भोपाल में बनी अफ्रीकन स्वाइन फीवर की पहली स्वदेशी वैक्सीन: दिल्ली में शिवराज सिंह चौहान ने की लॉन्च, 2020 में सुअरों में हुई थी रोग की पुष्टि - Bhopal News

Published on 16 जुल॰ 2026

भारत ने पशु चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक सफलता अर्जित की है। भोपाल स्थित 'राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान' (ICAR-NIHSAD) के वैज्ञानिकों ने शूकरों (सुअरों) के लिए विश्व की अपनी तरह की पहली अत्यंत सुरक्षित, स्वदेशी और

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इस क्रांतिकारी खोज को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के 98वें स्थापना दिवस समारोह में देश को समर्पित किया गया।

ऐतिहासिक लोकार्पण और देश के प्रति समर्पण

इस ऐतिहासिक और मील का पत्थर साबित होने वाली स्वदेशी वैक्सीन को माननीय केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा नई दिल्ली के एनएएससी (NASC) परिसर में आयोजित आईसीएआर के 98वें स्थापना दिवस समारोह में राष्ट्र को समर्पित किया गया।

इस अवसर पर केंद्रीय पशुपालन मंत्री राजीव रंजन सिंह, राज्य मंत्रियों सहित आईसीएआर के महानिदेशक एमएल जाट और अन्य शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे।

यह तकनीक भोपाल के राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान (NIHSAD) के निदेशक डा. अनिकेत सान्याल के कुशल नेतृत्व में वैज्ञानिक दल जिसमें डा. डी. सेंथिल कुमार, डा. के. राजूकुमार, डा. जी. वेंकटेश और डा. फतेह सिंह शामिल हैं, की वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम है।

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान।

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान।

स्वदेशी वैक्सीन की विशेषताएं

भोपाल के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई यह वैक्सीन व्यवसायिक रूप से उपलब्ध MA-104 सेल लाइन पर आधारित है, जिससे इसका बड़े पैमाने पर और बेहद कम लागत में उत्पादन करना आसान हो गया है। परीक्षणों के दौरान इस जीवित क्षीणीकृत वैक्सीन ने सुरक्षा, आनुवंशिक स्थिरता और प्रतिरक्षण क्षमता के मामले में उत्कृष्ट परिणाम दिए हैं।

वैक्सीन की मात्र 1 मिलीलीटर की खुराक गर्दन की मांसपेशियों (अंतःपेशीय) में दी जाती है, जिसके 14 दिनों के बाद एक बूस्टर डोज दी जाती है। यह टीका 8 सप्ताह से अधिक आयु के स्वस्थ सुअरों के लिए पूर्णतः अनुकूल है और इसके प्रभाव से सुअरों में 6 महीने तक मजबूत रोग-प्रतिरोधक क्षमता (एंटीबॉडी) बनी रहती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस वैक्सीन के उपयोग से वायरस के पुनः रोगजनक बनने (Reversion to Virulence) का कोई खतरा नहीं पाया गया है।

2020 में हुई थी इस बीमारी की पुष्टि

अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) सुअरों में होने वाला एक अत्यंत संक्रामक और जानलेवा विषाणुजनित (वायरल) रोग है। इस बीमारी में सुअरों की मृत्यु दर शत-प्रतिशत (100%) तक होती है, जिसके चलते यह सुअर पालन उद्योग के लिए सबसे बड़ा अभिशाप माना जाता है।

भारत में साल 2020 में पहली बार इस बीमारी की पुष्टि हुई थी, जिसके बाद से यह कई राज्यों में फैलकर देश के पशुधन क्षेत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ था।

अब तक देश में इस बीमारी का कोई स्वीकृत व्यावसायिक टीका उपलब्ध नहीं था, जिससे निपटने के लिए केवल बीमार पशुओं को मारने (कलिंग) और सख्त जैव-सुरक्षा नियमों का पालन करने जैसे निराशाजनक कदम उठाने पड़ते थे। यह नई वैक्सीन देश के करोड़ों गरीब और मध्यमवर्गीय शूकर पालकों को भारी आर्थिक तबाही से बचाएगी।

राष्ट्र को वैक्सीन समर्पित करते अतिथि।

राष्ट्र को वैक्सीन समर्पित करते अतिथि।

इंसानों को वायरस से खतरा नहीं

आमतौर पर 'स्वाइन फ्लू' जैसी बीमारियों के कारण आम जनता में यह भय रहता है कि यह बीमारी सुअरों से इंसानों में फैल सकती है। परंतु वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) एक गैर-संक्रामक (नॉन-जूनोटिक) बीमारी है।

इसका सीधा अर्थ यह है कि यह वायरस सुअरों से इंसानों में बिल्कुल नहीं फैलता और इंसानों को इससे संक्रमित होने का कोई शारीरिक खतरा नहीं है।

हालांकि, इंसानों पर इसका परोक्ष (Indirect) असर बेहद विनाशकारी होता है। सुअरों की अत्यधिक मृत्यु दर के कारण ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है और किसानों की आजीविका छिन जाती है।

इसके अतिरिक्त, खाद्य श्रृंखला बाधित होने से खाद्य सुरक्षा का संकट खड़ा होता है तथा मांस की कीमतों में भारी उछाल आता है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से समाज का हर वर्ग प्रभावित होता है।

कई देशों के लिए अफ्रीकन स्वाइन फ्लू बड़ी चुनौती

यह आविष्कार न केवल भारत को पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और 'मेक इन इंडिया' दृष्टिकोण को भी नई ऊंचाई प्रदान करता है।

चूंकि अफ्रीकन स्वाइन फीवर दुनिया भर के कई देशों के लिए एक गंभीर सिरदर्द बना हुआ है, इसलिए भारत में निर्मित इस सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली वैक्सीन का निर्यात वैश्विक स्तर पर उन देशों को किया जा सकेगा जो इस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हैं। इससे वैश्विक मंच पर भारत की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा और मजबूत होगी और विदेशी मुद्रा के अर्जन के नए रास्ते भी खुलेंगे।