प्री-मैच्योर बच्चों में अंधेपन का खतरा: आरएनटी में भर्ती 59 प्रतिशत नवजातों का वजन 2.5 किलो से कम, 6 माह में 1583 केस - Udaipur News

Published on 19 अक्टू॰ 2026

उदयपुर संभाग के सबसे बड़े आरएनटी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध बाल चिकित्सालय (एमबी अस्पताल) के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। बीते छह महीने (अप्रैल से सितंबर) में यहां कुल 3,458 नवजात भर्ती हुए, जिनमें से 1,583 बच्चे समय

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32 सप्ताह से पहले जन्म पर आती है समस्या

एमबी अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में कार्यरत यूटीबी चिकित्सक डॉ. अनुश्री शर्मा ने बताया कि गर्भ में 32 सप्ताह से पहले जन्म लेने वाले या 2 किलो से कम वजन वाले बच्चों की आंख का पर्दा (रेटिना) पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। इसे ही आरओपी कहते हैं। बच्चे की आंख में एंटी-वेजिफ इंजेक्शन लगाया जाता है या रेटिना की सर्जरी की जाती है। डॉ. अनुश्री इससे पूर्व जयपुर में ऐसे क्रिटिकल मामलों का सफलतापूर्वक उपचार कर चुकी हैं।

निजी अस्पताल में 1 लाख तक खर्च

निजी और कॉर्पोरेट अस्पतालों में आरओपी का ट्रीटमेंट महंगा है। वहां एंटी-वेजिफ इंजेक्शन और लेजर सर्जरी पर प्रति बच्चा 40 हजार से 1 लाख रुपए तक का खर्च आता है। वहीं, एमबी में यह निशुल्क है।

डरा रहे 6 महीने के ये आंकड़े

महीनाप्री-मैच्योरकम वेटभर्ती
अप्रैल232306501
मई249342573
जून246311505
जुलाई305395663
अगस्त261331561
सितंबर290364655
कुल1,5832,0493,458

अब ब्लॉक स्तर पर मिलेगी ट्रेनिंग, नहीं लगानी होगी दौड़

हाल ही में चिकित्सा विभाग की प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ ने प्री-मैच्योर बच्चों के आरओपी ट्रीटमेंट व देखभाल पर विशेष फोकस करने के कड़े निर्देश दिए हैं। सीएमएचओ (द्वितीय) डॉ. एमएस राठौड़ ने बताया कि इन निर्देशों के तहत जल्द ही जिले की सभी सीएचसी, जिला एवं उप-जिला अस्पतालों के चयनित डॉक्टरों को आरओपी की शुरुआती पहचान और उपचार का प्रशिक्षण देंगे। इससे दूर-दराज के परिजनों को बार-बार उदयपुर की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी।

इम्युनिटी होती है कमजोर, 24 घंटे निगरानी जरूरी

बाल चिकित्सालय के अधीक्षक डॉ. आरएल सुमन के अनुसार, प्री-मैच्योर और कम वजन वाले बच्चों की इम्युनिटी बहुत कमजोर होती है। इसलिए उन्हें विशेष देखभाल की जरूरत होती है। वार्ड में ऐसे बच्चों को रखकर उनकी चौबीसों घंटे निगरानी की जाती है।

घेर सकती हैं ये 6 गंभीर समस्याएं

श्वसन तंत्र : फेफड़े अविकसित रहने से सांस लेने में तकलीफ, ऑक्सीजन या वेंटिलेटर की जरूरत। संक्रमण : प्रतिरोधक क्षमता कम होने से खून में जल्दी इन्फेक्शन फैलने का खतरा। पीलिया : लिवर अपरिपक्व होने से बिलीरुबीन का स्तर तेजी से बढ़ना। पाचन : आंतों का विकास अधूरा रहने से दूध पचाने में कठिनाई। हाइपोथर्मिया: शरीर का तापमान तेजी से गिरना, वार्मर/इंक्यूबेटर की जरूरत। ब्रेन हेमरेज : सिर की नसें बेहद नाजुक होने के कारण दिमाग में रक्तस्राव जोखिम।