जीत की स्पीच में वांगचुक को क्रेडिट नहीं? प्रधान के इस्तीफे के लिए 26 दिन थे भूखे, अभिजीत दीपके पर उठे सवाल

Published on 25 जुल॰ 2026

Time Published: Saturday, July 25, 2026, 19:06 [IST]

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 25 जुलाई को जीत का ऐलान किया। मंच पर मौजूद CJP फाउंडर अभिजीत दीपके ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया और लोगों से किसी एक व्यक्ति को हीरो न बनाने की अपील भी की। लेकिन उनके पूरे संबोधन में एक नाम नहीं आया, जिसकी चर्चा अब सबसे ज्यादा हो रही है। वह नाम है सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का।

सोनम वांगचुक वही शख्स थे, जिनकी 26 दिन की भूख हड़ताल ने शुरुआती धरने को राष्ट्रीय स्तर के आंदोलन में बदल दिया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जीत के सबसे बड़े मौके पर उनका जिक्र क्यों नहीं हुआ। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि ऐसा लग रहा है कि सोनम वांगचुक को जीत के जश्न में सीजेपी भूल गई।

sonam wangchuk

मंच से बोले अभिजीत दीपके,'किसी को हीरो मत बनाओ'

जंतर-मंतर के मंच पर बोलते हुए अभिजीत दीपके ने लोगों से अपील की कि वे किसी एक इंसान को आंदोलन का चेहरा न बनाएं। उन्होंने खुद को भी हीरो बनाए जाने से साफ इनकार कर दिया।

अभिजीत दीपके ने कहा,

"मैं बहुत पते की बात कहना चाहता हूँ। धर्मेंद्र प्रधान के हटने पर मुझे हीरो मत बनाइए। यह गलती मत कीजिएगा। हमारे देश का नुकसान ही इसीलिए हुआ है क्योंकि हम किसी एक इंसान को हीरो बना देते हैं। यह इस्तीफा इस बात का सुबूत है कि अगर आप डरेंगे नहीं और सरकार के सामने नहीं झुकेंगे, तो किसी से भी इस्तीफा लिया जा सकता है।"

हालांकि इस पूरे भाषण में सोनम वांगचुक का नाम नहीं लिया गया। इसी बात को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर सोनम वांगचुक ने क्या कहा?

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया पर इसे लोकतंत्र की जीत बताया। सोनम वांगचुक ने एक्स पोस्ट पर कहा,

''यह लोकतंत्र की जीत है। यह सीधे सड़कों से निकली जनता की ताकत की जीत है। यह शांति, धैर्य और लगातार डटे रहने की जीत है। CJP, देश की Gen Z और उन सभी नागरिकों को बधाई, जिन्होंने डर और डर के माहौल को पीछे छोड़कर देश के हर कोने से अपनी आवाज उठाई। अब लड़ाई सिर्फ जवाबदेही तक सीमित नहीं रहेगी, अगला कदम शिक्षा व्यवस्था में सुधार का है।"

सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल से कैसे बदला एक धरना देशव्यापी आंदोलन में?

CJP का धरना 6 जून को जंतर-मंतर से शुरू हुआ था। उस समय आंदोलन में सीमित लोग शामिल थे। अभिजीत दीपके, सौरभ दास, आशुतोष रांका और कुछ अन्य साथी लगातार धरने पर बैठे थे। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इस आंदोलन को ज्यादा पहचान नहीं मिली थी।

हालात तब बदले, जब सोनम वांगचुक ने 28 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। जैसे-जैसे उनकी तबीयत बिगड़ती गई, वैसे-वैसे लोगों का ध्यान इस आंदोलन की तरफ बढ़ने लगा। जंतर-मंतर पर भीड़ बढ़ी और सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से फैल गया।

लगातार 26 दिन तक भूख हड़ताल पर रहने के दौरान वांगचुक की सेहत कमजोर होती गई। आखिरकार 18 जुलाई को तबीयत बिगड़ने पर पुलिस उन्हें जबरन अस्पताल ले गई, जो इस आंदोलन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बना। बाद में गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया। छात्रों में गुस्सा बढ़ा कि सोनम वांगचुक को जबरन तरीके से पुलिस क्यों उठाकर ले गई। लाखों लोगों ने वांगचुक के समर्थन में अपनी व्हाट्सएप डीपी बदल ली। 'I Support Sonam' हैशटैग ट्रेंड करने लगा। इससे आंदोलन को नई ऊर्जा मिली।

20 जुलाई के संसद मार्च से पहले भी सोनम वांगचुक ने लोगों से बड़ी संख्या में पहुंचने की अपील की थी। उनका संदेश आंदोलन का बड़ा प्रेरक बना। 20 जुलाई को पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों के बाद आंदोलन पूरी तरह उग्र हो गया था।

22 जुलाई को मेदांता अस्पताल के आईसीयू में भर्ती वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के भरोसे के बाद अपना अनशन तोड़ दिया। अनशन खत्म करने के तरीके को लेकर सोशल मीडिया पर वांगचुक की आलोचना शुरू हो गई। आलोचकों ने कहा कि उन्होंने बिना इस्तीफे के अनशन खत्म कर दिया। इस पर उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो ने पलटवार करते हुए कहा कि लोगों को उनके पति की सेहत और त्याग का सम्मान करना चाहिए।

आंदोलन CJP और सोनम वांगचुक दोनों से बड़ा हो चुका था

मीडिया को दिए इंटरव्यी में CJP प्रवक्ता आशुतोष रांका ने साफ कर दिया था कि यह लड़ाई अब किसी एक चेहरे की नहीं रह गई है। आशुतोष रांका ने कहा था, ''यह अब सिर्फ CJP या जंतर-मंतर का मुद्दा नहीं रह गया है। पूरा देश सड़कों पर है और जनता केवल धर्मेंद्र प्रधान का हटना चाहती है। यह आंदोलन CJP से भी बड़ा बन चुका है। हमें खुशी है कि सोनम सर ने अनशन तोड़ दिया, हम उनकी सेहत को लेकर बहुत चिंतित थे। उन्होंने पूरे देश में क्रांति की अलख जगाई है।"

क्या वांगचुक को दरकिनार करना जायज था?

हालांकि यह सच है कि 20 जुलाई के बाद आंदोलन किसी एक नेता के हाथ में नहीं रहा और पूरी जनता की मांग केवल एक मंत्री का हटना बन गई थी। लेकिन इसके बावजूद जीत के ऐतिहासिक मौके पर सोनम वांगचुक का नाम न लेना कई सवाल छोड़ गया। आखिरकार यह सोनम वांगचुक की ही 26 दिनों की कड़ी तपस्या थी, जिसने इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी।