीनिया राज्य की है। माता-पिता फिलिस्तीनी मूल के थे और येरुसलम के पास एक छोटे से कस्बे से अमेरिका आए थे।
निदाल ने 1995 में ग्रेजुएशन के दौरान अमेरिका के रिजर्व ऑफिसर्स ट्रेनिंग कॉर्प्स में ट्रेनिंग ली। इसके बाद घर वालों की मर्जी के खिलाफ अमेरिकी सेना जॉइन कर ली। 2003 में मनोचिकित्सा की डिग्री ली और 2005 में मेडिकल लाइसेंस मिल गया।
निदाल वाशिंगटन के आर्मी मेडिकल सेंटर में तैनात था, जहां जंग से लौटे मानसिक बीमार सैनिकों का इलाज करने लगा।

मई 2009 में निदाल अमेरिकी सेना में मेजर बना और जुलाई में उसे फोर्ट हूड भेज दिया गया था। ये 2007 की तस्वीर है।
अमेरिकी जांच एजेंसी FBI के पूर्व डायरेक्टर विलियम वेब्स्टर की अगुवाई में हुई जांच के मुताबिक, 5 नवंबर 2009 को दोपहर करीब 1 बजे निदाल फोर्ट हूड बेस के मेडिकल फैसिलिटी सेंटर पहुंचा। एक डेस्क पर चढ़ा और धार्मिक नारा लगाने के बाद दोनों पिस्टलों से गोलियां चलाना शुरू कर दिया। उसने बाहर पार्किंग की तरफ भाग रहे सैनिकों की पीठ पर भी गोलियां चलाईं। 12 अमेरिकी सैनिक और अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट का एक कर्मचारी मारा गया और 32 अन्य लोग घायल हुए।

निदाल को रोकने के लिए बिल्डिंग की तरफ बढ़ते अमेरिकी पुलिस के जवान।
एक पुलिस जवान की जवाबी फायरिंग में निदाल भी घायल हो गया था। पैरालिसिस के चलते निदाल तब से व्हीलचेयर पर है।
जांच में पता चला कि निदाल ने हफ्तों हमले की तैयारी की। उसने पिस्तौल को तेजी से रिलोड करना सीखा था। कुछ जवानों ने बाद में बताया कि वो इतनी तेज मैगजीन रीलोड कर रहा था कि उसको रोकना लगभग नामुमकिन था। बिल्डिंग के अंदर से 146 खाली कारतूस मिले थे। इसके बावजूद निदाल के पास 177 जिंदा कारतूस बाकी थे।
28 अगस्त 2013 को अमेरिकी सैन्य कोर्ट ने निदाल को दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई। मुकदमे की सुनवाई के दौरान निदाल ने न ही अपने पक्ष में कोई गवाह पेश किया और न आरोपों से बचने की कोशिश की। कोर्ट से उसे जो वकील मिले, उन्होंने बताया कि निदाल मौत की सजा चाहता था।
2 अक्टूबर 2026 को अमेरिकी डिफेंस सेक्रेट्री पीट हेगसेथ की सिफारिश पर ट्रम्प ने निदाल की सजा को मंजूरी दी। 3 दिसंबर को अमेरिकी सेना का फायरिंग स्क्वाड उसे गोली मारकर मौत की सजा देगा। इसे लाइव दिखाया जाएगा।
सवाल-2: आखिर निदाल ने 13 जवानों की हत्या क्यों की थी? जवाब: अमेरिका के मैरीलैंड के इमाम फैजुल खान के मुताबिक, निदाल धार्मिक प्रवृत्ति का था। वाशिंगटन में रहने के दौरान निदाल रोजाना मस्जिद में नमाज अदा करने जाता था।
हमले से करीब एक साल पहले 17 दिसंबर 2008 को निदाल ने एक कट्टरपंथी मौलवी अनवर अल-अवलाकी से ईमेल के जरिए संपर्क किया। औलाकी अमेरिका के खिलाफ हिंसक जिहाद का समर्थन करता था। जब FBI को इसका पता चला, तो उसने निदाल की जांच शुरू की। फिर अमेरिका की जॉइंट टेररिज्म टास्क फोर्स, JTTF ने रिकॉर्ड किया कि 1 जनवरी 2009 से लेकर 16 जून तक 17 बार ईमेल के जरिए मौलवी से बात की। औलाकी ने भी 2 ईमेल किए।
इसके बाद सेना की जांच एजेंसी ने निदाल से पूछताछ की, लेकिन इससे ये नहीं तय हो सका कि वो किसी आतंकी गतिविधि में शामिल था या किसी आतंकी संगठन के संपर्क में था।

अल-कायदा का टॉप रिक्रूटर अनवर अल-अवलाकी, यमनी मूल का अमेरिकी था। 2011 में अमेरिका ने यमन में एक ड्रोन अटैक में अल-अवलाकी को मार दिया था।
15 जुलाई को हसन को फोर्ट हूड में तैनात कर दिया गया। अक्टूबर में तय हुआ कि हसन को अगले महीने अफगानिस्तान भेजा जाएगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वो नहीं चाहता था कि अमेरिकी सैनिकों को इराक और अफगानिस्तान में मुसलमानों से लड़ने भेजा जाए।
उसके एक सहकर्मी के मुताबिक, 'निदाल कहता था कि मुसलमानों को हमलावरों के खिलाफ लड़ना चाहिए। हमें लगा कि वह चाहता है कि इराक, अफगानिस्तान के मुसलमान अमेरिकी सेना की मदद करें, लेकिन ऐसा नहीं था।'
रिपोर्ट्स के मुताबिक, निदाल ओसामा बिन लादेन का बचाव करता था और कहता था कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की जंग, असल में इस्लाम के खिलाफ जंग है।
हालांकि घटना के बाद निदाल के चचेरे भाई नादेर हसन ने कहा कि उसे अपनी मिडिल-ईस्ट की पहचान के चलते सेना में उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और वह सेना छोड़ना चाहता था।
नादेर के मुताबिक, 'निदाल ने सरकार को पैसा वापस करके सेना से बाहर निकलने के लिए एक सैन्य वकील रखा था। वो हर संभव कोशिश कर रहा था। मुझे नहीं लगता कि वो सेना में काम नहीं करना चाहता था। घटना उसके उत्पीड़न के चलते हुई थी।'

निदाल ने 2024 में सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, लेकिन पिछले साल ये अपील खारिज हो गई है।
सवाल-3: अमेरिका निदाल की सजा लाइव क्यों दिखाने वाला है? जवाब: US आर्मी के सेक्रेटरी एडम टेले ने निदाल की सजा की तारीख 3 दिसंबर और समय दोपहर का 1 बजे तय किया है।
8 अक्टूबर को पीट हेगसेथ ने कहा है, 'वर्दी में एक इस्लामी कट्टरपंथी ने सैनिकों पर हमला किया था। इसलिए उसे सैनिकों की ही फायरिंग स्क्वाड मार गिराएगी। ऐसा ही होना चाहिए और हम ये तय करेंगे कि लोग इसे देख सकें। इसे पब्लिक किया जाएगा। लोगों को ये समझने की जरूरत है कि ऐसी चीजों के परिणाम गंभीर होते हैं।'
जब हेगसथ से पूछा गया कि क्या निदाल ने कोई और आखिरी याचिका दी है, तो उन्होंने कहा, 'मुझे इसकी परवाह नहीं है। हम उससे 3 दिसंबर को ही मिलेंगे।'
90 साल पहले अमेरिका में आखिरी बार 14 अगस्त 1936 को केंटकी प्रांत में 22 साल के अश्वेत युवक रैनी बेथिया को खुलेआम मौत की सजा दी गई थी। उस पर 70 साल की एक बुजुर्ग श्वेत महिला के बलात्कार का आरोप था।

बेथिया के मुंह पर काला कपड़ा डालकर फांसी दी गई थी, जिसे देखने 20 हजार लोगों की भीड़ जुटी थी।
अमेरिकी सेना में किसी जवान को आखिरी बार 65 साल पहले 1961 में मौत की सजा दी गई थी। जॉन बेनेट नाम के जवान को फायरिंग स्क्वाड ने गोली मारी थी।
ट्रम्प के दौर में अमेरिका में मौत की सजाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। ऑस्ट्रेलिया के सीनियर कॉलमिस्ट पॉल डेली कहते हैं, 'दुनिया ट्रम्प के भयानक अहंकार की इतनी आदी हो चुकी है कि कोई अचंभा नहीं होता। अब पहली बार एंटरटेनमेंट के बतौर मौत की सजा तय की गई है। दुनिया का कथित रूप से सबसे महान लोकतांत्रिक देश नैतिक रूप से डरावने स्तर तक गिर गया है।'
थिंक टैंक ORF के सीनियर फेलो सुशांत सरीन कहते हैं, ‘अमेरिका ISIS के रास्ते पर चल रहा है। पहले वे तालिबान की सार्वजनिक फांसी की आलोचना करते थे और अब उससे भी आगे निकल गए हैं।’
सवाल-4: अमेरिका में मृत्युदंड के कितने तरीके, ट्रम्प के दौर में कितनी बढ़ोत्तरी हुई? जवाब: अमेरिका में ज्यादातर मामलों में मौत की सजा का तरीका राज्य तय करते हैं। 50 राज्यों में से 27 राज्य, अमेरिकी सेना और फेडरल गवर्नमेंट भी मौत की सजा देती है। हालांकि 2020 में ट्रम्प के कार्यकाल से पहले फेडरल गवर्नमेंट ने 20 साल से मौत की सजा पर बैन लगाया हुआ था।
2020 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रम्प ने बैन हटाया और शुरुआती 6 महीने में ही 13 लोगों को फांसी की सजा दी। ट्रम्प ने कहा था, 'अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ सबसे जघन्य अपराध और हिंसा को रोकने के लिए मौत की सजा सबसे जरूरी टूल है।'
फिर बाइडेन के दौर में फेडरल गवर्नमेंट ने मौत की सजा पर दोबारा रोक लगा दी, लेकिन 2025 में ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन मौत की सजा को दोबारा बहाल कर दिया।
फेडरल सरकार फांसी के अलावा गोली मारकर, बिजली का झटका देकर या फिर जहरीली गैस के जरिए मौत की सजा देती है। पहले जहरीले इंजेक्शन भी दिए जाते थे।
फिलहाल अमेरिका में 5 राज्य- इडाहो, मिसिसिपी, ओक्लाहोमा, साउथ कैरोलिना और यूटा में गोली मारकर मौत की सजा दी जाती है। 15 सालों में पहली बार पिछले साल साउथ कैरोलिना में एक दोषी को गोली मारी गई।
हालांकि अब तक ट्रम्प के कार्यकाल में फेडरल गवर्नमेंट ने एक भी मौत की सजा नहीं दी है, लेकिन राज्यों में 2024 में 25 के मुकाबले 2025 में 47 दोषियों को मृत्युदंड दिया गया। 2026 में अब तक ये संख्या 19 है।

अमेरिका के फायरिंग स्क्वाड में दो से तीन प्रशिक्षित जवान होते हैं, जो स्कोप लगी राइफल से दोषी के दिल में गोली मारते हैं। दोषी को इस तरह की कुर्सी पर बैठाया जाता है।
सवाल-5: क्या दुनिया में और भी कहीं सरेआम मौत की सजा दी जाती है? जवाब: फिलहाल पूरी दुनिया में सिर्फ तीन देश- ईरान, अफगानिस्तान और नॉर्थ कोरिया में सरेआम लोगों को मौत की सजा दी जाती है...
- ईरान में बीच सड़क पर क्रेन से लटकाकर फांसी लगाते हैं। 2025 में कम से कम 11 लोगों को फांसी पर लटकाया गया।
- अफगानिस्तान में तालिबानी लड़ाके मैदान में खड़ा करके गोली मारते हैं। 2025 में कम से कम 6 लोगों को मारा गया।
- नॉर्थ कोरिया में तानाशाह किम जोंग के आदेश पर सार्वजनिक फांसी दी जाती है।
पहले सऊदी अरब में भी गंभीर अपराधों में सिर कलम करके मौत की सजा दी जाती थी, लेकिन अब ये तरीका बंद कर दिया गया है।
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, अफगानिस्तान, चीन, नॉर्थ कोरिया, सऊदी अरब, सोमालिया, ताइवान, UAE और यमन में गोली मारकर भी मौत की सजा दी जाती है।
वहीं भारत में आम अपराधियों को जेल के अंदर फांसी दी जा सकती है, लेकिन सैन्य दोषियों के मामले में सैन्य कोर्ट यह तय कर सकती है कि फांसी दी जाएगी या गोली मारी जाएगी।
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