जयपुर में हॉस्पिटल की 24वीं मंजिल पर उतरेंगी एयर एंबुलेंस: दिन में ही टैकऑफ-लैंडिंग हो सकेगी; गंभीर मरीजों को मिलेगा फायदा - Rajasthan News

Published on 15 अग॰ 2026

जयपुर में एसएमएस अस्पताल परिसर में IPD टावर की 24वीं मंजिल पर हेलीपैड लगभग तैयार हो गया है। यहां मरीजों को लाने ले जाने के लिए 3 हजार किलो वजनी एयर एंबुलेंस आसानी से टैक ऑफ और लैंडिंग कर सकेगी। संभवत: यह देश का सबसे ऊंचा हेलीपैड है।

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हेलीपैड से सबसे ज्यादा राहत ऑर्गन ट्रांसप्लांट के मरीजों को मिलेगी। गंभीर हालत में मरीज को लाने में समय बचेगा। टावर का काम दिसंबर 2027 तक पूरा करने का टारगेट रखा गया है।

पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

हेलीपैड का काम होते ही एविएशन अप्रूवल की प्रकिया शुरू की जाएगी।

हेलीपैड का काम होते ही एविएशन अप्रूवल की प्रकिया शुरू की जाएगी।

हेलिकॉप्टर का भार-कंपन झेलने के लिए एम-30 आरसीसी तकनीक

हेलीपैड के लिए 24वीं मंजिल पर 2 हजार वर्ग मीटर एरिया में छत डल चुकी है। हेलीपैड का डिजाइन पूर्व में DGCA ने अप्रूव किया था। थर्ड पार्टी के रूप में आईआईटी दिल्ली ने प्रूफ चैक किया था।

59.87 मीटर लंबे और 38 मीटर चौडे़ हेलीपैड को तैयार करने में एम-30 आरसीसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। हेलिकॉप्टर जब लैंडिंग या टैक ऑफ करता है तो सरफेज पर ज्यादा भार और कंपन पैदा होता है। एम-30 आरसीसी तकनीक से बने हेलीपैड इसे आसानी से सहन कर लेती है।

10 हजार लीटर का डेडिकेटेड वाटर टैंक

हेलीपैड का बेस तैयार करने के बाद सेफ्टी मेजर्स समेत अन्य इक्विपमेंट लगाए जाएंगे। हेलीपैड से नीचे यानी 23वीं मंजिल पर 7 से 10 हजार लीटर तक का डेडिकेटेड वाटर टैंक बनाया जाएगा। मारु एविएशन की ओर से कंसल्टेंट कैप्टन संजय चक्रवर्ती ने बताया कि एविएशन फायर प्रोटेक्शन को भी लागू किया जाएगा। इसके अलावा भी कई काम होंगे…

  • डे लाइट : इसकी मदद से कोहरे, आंधी और कम रोशनी की स्थिति में हेलीपैड की सतह को रोशन रखा जाएगा, ताकि पायलट को लैंडिंग या टैक ऑफ में दिक्कत न हो।
  • एविएशन लैंप : हेलीपैड के आसपास मौजूद ऊंची इमारतों, मोबाइल टावर आदि पर लाल कलर की चमकने वाली लाइट लगेगी। इससे खराब मौसम का पायलट को दूर से पता चल जाए कि हेलीपैड के रास्ते में क्या रुकावटें हैं।
  • ऑटोमेटिक विंड डायरेक्शन सिस्टम : यह सिस्टम पायलट को बताता है कि किस दिशा से हवा बह रही है, जिससे सुरक्षित दिशा में लैंडिंग तय की जाती है।
  • एयर बैंड ट्रांसमिशन : पायलट और ग्राउंड कंट्रोल या हेलीपैड इंचार्ज के बीच रेडियो कम्युनिकेशन स्थापित करना।
  • रैंप : 24वीं मंजिल पर लिफ्ट नहीं होगी। हेलीपैड पर उतारने के बाद मरीज को रैंप से 23वीं मंजिल पर लाएंगे। यहां से लिफ्ट के जरिए वार्ड, ओटी या आईसीयू में शिफ्ट करेंगे।

बेड साइड डायग्नोसिस सिस्टम

एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ.दीपक माहेश्वरी ने बताया कि टावर में वर्ल्ड क्लास आईसीयू स्थापित करने के साथ ही मोबाइट सिटी स्कैन मशीनें भी लगाई जाएगी। इसके अलावा बेड साइड डायग्नोसिस सिस्टम भी डेवलप किया जाएगा। ताकी मरीज को 60 मिनट के दौरान सभी तरह की जांचें मिल जाएं।

फाइनेंशियल वायबेलिटी मॉडल पर भी होगा विचार

टावर शुरू होने के बाद हर महीने 25 से 30 करोड़ रुपए इसके मेंटीनेंस पर खर्च होंगे। ऐसे में टावर को प्रॉपर संचालित करने के लिए फाइनेंशियल वायबिलिटी मॉडल पर भी विचार किया जा सकता है। टावर में इलाज कराने वाले मरीजों को खर्चा उठाना पड़ सकता है। इसके अलावा फैसेलिटी मैनेजमेंट को लेकर भी विचार किया जा रहा है।

हेलीपैड निर्माण पूरा होने के बाद एविएशन अप्रूवल की प्रक्रिया शुरू होगी। प्रदेश के सिविल एविएशन विभाग को इसकी नोडल एजेंसी बनाया जा सकता है। जो केंद्र और राज्य के अलग-अलग विभागों से समन्वय कर अलग-अलग तरह की अप्रूव लेगा। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर एयर एंबुलेंस को किराए पर लेने के लिए भी किसी कंपनी से करार करना होगा।

टावर शुरू होने के बाद हर महीने 25 से 30 करोड़ रुपए इसके मेंटीनेंस पर खर्च होंगे।

टावर शुरू होने के बाद हर महीने 25 से 30 करोड़ रुपए इसके मेंटीनेंस पर खर्च होंगे।

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