परिसीमन के बाद पंचायतीराज चुनाव में जिला परिषद और पंचायत समितियों में संख्या का गणित बदल गया है। इस बार जिला परिषद में 4 और पंचायत समितियों में 42 नए सदस्य चुने जाएंगे। वहीं केलवाड़ा व नाहरगढ़ के लिए पहली बार प्रधान के चुनाव होंगे। जिला प्रमुख के लिए
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इस चुनाव में पंचायत समितियों के वार्ड 126 से बढ़कर 168 हो गए हैं। जबकि जिला परिषद में सदस्यों की संख्या 25 से बढ़कर 29 हो गई है। यानी पंचायत समिति स्तर पर 42 और जिला परिषद में 4 वार्ड बढ़े हैं। साथ ही पुराने वार्डों की सीमाएं बदलने से कई नेताओं को नए गांवों में अपनी पकड़ बनानी होगी। इस बार जिला प्रमुख का पद अनारक्षित है। ऐसे में अनारक्षित सीटों पर कड़ा घमासान होने जा रहा है। 29 सीटों वाली जिला परिषद का मुखिया बनने के लिए कम से कम 15 सदस्यों का समर्थन अनिवार्य होगा।
{सात सीटें अनारक्षित, यहां होंगे कड़े मुकाबले: जिला परिषद का वार्ड 5, वार्ड 7, वार्ड 10, 11 और 12 के अलावा वार्ड 15 सामान्य है। इसके अलावा वार्ड 17 भी सामान्य है। ये वार्ड अंता, बारां, अटरू और छीपाबड़ौद पंचायत समिति क्षेत्र में आते हैं। ऐसे में इन सीटों पर कड़ा घमासान है। राष्ट्रीय पार्टियों सहित तीसरा मोर्चा और निर्दलीय प्रत्याशी तैयारी में जुटे हैं। फैक्ट फाइल - जिला परिषद वार्ड: 25 से बढ़कर 29 - पंचायत समिति वार्ड: 126 से बढ़कर 168 - पंचायत समितियां: 10 - जिला प्रमुख के लिए बहुमत: 15 सदस्य - कुल मतदाता: 7,99,850 - मतदान केंद्र: 886 - पुरुष मतदाता: 4,09,376 - महिला मतदाता: 3,90,472 - ट्रांसजेंडर मतदाता: 2 नई पंचायत समितियों नाहरगढ़ और केलवाड़ा के गठन के साथ स्थानीय प्रतिनिधित्व की संरचना भी बदली है। किशनगंज में वार्डों की संख्या 17 से घटकर 15 रह गई है। इसी तरह छीपाबड़ौद में 19 से बढ़कर 25, अटरू-छबड़ा में भी 15 से बढ़कर 19-19 वार्ड हो गए हैं। इससे कई क्षेत्रों में चुनावी मुकाबले का दायरा और स्थानीय समीकरण बदलेंगे। छीपाबड़ौद पंचायत समिति में सबसे ज्यादा 25 वार्ड है। अटरू और छबड़ा में 19-19 वार्ड हैं। जबकि बारां, अंता, मांगरोल, किशनगंज, नाहरगढ़, केलवाड़ा और शाहाबाद में 15-15 वार्ड की समितियां हैं। सीटें बढ़ने से नए दावेदारों के लिए चुनाव लड़ने के अवसर बढ़े हैं। लेकिन कितने नए चेहरे जीतकर आएंगे, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। परिसीमन के बाद वार्डों की सीमाएं और आरक्षण की स्थिति दावेदारों की रणनीति को प्रभावित करेगी। कुछ क्षेत्रों में पुराने जनप्रतिनिधियों को नए गांवों में समर्थन जुटाना पड़ सकता है, जबकि नए दावेदार स्थानीय मुद्दों और जनसंपर्क के आधार पर अपनी दावेदारी पेश कर सकेंगे। भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य दलों में टिकट के दावेदार सक्रिय हैं।