गेहूं-गन्ने से घाटा तो बदला रास्ता, बस्ती के अरविंद अब सालाना कमा रहे 20-25 लाख रुपये

Published on 19 सित॰ 2026

19 सितंबर 2026, बस्तीगेहूं-गन्ने से घाटा तो बदला रास्ता, बस्ती के अरविंद अब सालाना कमा रहे 20-25 लाख रुपये – उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के भेलवल गांव में रहने वाले 50 वर्षीय किसान अरविंद कुमार सिंह कभी केले में घाटा और गेहूं की फसल बर्बाद होने से परेशान थे। आज वे खेती और मछली पालन से हर साल 20 से 25 लाख रुपये तक कमा रहे हैं। कृषि पत्रकार बृहस्पति कुमार पांडेय की 15 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, यह बदलाव फसलों में विविधता लाने और आधुनिक मशीनों के इस्तेमाल से संभव हुआ।

पांच साल पहले मशीनीकरण अपनाने के दौर में अरविंद की सालाना आय करीब 15 लाख रुपये थी, जो अब बढ़कर 20-25 लाख रुपये पहुंच गई है। उनका कहना है कि यह बढ़ोतरी अकेले किसी एक फसल या तकनीक से नहीं, बल्कि पिछले कई वर्षों में धीरे-धीरे अपनाई गई विविधता और मशीनीकरण के मेल से आई है।

एक साथ कई फसलें, एक साथ कई आमदनी

अरविंद अपने खेतों में अरहर, तिल, सरसों, चना, गन्ना और आलू जैसी नकदी फसलों के अलावा साबूदाना, रागी और कोदो जैसे मोटे अनाज भी उगाते हैं। बागवानी में आम, स्ट्रॉबेरी, करेला और केला शामिल हैं। एक साथ इतनी फसलें लेने से अगर किसी एक फसल में बाजार भाव गिरता है या मौसम की मार पड़ती है, तो बाकी फसलों से नुकसान की भरपाई हो जाती है।

वे कालानमक चावल की खेती भी करते हैं, जो पूर्वांचल की एक खास सुगंधित व भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) प्राप्त परंपरागत किस्म है और बाजार में सामान्य धान से कहीं बेहतर दाम पाती है। इस खेती में भेलवल कृषि उत्पादक कंपनी (एफपीओ) के जरिए करीब 100 किसान उनसे जुड़े हैं।

इस एफपीओ से कुल मिलाकर करीब 400 किसान जुड़े हुए हैं, जिन्हें बीज, तकनीकी सलाह और बाजार तक पहुंच का साझा फायदा मिलता है। दो एकड़ के लीज पर लिए तालाब में मछली पालन से भी उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती है।

रोटावेटर से ड्रोन तक, हर काम मशीन से

अरविंद के पास रोटावेटर, पावर टिलर, सुपर सीडर, जीरो-टिल सीड ड्रिल, थ्रेशर, पैडी स्ट्रॉ चॉपर, कृषि ड्रोन, लेजर लैंड लेवलर, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई तथा रेनगन जैसे आधुनिक यंत्र मौजूद हैं। सीधी बिजाई (डीएसआर) मशीन से वे धान की बुवाई भी करते हैं, जिससे परंपरागत रोपाई के मुकाबले मजदूरी की लागत और पानी की खपत दोनों घटती है।

लेजर लैंड लेवलर से खेत को समतल करने पर सिंचाई का पानी पूरे खेत में बराबर पहुंचता है, जबकि पैडी स्ट्रॉ चॉपर से धान की पराली को खेत में ही काटकर मिलाया जाता है, जिससे पराली जलाने की जरूरत नहीं पड़ती और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है।

सोलर पंप, ड्रिप सिंचाई और आधुनिक तकनीकों के मेल से उनके खेतों में करीब 70 प्रतिशत पानी की बचत हो रही है। उनके इस काम को पहचान मिली है और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की ओर से उन्हें दो बार सम्मानित किया जा चुका है।

अरविंद अपने अनुभव और यंत्रों का इस्तेमाल सिर्फ अपने खेत तक सीमित नहीं रखते। भेलवल कृषि उत्पादक कंपनी के जरिए वे आसपास के गांवों के करीब 400 छोटे किसानों को बीज, तकनीकी सलाह और साझा बाजार पहुंच से जोड़े हुए हैं, जिससे इलाके के कई किसान परिवारों को भी फायदा मिल रहा है।

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