भारत की 7.8% GDP ग्रोथ पर कई देशों ने उठाए सवाल, चीन ने की तारीफ; आखिर क्यों?

Published on 8 सित॰ 2026

भारत की 7.8% GDP ग्रोथ पर कई देशों ने उठाए सवाल, चीन ने की तारीफ; आखिर क्यों?

चीनी मीडिया ने की भारत की GDP की तारीफ

भारत ने जैसे ही अप्रैल से जून तक की तिमाही में अपनी ग्रोथ रिपोर्ट 7.8 परसेंट घोषित की, दुनिया के अधिकांश देशों की मीडिया ने इसे झूठ कह दिया. अमेरिका की मीडिया ने भी और यूरोप के प्रेस ने भी. यहां तक कि BBC ने भी लिखा कि भारत ने झूठ बोला है, लेकिन ऐसे समय में अचानक चीन का सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ भारत के बचाव में उतर आया. उसने खुल कर भारत की विकास दर को बेहतर बताया.

चीन और भारत के जिस तरह के शीतोष्ण संबंध हैं, उसमें चीनी मीडिया द्वारा भारत की तारीफ चौंकाती है. उसने भारत की आर्थिक प्रगति को भारत की मजबूती के रूप में देखा है और मोदी सरकार की मल्टी अलाइनमेंट वाली लाइन को सराहा है. चीनी अधिकारियों और प्रेस का मानना है कि यह भारत सरकार की निष्पक्षता और मजबूती का प्रमाण है. चीन के अनुसार विश्व मंच पर अब भारत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

आंकड़ों की बाजीगरी

भारत के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने सबसे पहले हमला किया. उन्होंने कहा कि आंकड़े झूठे हैं, वास्तविक ग्रोथ रेट 2.6 प्रतिशत से भी कम है. वहीं, रघुराम राजन ने पूछा, अगर ग्रोथ रेट इतनी अधिक है तो भारत में जमीनी स्तर पर वह दिख क्यों नहीं रही. बेरोजगारी और इस वजह से युवाओं में असंतोष इसका साफ प्रमाण है. अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने इसे आंकड़ों की बाजीगरी बताते हुए खारिज कर दिया.

हालांकि IMF (विश्व मुद्रा कोष) ने भारत की ग्रोथ रेट साढ़े छह प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था, लेकिन अनुमान के विपरीत चीन के ग्लोबल टाइम्स ने भारत की ग्रोथ रेट के 7.8 प्रतिशत होने के आंकड़ों का बचाव किया. उसने कहा कि जमीनी धरातल पर भारत की ग्रोथ रेट पिछली तिमाही में संतोषप्रद रही. भारत मजबूती की ओर लगातार बढ़ रहा है.

ग्लोबल टाइम्स ने कहा- भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत

भारत का बचाव करते हुए ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भारत की जीडीपी 7.8 प्रतिशत बढ़ना उसकी अपनी है. मगर चूंकि ग्लोबल लेबल पर GDP सदैव अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दिखाई जाती है, इसलिए विश्व रैंकिंग में वह पिछड़ जाती है. इसकी वजह भारतीय रुपये का डॉलर के मुकाबले उतार-चढ़ाव है. चूंकि भारत ने खुद अपनी GDP ग्लोबल तौर पर 3.92 ट्रिलियन दर्शाई है, जिस कारण वह विश्व की छठे नंबर की अर्थव्यवस्था है.

ग्लोबल टाइम्स के अनुसार, भारत का खिसक कर छठे नंबर पर पहुंचने से उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर नहीं होती. यह डॉलर के मुकाबले जरूर पिछड़ी है, लेकिन GDP की ग्रोथ पिछली तिमाही में 7.8 परसेंट होना एक हकीकत है. यह भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था का भी संकेत है. पहले वह डॉलर की रैंकिंग में चौथे स्थान पर था, पर अब जापान और जर्मनी से पीछे हो गया है.

चीन भारत से व्यापार बढ़ाने को उत्सुक

चीनी मीडिया इसे भारत की मजबूती बता रहा है. इससे दुनिया के अन्य देश और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ चौंके हैं. उनको लगता है कि ड्रैगन अचानक कैसे भारत की सराहना करने लगा, लेकिन यह नई बात नहीं है. चीन पिछले तीन साल से भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती की बात कर रहा है. चीन ने 2023 में ही अनुमान लगा लिया था कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन का हारना तय है, क्योंकि जो बाइडेन आखिरी वक्त तक फिर से राष्ट्रपति चुनाव लड़ने को लालायित थे.

साथ ही चीन यह बात भी समझ रहा था कि अमेरिका आर्थिक रूप से जर्जर हो रहा है. इसलिए कमान अब रिपब्लिकन पार्टी को मिलेगी और उसमें भी कट्टरपंथी डोनाल्ड ट्रंप ही जीतेंगे. ट्रंप के जीतने का अर्थ है अमेरिकी बाजार से चीन का बहिष्कार. उधर चीनी राजनयिक भारत में मोदी की तीसरी जीत का अनुमान भी लगा बैठे थे.

भारत की भी चीन से दोस्ती बढ़ाने की मजबूरी

यही कारण है कि चीन अपने उत्पाद के लिए भारत के विशाल मध्य वर्ग को देख रहा था. वह यह बात समझ चुका था कि आने वाला रिपब्लिकन शासन आयात को घटाएगा. यही हुआ भी. भारत भी अमेरिका को निर्यात करता था और आयात कम. उसके लिए भी संकट मुंह बाये खड़ा था, लेकिन उसे अपनी मल्टी अलाइनमेंट पालिसी पर भरोसा था, पर 2025 में अमेरिका ने ऑपरेशन सिंदूर के वक्त आंखें दिखा दीं. चीन तो पहले से भी भारत से मैत्री भाव नहीं रखता था और रूस ने भी चुप्पी साध ली. तब भारत को लगा कि उसे अपने मित्रों को परखना होगा.

BRICS को होस्ट इस बार भारत कर रहा है, इसलिए भारत ने भी चीन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया. अपने NSA अजीत डोभाल को चीन भेजा और विदेश मंत्री जयशंकर रूस में पुतिन से मिले. वहीं, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अमेरिका गईं. वो अमेरिका के साथ कनाडा भी गईं.

बदलती विदेश नीति-नेहरू से मोदी तक

भारत की इस पहल से साफ हो गया कि भारत को एशियाई देशों से मित्रता बढ़ानी होगी. प्रधानमंत्री खुद अभी अगस्त के लास्ट में SCO (शंघाई सहयोग संगठन) की मीटिंग में शामिल होने के लिए किर्गिस्तान गए. इन सबसे स्पष्ट लगने लगा कि भारत अब अपनी पुरानी विदेश नीति बदल रहा है. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय भारत ने निर्गुट रहने की जो पॉलिसी अपनाई थी, वह अब लाभदायक नहीं रही. तब भारत सोचता था, सभी महा शक्तियों से दूर रहना, लेकिन अब पॉलिसी है सबसे समान मित्रता रखना, क्योंकि आज के दौर में सबके साथ दोस्ती रखनी होगी. पता नहीं कौन कब माल खरीदना बंद कर दे. ऐसे में ‘तू नहीं तो वो’ की पॉलिसी अधिक कारगर रहेगी. यही कारण है कि भारत अब यूरोप से भी संबंध सुधार रहा है और रूस और चीन से भी.

भारत को चीन से इन्वेस्टमेंट की उम्मीद

चूंकि भारत और चीन की GDP और प्रति व्यक्ति आय में जमीन-आसमान का फर्क है, लेकिन फिर भी चीन द्वारा भारत की तारीफ करना एक नया संदेश है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वार से निपटने के लिए एशिया के इन दोनों बड़े देशों का करीब आना शुभ संकेत है. यूं भी 11, 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुद आ रहे हैं और उनके साथ 400 लोगों का एक शिष्ट मंडल भी होगा, जिसमें चीनी कूटनीतिक, अर्थशास्त्री और बड़े उद्योगपति और व्यवसायी भी होंगे. उनके भारत आने का मतलब है, वो भारत का बाजार तलाशेंगे और हो सकता है कि वो लोग भारत में इन्वेस्ट भी करें. भारतीय बाजार और व्यवसायियों के लिए अमेरिका द्वारा टैरिफ लगा देने से जो झटका लगा है, उसमें संभावना है कि चीन के इन्वेस्टमेंट से राहत मिले.

बाजार के रास्ते खोजने और आविष्कार में चीन अव्वल

हालांकि एक दिक्कत है कि घरेलू उपयोग की सारी चीजें चीन खुद बनाता है. उसके उत्पाद सस्ते हैं और चीन टेक्नोलॉजी में दुनिया में सबसे आगे है. इसलिए चीन में भारतीय व्यवसायियों के लिए बाजार तलाशना तो मुश्किल होगा, लेकिन अगर चीन भारत में इन्वेस्ट करता है तो यह राहत की बात होगी. व्यापार के मामले में चीन आज से नहीं बल्कि हजारों साल पहले से अगुआ रहा है. उसके उत्पाद ईसा पूर्व के काल में भी ईरान, अरब और यूरोप के बाजारों में जाते रहे हैं. बारूद की खोज सबसे पहले चीन ने ही दसवीं शताब्दी में कर ली थी. बारूद (GUN POWDER) बाद में मंगोलिया और मध्य एशिया के देशों में पहुंचा. भारत में बाबर ने जब पानीपत में सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराया तो इसी बारूद के बूते. खानवा के मैदान में राणा सांगा को भी उसने बारूद का प्रयोग कर पराजित किया था.

द ग्रेट वाल ऑफ चाइना

कागज और छपाई उद्योग का आविष्कार भी चीन ने 11वीं सदी में कर लिया था. सिल्क रोड की खोज भी चीनी व्यापारियों ने की थी. जो देश व्यापार का अगुआ होगा, वह अपने माल, जान और तकनीक की रक्षा के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहेगा. इसीलिए चीन ने अपनी रक्षा के लिए द ग्रेट वाल ऑफ चाइना का निर्माण ईसा की दो शताब्दी पहले से शुरू कर दिया था. यह दीवार 17वीं शताब्दी में आकर पूर्ण हुई. सम्राट किन शी हुआंग से लेकर मिग वंश तक इसका निर्माण चला. यह दीवार 21,196 किमी लंबी है. इसमें चौकियां हैं, सैनिकों के लिए बैरकें हैं और शत्रुओं के हमले की सूचना राजधानी तक पहुंचाने के लिए संकेतक फिट हैं. इसी से पता चलता है कि चीन की तकनीक दुनिया में सबसे पुरानी है.

सुधारने होंगे सामरिक रिश्ते

चीन को भारत के साथ अपने कूटनीतिक संबंध सुधारने होंगे. भारत 1962 की चोट आज तक नहीं भूला है. भारत ने पहली बार अपना भूभाग (अक्साई चिन) खोया था. लगभग 43 हजार वर्ग किमी का क्षेत्र चीन के पास है. इसमें 38 हजार वर्ग किमी तो अक्साई चिन है, जो लद्दाख का हिस्सा है. इसके अलावा अरुणाचल पर भी चीन अपना हक जताता है. अक्सर वह अपने राजनीतिक नक्शों में फेर-बदल किया करता है. चीन के साथ सीमा पर झड़पें भी अक्सर हो जाती हैं. सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने के लिए चीन को इस मुद्दे पर भी सोचना होगा.

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शंभूनाथ शुक्ल

शंभूनाथ शुक्ल

शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार हैं. 1974-75 के छात्र आंदोलन के दौरान वे B.Sc. कर रहे थे किंतु पढ़ाई अधूरी छोड़ कर वे कलकत्ता चले गए. तब वहां सिद्धार्थ शंकर रॉय की सरकार आंदोलन कर रहे छात्रों पर गोलियाँ चलवा रही थी. श्री शुक्ल किसी तरह वहां से कानपुर आ गए और आईआईटी में वामपंथी छात्रों के साथ रह कर मार्क्स, एंजेल्स और लेनिन को पढ़ा. सोवियत (रूसी) और चीनी कम्युनिस्ट साहित्य की खूब पढ़ाई शुरू की. यूरोप और अमेरिका का इतिहास पढ़ा. देश और विदेश को समझने की नई दृष्टि उन्हें मिली. आईआईटी और मेडिकल छात्रों के साथ रहने से अंग्रेजी से अनुवाद में पारंगत हुए. देश में युवाओं, किसानों और दलित व पिछड़ी जातियों की पीड़ा को उन्होंने गहराई से समझा. यहीं से लेखन उनकी प्रेरणा बना क्योंकि लेखों के ज़रिए ही वे अपनी इस दृष्टि का विस्तार कर सकते थे. कोलकाता से प्रकाशित होने वाली आनंद बाज़ार पत्रिका समूह की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ ने उनकी एक स्टोरी को कवर स्टोरी बना कर छापा- ‘अर्जक संघ; उत्तर प्रदेश का डीएमके’ यह स्टोरी बहुत चर्चित हुई और वे सक्रिय रूप से पत्रकारिता में आ गए. कानपुर में ही दैनिक जागरण ने उन्हें अपने स्टाफ में रख लिया और कुछ सीरियस विषयों पर उनसे खोजपूर्ण काम करवाए. उन दिनों आईआईटी में कई दलित छात्र अंग्रेजी के भय से सुसाइड कर लेते थे, उस पर उन्होंने इन एलीट संस्थानों के भीतर हरिजन (अब दलित) छात्रों की पीड़ा को तह तक जा कर उजागर किया. भागलपुर के आंख फोड़ो कांड की रिपोर्ट के लिए उन्हें वहां भेजा गया. उस कांड को तब तक विस्तार के साथ अरुण शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट लिखी थी. शुक्ल जी श्री शौरी से वहां मिले और दैनिक जागरण के लिए इस कांड की ज़मीनी रिपोर्टिंग की. 1983 में जब जनसत्ता निकला तब संपादक प्रभाष जी की शुरुआती टीम में शंभूनाथ शुक्ल भी थे. बाद में वे जनसत्ता के चंडीगढ़ और कोलकाता संस्करणों के संपादक बनाये गये. 2003 में अमर उजाला के कानपुर संस्करण का कामकाज संभाला और फिर दिल्ली, लखनऊ और मेरठ में अमर उजाला में कार्यकारी संपादक रहे. फ़िलहाल वे फ्री लांसिंग कर रहे हैं. पिछले कई वर्षों से वे TV 9 डिजिटल में लेख भी लिख रहे हैं. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, दर्शन और समाज शास्त्रीय विश्लेषण में उनकी गहन रुचि है.

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