बॉलीवुड के मशहूर हास्य अभिनेता राजपाल यादव और उनकी पत्नी राधा राजपाल यादव को चेक बाउंस से जुड़े सात आपराधिक मामलों में देश की शीर्ष अदालत से फौरी राहत मिली है। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा तीन महीने की जेल की सजा बरकरार रखे जाने और सरेंडर करने के आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता को सरेंडर से सशर्त छूट प्रदान की है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि यह अंतरिम संरक्षण तभी प्रभावी रहेगा जब याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में तय समयसीमा के भीतर 5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जमा कराएंगे। अदालत ने मामले में सशर्त नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 15 सितंबर को तय की है।
क्या है 2010 का 'अता पता लापता' फिल्म से जुड़ा पूरा विवाद?
इस कानूनी विवाद की शुरुआत करीब 16 साल पहले वर्ष 2010 में हुई थी, जब राजपाल यादव ने बतौर निर्देशक अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म 'अता पता लापता' के निर्माण और पोस्ट-प्रोडक्शन कार्य को पूरा करने के लिए मेसर्स मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (M/s Murli Projects Pvt Ltd) नामक कंपनी से लगभग 5 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता ली थी। हालांकि, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल साबित हुई, जिसके कारण राजपाल यादव और उनकी प्रोडक्शन कंपनी वित्तीय संकट में घिर गए। देनदारी चुकाने के लिए अभिनेता और उनकी पत्नी की ओर से जारी किए गए चेक बैंक में बाउंस हो गए। इसके बाद फाइनेंसर कंपनी ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट की धारा 138 के तहत राजपाल यादव, उनकी पत्नी और प्रोडक्शन हाउस के खिलाफ चेक अनादर (Cheque Bounce) के सात अलग-अलग आपराधिक परिवाद दायर कर दिए।
निचली अदालत से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट तक कानूनी सफर
यह मामला वर्षों तक दिल्ली की अदालतों में विचाराधीन रहा। अप्रैल 2018 में मजिस्ट्रेट अदालत ने राजपाल यादव को सभी सात मामलों में दोषी ठहराते हुए प्रत्येक मामले में छह महीने के साधारण कारावास और भारी जुर्माने की सजा सुनाई थी। बाद में 2019 में सेशंस कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन सजा घटाकर तीन-तीन महीने कर दी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 10 जुलाई के अपने आदेश में मजिस्ट्रेट और सेशंस कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए उनकी आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने सभी सात मामलों में तीन-तीन महीने की सजा को एक साथ (concurrently) चलाने का आदेश दिया था और प्रत्येक मामले में 1.05 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही अदालत ने माना था कि बार-बार आश्वासन और अंडरटेकिंग देने के बाद भी भुगतान न करने के कारण अभिनेता को प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए हाईकोर्ट ने उन्हें दो महीने का समय दिया था, जिसकी समयसीमा समाप्त हो रही थी।
क्या 5 करोड़ रुपये देकर जेल जाने से बच पाएंगे अभिनेता?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 5 करोड़ रुपये जमा करने से राजपाल यादव जेल जाने से हमेशा के लिए बच जाएंगे या उन्हें आगे भी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी?
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक शर्तिया अंतरिम संरक्षण (Conditional Interim Protection) है। इसका मतलब यह है कि:
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सरेंडर से तुरंत राहत: यदि राजपाल यादव तय समय के भीतर 5 करोड़ रुपये रजिस्ट्री में जमा कर देते हैं, तो उन्हें 15 सितंबर की सुनवाई तक जेल जाने या पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं होगी।
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डिफ़ॉल्ट होने पर सीधी जेल: यदि वे निर्धारित समय पर यह राशि जमा करने में विफल रहते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट की ओर से मिला अंतरिम संरक्षण स्वतः समाप्त हो जाएगा और दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देशानुसार उन्हें अपनी तीन महीने की जेल की सजा काटने के लिए सरेंडर करना होगा।
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केस का अंतिम फैसला बाकी: 5 करोड़ रुपये जमा करना केवल अपील पर विचार करने की पूर्व-शर्त है, यह मामले का अंतिम निपटारा नहीं है। मामले की विस्तृत सुनवाई 15 सितंबर को होगी, जहां अदालत यह तय करेगी कि दोनों पक्षों के बीच हुए पिछले समझौतों, पहले जमा कराए जा चुके करीब 2.25 करोड़ रुपये के समायोजन और कानूनी मिसालों के आधार पर क्या उनकी सजा पूरी तरह माफ की जा सकती है या नहीं।