Updated On: Aug 08, 2026 | 10:57 PM IST
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सार
Indian Freedom Movement: लंदन में अंग्रेज अफसर कर्जन वायली को गोली मारकर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा की शौर्यगाथा, जो महज 26 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए।

जऱा याद करो कुर्बानी
विस्तार
Indian Freedom Movement Story: भारत की आजादी की कहानी सिर्फ महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और वीर सावरकर जैसे चर्चित नामों तक सीमित नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे भी अनगिनत क्रांतिकारी रहे, जिन्होंने अपने देश के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आखिरी सांस तक संघर्ष किया। इनमें एक नाम मदनलाल ढींगरा का भी है। वह क्रांतिकारी जिसने अंग्रेजों की राजधानी लंदन में ही एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या कर ब्रिटिश साम्राज्य को सीधी चुनौती दी। महज 26 साल की उम्र में ढींगरा ने ऐसी कार्रवाई को अंजाम दिया, जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।
लंदन में अंग्रेज अफसर की हत्या
मदनलाल ढींगरा ने 1 जुलाई 1909 को लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली पर गोली चला दी। इस हमले में वायली की मौत हो गई। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर ब्रिटेन में भी तीखी बहस शुरू हो गई। ढींगरा को गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश अदालत में मुकदमा चला और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। इसके बाद 17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटनविले जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र महज 26 वर्ष थी।

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मदनलाल ढींगरा
फांसी के बाद ब्रिटेन में ही दफनाया गया शव
मदनलाल ढींगरा का शव फांसी के बाद ब्रिटेन में ही दफना दिया गया। कई दशकों तक उनकी अस्थियां और पार्थिव अवशेष भारत नहीं लाए जा सके। आजादी के लगभग तीन दशक बाद, 1976 में उनके पार्थिव अवशेष भारत लाए गए। उस समय केंद्र में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार थी। भारत लौटने के बाद उनके अवशेषों को सम्मान के साथ रखा गया और देश के अलग-अलग हिस्सों में उनके बलिदान को याद किया गया।
अमृतसर में हुआ था जन्म
मदनलाल ढींगरा का जन्म 18 सितंबर 1883 को अमृतसर में हुआ था। उनके पिता डॉ. दित्तामल ढींगरा प्रतिष्ठित चिकित्सक थे और ब्रिटिश प्रशासन में सिविल सर्जन के पद पर कार्यरत थे। ढींगरा ने शुरुआती शिक्षा के बाद लाहौर में पढ़ाई की। छात्र जीवन में ही उनका झुकाव राष्ट्रवादी विचारों की ओर बढ़ने लगा था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनका विरोध धीरे-धीरे इतना मजबूत हुआ कि उन्होंने पढ़ाई और व्यक्तिगत भविष्य से ज्यादा देश की आजादी को महत्व देना शुरू कर दिया।
लंदन पहुंचकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े
मदनलाल ढींगरा उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड पहुंचे और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। लंदन में उस समय भारतीय छात्रों और राष्ट्रवादियों के बीच स्वतंत्रता को लेकर चर्चाएं तेज थीं। इसी दौरान ढींगरा की मुलाकात विनायक दामोदर सावरकर समेत कई भारतीय राष्ट्रवादियों से हुई। सावरकर के विचारों का ढींगरा पर गहरा प्रभाव पड़ा। धीरे-धीरे वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ सक्रिय राष्ट्रवादी गतिविधियों से जुड़ गए।

मदनलाल ढींगरा (Image- Social Media)
कर्जन वायली को क्यों बनाया निशाना?
उस दौर में सर विलियम हट कर्जन वायली भारत से जुड़े मामलों में ब्रिटिश सरकार के प्रभावशाली अधिकारियों में शामिल थे। भारतीय राष्ट्रवादी उन्हें ब्रिटिश शासन की दमनकारी व्यवस्था का प्रतिनिधि मानते थे। 1 जुलाई 1909 को लंदन के इंपीरियल इंस्टीट्यूट में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ढींगरा ने वायली पर गोलियां चला दीं। इस घटना के बाद ढींगरा ने गिरफ्तारी से बचने की कोशिश नहीं की। उन्होंने अपने कृत्य की जिम्मेदारी स्वीकार की और अदालत में भी अपने राष्ट्रवादी विचारों को स्पष्ट रूप से सामने रखा।
मौत के सामने भी नहीं झुके
मदनलाल ढींगरा को पता था कि ब्रिटिश अदालत का फैसला उनके लिए मौत की सजा लेकर आएगा। इसके बावजूद उन्होंने अपने विचारों से पीछे हटने से इनकार कर दिया।
17 अगस्त 1909 को उन्हें फांसी दे दी गई। उनकी उम्र उस समय 26 वर्ष थी। उनकी शहादत ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक ऐसी मिसाल कायम की, जिसमें एक युवा भारतीय ने ब्रिटिश साम्राज्य के केंद्र में जाकर उसके एक अधिकारी को निशाना बनाया और फिर अपने जीवन की कीमत चुकाई।
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गुमनाम नहीं, इतिहास का अमर अध्याय
आजादी के आंदोलन में जिन क्रांतिकारियों के नाम देश की जुबान पर हैं, उनके साथ-साथ मदनलाल ढींगरा जैसे युवाओं का योगदान भी भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला उस समय लिया, जब उनके सामने एक सुरक्षित और सुविधाजनक भविष्य का रास्ता मौजूद था। लेकिन उन्होंने उस रास्ते को छोड़कर क्रांतिकारी आंदोलन का रास्ता चुना। भारत को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली, लेकिन उस आजादी की नींव दशकों तक चले संघर्ष, आंदोलनों, बलिदानों और असंख्य क्रांतिकारियों के त्याग से तैयार हुई थी।
