देवास के हाटपिपल्या में डोल ग्यारस पर मंगलवार को भगवान नृसिंह की शोभायात्रा निकाली गई। दोपहर में नृसिंह मंदिर से शुरू हुई शोभायात्रा शाम को नृसिंह घाट पहुंची। यहां सभी मंदिरों के डोल को भमोरी नदी के पानी में झुलाकर घाट पर रखा गया। आरती के बाद जयकारों
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एक एक कर प्रतिमा को तीन बार पानी में छोड़ा गया।

प्रतिमा तीनों बार पानी में तैरी
भगवान को दिया गया गार्ड ऑफ ऑनर
नृसिंह मंदिर में आरती के बाद भगवान नृसिंह को डोल में विराजित किया गया। इसके बाद पुलिस ने भगवान को गार्ड ऑफ ऑनर दिया। लक्ष्मीनारायण, राधाकृष्ण, राम, सत्यनारायण और कृष्ण मंदिरों के डोल भी नृसिंह मंदिर पहुंचे।
इसके बाद बैंड-बाजे, डीजे और ढोल-ताशों के साथ शोभायात्रा निकली। यह विभिन्न मार्गों से होते हुए नृसिंह घाट पहुंची। रास्ते में कीर्तन और नृत्य करते हुए श्रद्धालु भी शोभायात्रा में शामिल हुए।
घाट पर सभी डोल की पूजा
नृसिंह घाट पर सभी मंदिरों के डोल को भमोरी नदी के पानी में झुलाकर घाट पर रखा गया। इसके बाद मंदिर की ओर से आरती की गई। जयकारों के बीच पुजारी ने नृसिंह प्रतिमा को नदी के पानी में तीन बार छोड़ा। इस बार प्रतिमा तीनों बार तैरी।
127 साल पुरानी पारिवारिक परंपरा
इस बार 22 वर्षीय अविनय पिता विष्णु दास वैष्णव ने भगवान नृसिंह की प्रतिमा को तैराया। वह अपने पिता, दादा और परदादा की 127 साल पुरानी पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार प्रतिमा को डोल ग्यारस पर तीन बार तैराया जाता है। तीनों बार प्रतिमा तैरने पर आने वाला साल सुखद माना जाता है। दो बार तैरने पर साल के आठ महीने अच्छे रहने की मान्यता है। एक बार तैरने पर वर्ष सामान्य माना जाता है। तीनों बार प्रतिमा डूबने पर वर्ष को लेकर अनिश्चितता की मान्यता है।
354 साल पहले पीपल्या के नाम से बसी थी रियासत
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार महाराणा उदयसिंह के वंशज शंभु सिंह ने मालवा में 354 साल पहले विक्रम संवत 1729 यानी 1672 में एक जागीर बसाई थी। इसका नाम पीपल्या रखा गया, जो वर्तमान में हाटपिपल्या है। नीलकंठ की बावड़ी के पास तत्कालीन शक्तावत राजपरिवार की गढ़ी थी।
विक्रम संवत 1912 यानी 1855 में ठाकुर भुवानी सिंह शक्तावत ने शीतला माता मंदिर के सामने हाट शुरू किया। हाट और व्यापार बढ़ने के कारण पीपल्या का नाम हाटपिपल्या हो गया। यहां आज भी बुधवार को हाट लगता है।
साधु ने राजपरिवार को दी थी प्रतिमा
स्थानीय इतिहास के मुताबिक इसी समय करीब 10 से 15 हाथियों का दल, महावत और साधुओं की जमात नगर में आई थी। तत्कालीन शक्तावत राजपरिवार ने उनकी सेवा की। इससे प्रसन्न होकर एक तपस्वी साधु ने भगवान नृसिंह की पाषाण प्रतिमा राजपरिवार को भेंट की।
साधु ने बताया था कि प्रतिमा रामेश्वरम् से लाई गई है और पानी में तैरती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह नदी के बहाव के उलट दिशा में भी तैरती है। इसके बाद राजा ने गढ़ी में भगवान नृसिंह का मंदिर बनाकर प्रतिमा स्थापित की और डोल ग्यारस पर इसे नदी में तैराने की परंपरा शुरू हुई।
चौथी बार तैराने पर गायब हो गई थी प्रतिमा
स्थानीय इतिहास के मुताबिक एक बार बागली के ठाकुर साहब के कहने पर प्रतिमा को चौथी बार तैराने का प्रयास किया गया। प्रतिमा पानी के अंदर गायब हो गई।
करीब दो महीने बाद पुजारी को स्वप्न में प्रतिमा के सेंधला नदी में तैरते हुए मिलने की जानकारी हुई। इसके बाद नगरवासी और बागली नरेश प्रतिमा को हाथी पर बैठाकर वापस लाए और मंदिर में स्थापित किया।
तीन हिस्सों में टूटने के बाद फिर जुड़ी
मान्यता है कि कुछ साल बाद प्रतिमा तीन हिस्सों में टूट गई। पुजारी ने इसे एक स्वर्णकार से चांदी के तार से बंधवाया। कुछ दिन बाद प्रतिमा अपने आप पहले जैसी जुड़ गई और चांदी का तार भी गायब हो गया।
7 से 8 फीट तक तैरने का दावा
यह ठोस पत्थर की 7.5 किलो वजनी प्रतिमा है। स्थानीय लोगों के अनुसार इसे तैरते हुए देखने के लिए दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु आते हैं। पुजारी स्नान और मंगल मंत्रोच्चार के बाद प्रतिमा को नदी के पानी में छोड़ते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक प्रतिमा पानी की सतह पर करीब 7 से 8 फीट तक तैरती है।

इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।