Sharat Saxena Birthday: बॉलीवुड में कुछ कलाकार ऐसे रहे हैं जिन्होंने भले ही लीड हीरो के तौर पर लंबी पारी न खेली हो, लेकिन अपनी अलग पहचान जरूर बनाई है. शरत सक्सेना भी ऐसे ही कलाकारों में शामिल हैं. जी हां, दमदार पर्सनैलिटी, मजबूत कद-काठी और शानदार एक्टिंग की वजह से उन्होंने फिल्मों में विलेन से लेकर कॉमेडी और सपोर्टिंग किरदारों तक अपनी खास जगह बनाई. शरत सक्सेना ने 1970 के दशक में बॉलीवुड में कदम रखा था और इसके बाद उन्होंने हिंदी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं की फिल्मों में भी काम किया.
फिल्मों में उनके काम को दर्शकों ने काफी पसंद किया. वहीं टीवी के मशहूर सीरियल ‘महाभारत’ में भी उन्होंने कीचक का किरदार निभाया था. शरत सक्सेना का जन्म 17 अगस्त 1950 को मध्य प्रदेश के सतना में हुआ था. ऐसे में 17 अगस्त 2026 को वो अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं. लेकिन उनकी कहानी सिर्फ उनकी फिल्मों और फिटनेस तक सीमित नहीं है. एक्टिंग की दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा था.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ चुनी एक्टिंग
शरत सक्सेना का जन्म सतना में हुआ लेकिन उनकी पढ़ाई-लिखाई मध्य प्रदेश में हुई. उन्होंने भोपाल और जबलपुर में शिक्षा हासिल की और जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उनका मन इंजीनियरिंग में नहीं लगा. उनके भीतर एक्टिंग का जुनून था और वो फिल्मों में अपना करियर बनाना चाहते थे. इसी सपने को पूरा करने के लिए वो 1972 में मुंबई आ गए.
मुंबई जैसे शहर में एक आउटसाइडर के तौर पर फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाना उनके लिए आसान नहीं था. उस दौर में उन्हें लगातार काम पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. उनकी मजबूत बॉडी की वजह से उन्हें ज्यादातर ऐसे किरदारों के लिए देखा जाता था, जिनमें एक्शन या विलेन का एंगल होता था.
‘बेनाम’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर
शरत सक्सेना को फिल्मों में शुरुआती पहचान ‘बेनाम’ से मिली. फिल्म में अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी जैसे बड़े कलाकार थे. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार फिल्मों का हिस्सा बनते गए. इसके बाद उन्होंने ‘दिल दीवाना’, ‘एजेंट विनोद’, ‘काला पत्थर’ सहित कई फिल्मों में काम किया. धीरे-धीरे वो इंडस्ट्री में एक ऐसे कलाकार के तौर पर पहचाने जाने लगे, जिनकी स्क्रीन प्रेजेंस मजबूत थी. उनकी खासियत ये रही कि उन्होंने सिर्फ विलेन के किरदारों तक खुद को सीमित नहीं रखा. उन्होंने गंभीर भूमिकाओं के अलावा कॉमेडी और सपोर्टिंग रोल भी किए.
‘मिस्टर इंडिया’ से ‘बजरंगी भाईजान’
शरत सक्सेना ने अपने लंबे करियर में कई यादगार फिल्मों में काम किया. ‘मिस्टर इंडिया’, ‘त्रिदेव’, ‘घायल’, ‘खिलाड़ी’, ‘गुलाम’, ‘गुप्त: द हिडन ट्रुथ’, ‘सोल्जर’, ‘बागबान’, ‘फना’, ‘कृष’ और ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्मों में वह अलग-अलग भूमिकाओं में दिखाई दिए. ‘बजरंगी भाईजान’ में उनके किरदार को भी दर्शकों ने पसंद किया. वहीं आमिर खान की ‘गुलाम’ में उनके काम के लिए उन्हें फिल्मफेयर के बेस्ट विलेन अवॉर्ड के लिए नॉमिनेशन भी मिला था. 2021 में वो विद्या बालन स्टारर फिल्म ‘शेरनी’ में भी नजर आए, जिसमें उनके काम को सराहा गया.
300 से ज्यादा फिल्मों में काम करने का दावा
शरत सक्सेना का फिल्मी करियर करीब पांच दशक लंबा रहा है. अलग-अलग सोर्सेस में उनके फिल्म क्रेडिट की संख्या अलग-अलग मिलती है, लेकिन IMDb पर उनके नाम से 300 से ज्यादा क्रेडिट्स दर्ज हैं. हिंदी फिल्मों के अलावा उन्होंने तमिल, तेलुगु और मलयालम सिनेमा में भी काम किया है. यही वजह है कि उनका फिल्मी सफर सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं रहा.
‘मेरी बॉडी ही मेरे लिए समस्या बन गई थी’
शरत सक्सेना ने अपने करियर को लेकर कई बार खुलकर बात की है. उनके मुताबिक, उनकी मजबूत कद-काठी की वजह से उन्हें इंडस्ट्री में एक खास तरह के रोल ही ज्यादा मिलते थे. उन्होंने एक इंटरव्यू में अपनी परेशानी जाहिर करते हुए बताया था कि उन्हें लगता था कि इंडस्ट्री में उन्हें वो मुकाम नहीं मिला जिसके वो हकदार थे. उनकी बॉडी के कारण उन्हें ज्यादातर एक्शन और विलेन वाले किरदार दिए जाते थे. उनके मुताबिक, कई फिल्मों में उनका इस्तेमाल ऐसे किरदार के तौर पर किया जाता था, जिसे हीरो आकर पीट देता था. यानी वो कई बार सिर्फ ‘हीरो के हाथों पिटने वाले विलेन’ तक सीमित होकर रह जाते थे. हालांकि, शरत ने इन परिस्थितियों के बावजूद लगातार काम किया और धीरे-धीरे अपनी पहचान को मजबूत बनाया.
उम्रदराज कलाकारों के लिए काम
शरत सक्सेना ने फिल्म इंडस्ट्री में उम्रदराज कलाकारों को मिलने वाले काम को लेकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की थी. उनका कहना था कि इंडस्ट्री में बुजुर्ग कलाकारों के लिए अच्छे किरदारों की कमी है. उनके मुताबिक, उम्रदराज कलाकारों के लिए जो अच्छे रोल लिखे जाते हैं, उनमें अक्सर अमिताभ बच्चन जैसे बड़े कलाकारों को ध्यान में रखा जाता है और बाकी कलाकारों के हिस्से बहुत कम विकल्प आते हैं.
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