हाईकोर्ट ने BCCL से जुड़े जमीन विवाद में अपीलीय आदेश किया रद्द

Published on 29 सित॰ 2026

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद के सरायढेला में 11 डिसमिल जमीन पर BCCL और जमीन खरीदार के बीच चल रहे विवाद में प्रधान जिला जज, धनबाद के आदेश को रद्द कर दिया. अदालत ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए अपीलीय अदालत में भेजते हुए उपलब्ध दस्तावेजों पर विचार करने का निर्देश दिया है. साथ ही जरूरत पड़ने पर दोनों पक्षों की मौजूदगी में जमीन की दोबारा मापी कराने की छूट भी दी है. हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने तपेश्वर सिंह की याचिका को स्वीकार कर लिया. 


दरअसल मामले में याचिकाकर्ता तपेश्वर सिंह ने सरायढेला मौजा में खाता संख्या 90, प्लॉट संख्या 84 की 11 डिसमिल जमीन वर्ष 2004 में रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से खरीदी थी. इसके बाद जमीन का म्यूटेशन उनके नाम हुआ, कर रसीद जारी हुई और मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MADA) ने मकान निर्माण के लिए नक्शा भी स्वीकृत किया.

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बाद में BCCL ने दावा किया कि उक्त जमीन उसके द्वारा भू-अर्जन केस संख्या 7/65-66 के तहत अधिग्रहित भूमि का हिस्सा है और याचिकाकर्ता ने BCCL की जमीन पर अतिक्रमण किया है. इसके बाद एस्टेट ऑफिसर के समक्ष कार्रवाई शुरू हुई. याचिकाकर्ता ने जमीन की मापी और सीमांकन कराने की मांग की, लेकिन यह मांग खारिज कर दी गयी. एस्टेट ऑफिसर ने 22 जून 2017 को जमीन पर अतिक्रमण का आदेश पारित किया. इसके खिलाफ दायर अपील को प्रधान जिला जज, धनबाद ने 7 अगस्त 2023 को खारिज कर दिया था.

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि एस्टेट ऑफिसर के समक्ष सेल डीड, म्यूटेशन आदेश, कर रसीद, MADA का नक्शा स्वीकृति पत्र, BCCL का पत्र और मापी से संबंधित पत्र समेत कई दस्तावेज प्रस्तुत किये गये थे. इसके बावजूद अपीलीय अदालत ने यह कह दिया कि याचिकाकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया.


हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलीय अदालत की यह टिप्पणी रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों के विपरीत है. अदालत ने कहा कि प्लॉट संख्या 84 कुल 44 डिसमिल का है, जबकि BCCL भी उसमें से 11 डिसमिल जमीन अधिग्रहित होने का दावा कर रहा है और याचिकाकर्ता भी उसी 11 डिसमिल हिस्से को अपनी खरीदी हुई जमीन बता रहा है. ऐसे में जमीन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए मापी महत्वपूर्ण थी.


अदालत ने कहा कि यदि किसी अधीनस्थ अदालत द्वारा गलत तरीके से मामले पर विचार किया जाता है या जरूरी तथ्यों पर निष्कर्ष नहीं दिया जाता है, तो यह अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि हो सकती है और संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट उसमें हस्तक्षेप कर सकता है.


इसके बाद हाईकोर्ट ने 7 अगस्त 2023 के प्रधान जिला जज, धनबाद के आदेश को रद्द कर दिया और सिविल मिसलेनियस अपील संख्या 37/2017 को फिर से बहाल कर दिया. प्रधान जिला जज को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता के दस्तावेजों पर विचार करते हुए दोनों पक्षों को सुनने के बाद मामले का नए सिरे से फैसला करें.


अदालत ने यह भी कहा कि सही निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए अपीलीय प्राधिकारी सक्षम सरकारी प्राधिकारी से दोनों पक्षों की मौजूदगी में विवादित जमीन की मापी करा सकता है. दोनों पक्षों को 5 अक्टूबर 2026 को सुबह 10:30 बजे प्रधान जिला जज, धनबाद की अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है.

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