करीब 5 हजार करोड़ रुपए की लागत से बन रहा कच्ची दरगाह-बिदुपुर सिक्सलेन पुल 2026 में शुरू होना है। उद्घाटन से पहले वैशाली के हेमंतपुर में पुल के नीचे अप्रोच रोड के गोलंबर के पास मिट्टी और बालू हटने की तस्वीर सामने आई है।
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RJD ने इसे अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर एप्रोच रोड के कमजोरी पर सवाल उठाया है। इसे कमजोर आधार का मामला बताते हुए तकनीकी जांच की मांग की है।
इस फोटो के सामने आने के बाद दैनिक भास्कर की टीम ने मौके पर पहुंचकर पड़ताल की। इस दौरान यहां गोलंबर के नीचे का कुछ हिस्सा खाली मिला। हालांकि, निर्माणकर्मियों के मुताबिक, यह मेन फाउंडेशन नहीं, बल्कि कंस्ट्रक्शन के दौरान सपोर्ट के लिए डाला गया रेत-मिट्टी है। इसके हटने से खाली जगह दिख रही है।
अब सवाल है कि इसके पीछे वजह क्या है? क्या इससे स्ट्रक्चर की मजबूती पर कोई असर पड़ रहा है? ये कंट्रक्शन का नॉर्मल पार्ट है या फिर टेक्निकल दिक्कत? इस पूरे मामले की जिम्मेदारी किसकी है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट
पुल से जुड़े कुछ तस्वीरें देखिए…

एप्रोच रोड के गोलंबर के नीचे से मिट्टी हट गई है।

सड़क के नीचे प्लास्टिक भी लगाया गया है, जिसे भास्कर रिपोर्टर दिखा रहे हैं।

गोलंबर के नीचे मिट्टी हटने से होल बन गया है।
नीचे रेत-मिट्टी हटी, ऊपर पक्का स्ट्रक्चर
दैनिक भास्कर की टीम वैशाली जिला मुख्यालय से 32 किलोमीटर दूर हेमंतपुर पुल के पास पहुंची। टीम ने मौके पर मौजूदा स्थिति का जायजा लिया और पुल के ऑपरेटर से भी बातचीत की।
ऑपरेटर निवास अली ने बताया कि गोलंबर के निर्माण के दौरान नीचे सपोर्ट के लिए रेत और कच्चे कंक्रीट का इस्तेमाल किया गया था, जबकि ऊपर पक्की ढलाई की गई है। पुल के नीचे जो हिस्सा दिखाई दे रहा है, उसे बाद में हटाया जाना है।
इसके बाद गोलंबर को अंब्रेला स्टाइल का रूप दिया जाएगा और अंत में पेंटिंग कर काम पूरा किया जाएगा। मौके पर काम कर रहे मजदूरों का कहना था कि वीडियो में जिस हिस्से को ढहता दिखाया जा रहा है, वह गोलंबर का मुख्य हिस्सा नहीं है।
इस बीच एल एंड टी के एडमिन हेड आरके सिंह ने कहा कि अगर किसी को पुल की मजबूती को लेकर कोई सवाल है, तो वे स्वयं एक इंजीनियर को हायर कर इसकी पूरी जांच-पड़ताल कर सकते हैं।

कंट्रीट टूटने और बालू के हटने की तस्वीर।

गोलंबर के नीचे काम करते मजदूर।
पुल के नीचे रेत-मिट्टी का क्या काम होता है?
इंजीनियरिंग के लिहाज से पुल और उसके एप्रोच रोड के आसपास भरी गई रेत-मिट्टी कई महत्वपूर्ण काम करती है। हालांकि, इसका रोल इस बात पर निर्भर करता है कि इसे फाउंडेशन, बैकफिल, फिल्टर लेयर या अस्थायी सपोर्ट के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
1. लोड बैलेंस और डिस्ट्रीब्यूशन
पुल और उस पर चलने वाले लोडेड गाड़ियों का भार मुख्य रूप से पियर, पाइल और फाउंडेशन के जरिए जमीन तक पहुंचता है। वहीं, एप्रोच रोड के नीचे की मिट्टी और भराव मटेरियल सड़क के भार को स्थिर रखने और जमीन पर समान रूप से बांटने में मदद करती है। इससे सड़क में असमान धंसान की आशंका कम होती है।
2. कटाव से सुरक्षा
नदी के तेज बहाव से पुल के पियर या उसके आसपास की मिट्टी हटने की प्रक्रिया को स्काउर कहा जाता है। ऐसे जगहों पर डिजाइन के अनुसार रेत, बजरी, बोल्डर, स्टोन पिचिंग या कोई और प्रोटेक्टिव मटेरियल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उद्देश्य पानी के बहाव से मूल मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करना होता है।
3. एबटमेंट के पीछे बैकफिलिंग (Backfilling)
पुल के दोनों सिरों पर बने स्ट्रक्चर(एबटमेंट) के पीछे इस्तेमाल किए गए मिट्टी या सिलेक्टेड भराव मटेरियल डाली जाती है। यह एप्रोच रोड को सपोर्ट देती है और पुल और सड़क के बीच ट्रांजिशन को स्थिर रखने में मदद करती है। बैकफिल की सही कॉम्पैक्शन बेहद जरूरी होती है, क्योंकि खराब कॉम्पैक्शन से आगे चलकर सड़क धंस सकती है।
4. पानी निकलने और फिल्ट्रेशन (Drainage & Filtration)
कुछ जगहों पर डिजाइन के अनुसार साफ रेत, बजरी या फिल्टर मीडिया का इस्तेमाल पानी के निकलने के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य पानी को नियंत्रित तरीके से बाहर निकालना और मिट्टी के फाइन पार्टिक्लस को बहने से रोकना होता है। कई स्ट्रक्चर में इसके लिए जियोटेक्सटाइल फिल्टर सिस्टम भी इस्तेमाल किया जाता है।
सबसे जरूरी बात है कि पुल के नीचे रेत-मिट्टी दिखने या उसके कुछ हिस्से के हटने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुल की नींव कमजोर हो गई है। यह जानने के लिए यह देखना जरूरी है कि वह मटेरियल स्थायी फाउंडेशन का हिस्सा है, एप्रोच रोड का बैकफिल है या निर्माण के दौरान इस्तेमाल किया गया अस्थायी सपोर्ट। इसकी पुष्टि मौके की तकनीकी जांच और डिजाइन ड्रॉइंग से ही हो सकती है।
L&T के आरके सिंह का कहना है कि यहां वेल फाउंडेशन स्ट्रक्चर बनाया गया है। गोलंबर इसी पर टिका है। आसपास रेत इसलिए डाली गई थी ताकि गोलंबर के निर्माण के दौरान उसे सपोर्ट मिल सके और बाद में इसके चारों तरफ बेहतर फिनिशिंग की जा सके।
मौजूदा स्थिति में यहां बाढ़ का पानी नहीं आया है। रेत निकलने से मुख्य पुल या गोलंबर की संरचनात्मक मजबूती प्रभावित नहीं हुई है। यदि किसी को पुल की मजबूती पर संदेह है तो स्वतंत्र इंजीनियर से इसकी जांच कराई जा सकती है।

RJD का सवाल- बाढ़ वाले इलाके में मिट्टी कटाव को कैसे नजरअंदाज करें?
राजद ने वायरल वीडियो को आधार बनाकर सरकार को घेरा है। पार्टी का कहना है कि गंगा के किनारे का इलाका हर साल बाढ़ और जलजमाव से प्रभावित होता है। ऐसे क्षेत्र में किसी भी बड़े पुल की सिर्फ ऊपरी सड़क नहीं, बल्कि उसके नीचे की मिट्टी, फिलिंग, ड्रेनेज और कटावरोधी व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है।
राजद ने सवाल उठाया है कि यदि एप्रोच रोड के आसपास मिट्टी और रेत हट रही है तो इसकी वजह क्या है? क्या यह सामान्य निर्माण प्रक्रिया है या जल निकासी और मिट्टी के कटाव से जुड़ी समस्या?
पार्टी ने यह भी सवाल किया कि निर्माण गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई? क्या पुल चालू होने से पहले पूरे एप्रोच रोड का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराया गया है? राजद ने मांग की है कि किसी दुर्घटना का इंतजार करने के बजाय संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण करे और आवश्यक सुरक्षा उपाय करे।
डेटा में समझिए परियोजना कितनी बड़ी है
कच्ची दरगाह-बिदुपुर परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण बात इसका पैमाना है।
पुरानी प्रोजेक्ट रिपोर्ट के अनुसार पूरे अलाइनमेंट की लंबाई 22.76 किलोमीटर थी। इसमें 9.76 किलोमीटर मुख्य गंगा पुल और बाकी हिस्सा सड़क/एप्रोच वायाडक्ट का था। प्रोजेक्ट के पुराने दस्तावेजों में इसकी अनुमानित लागत ₹4,988.4 करोड़ बताई गई है।
हालांकि, हाल की रिपोर्टों में तैयार पुल/कनेक्टिविटी की लंबाई करीब 19.75 किलोमीटर बताई गई है, इसलिए 22.76 किमी को पूरे मूल प्रोजेक्ट अलाइनमेंट के संदर्भ में और 19.75 किमी को वर्तमान तैयार कनेक्टिविटी के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित है।

67 पायों वाला पुल, नदी की गहराई और बाढ़ सबसे बड़ी चुनौती
प्रोजेक्ट की निर्माण तकनीक सामान्य सड़क पुलों से काफी अलग है। यह गंगा के चौड़े और बदलते प्रवाह क्षेत्र में बनाया गया है।
प्रोजेक्ट से जुड़े तकनीकी दस्तावेजों में गंगा क्षेत्र में वेल फाउंडेशन और गहरे फाउंडेशन की निर्माण प्रक्रिया का उल्लेख है। पुराने प्रोजेक्ट दस्तावेज के अनुसार नदी में 67 वेल फाउंडेशन की योजना थी।
इतने बड़े पुल में फाउंडेशन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि गंगा में मानसून के दौरान पानी का बहाव और नदी तल में बदलाव होता रहता है। इसी कारण एप्रोच रोड के नीचे मिट्टी या रेत के हटने जैसी तस्वीर को सिर्फ 'मिट्टी निकल गई' कहकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा।
देखना होगा कि मिट्टी कितनी गहराई तक हटी? कहां से हटी? किस कारण से हटी? क्या वहां पानी का बहाव हुआ? क्या रोड की फिलिंग प्रभावित हुई? क्या मुख्य फाउंडेशन पर कोई असर पड़ा? इन सभी सवालों का जवाब तकनीकी जांच से ही मिल सकता है।
राघोपुर के लिए पुल सिर्फ सड़क नहीं, लाइफलाइन है
इस पुल का सबसे बड़ा असर राघोपुर क्षेत्र पर पड़ने वाला है। पटना के बिल्कुल करीब होने के बावजूद राघोपुर लंबे समय तक गंगा और दियारा क्षेत्र की ज्योग्राफिकल कंडीशन के कारण मुख्य शहर से रिलेटिव अलग रहा। बाढ़ के समय यहां सड़क संपर्क प्रभावित होना आम बात रही है।
नए पुल से पटना की तरफ सीधा सड़क संपर्क मिलने के बाद राघोपुर की स्थिति बदलने की उम्मीद है। स्थानीय स्तर पर इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, रोजगार और कृषि उत्पादों की आवाजाही पर पड़ेगा।
राघोपुर के लोगों के लिए इसका मतलब सिर्फ पटना जाने का रास्ता आसान होना नहीं है। इसका मतलब है बारिश में भी सड़क संपर्क, बाजार तक आसान पहुंच और पटना से सीधे जुड़ाव।

पटना का ट्रैफिक भी बदलेगा
कच्ची दरगाह-बिदुपुर पुल को पटना के ट्रैफिक नेटवर्क के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अभी उत्तर बिहार से पटना आने वाले बड़ी संख्या में गाड़ियों को महात्मा गांधी सेतु और शहर के दूसरे हिस्सों से होकर गुजरना पड़ता है। नए पुल के चालू होने के बाद ट्रैफिक को ऑप्शनल रूट मिलेगा। इससे महात्मा गांधी सेतु पर गाड़ियों का दबाव घटने की उम्मीद है।
हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, पुल के जरिए पटना से वैशाली की यात्रा करीब 20 से 25 मिनट में पूरी होगी। यानी पुल चालू होने के बाद इसका असर सिर्फ वैशाली के लोगों पर नहीं, बल्कि पूरे उत्तर बिहार के सड़क नेटवर्क पर पड़ सकता है।
2015 में शिलान्यास, 2017 में शुरू हुआ काम, 2026 में पूरा
कच्ची दरगाह-बिदुपुर पुल की नींव 2015 में नीतीश-तेजस्वी की जोड़ी ने रखी थी। 2017 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ, 2026 में काम पूरा हुआ है।
ब्रिज तैयार करने की अवधि 3 बार बढ़ाई गई। पहली बार जनवरी 2021, दूसरी बार दिसंबर 2024 और फिर सितंबर 2025 में इसे चालू करने का समय तय किया गया।
23 अगस्त 2025 को तब के सीएम नीतीश कुमार ने दीदारगंज में कच्ची दरगाह बिदुपुर सिक्स लेन गंगा पुल परियोजना के पटना अप रैम्प का उद्घाटन किया था।
पटना अप रैम्प एक एप्रोच रोड है जो जेपी गंगा पथ के अंतिम बिन्दु दीदारगंज से शुरू होकर 6 लेन न्यू गंगा ब्रिज तक जाता है।
इस संपर्क पथ के माध्यम से पटना शहर की तरफ से जेपी गंगा पथ होते हुए वाहनों का आवागमन सीधे नए पुल तक है। इससे शहर के अंदर वाहनों का दबाव कम होगा। लोगों को जाम की समस्या से निजात मिलेगी।