Bhutan की नदियां बनीं कमाई का बड़ा जरिया, India को बेचता है बिजली; जानिए कैसे दोनों देशों को हो रहा फायदा

Published on 4 सित॰ 2026


भूटान क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से भले ही छोटा देश है, लेकिन हाइड्रोपावर के क्षेत्र में उसने अपनी अलग पहचान बनाई है। हिमालयी पहाड़ों से निकलने वाली तेज बहाव वाली नदियां भूटान की सबसे बड़ी प्राकृतिक ताकत हैं। देश में बिजली की घरेलू मांग सीमित होने के कारण बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से पैदा होने वाली अतिरिक्त बिजली भारत को निर्यात की जाती है।

इस पूरी व्यवस्था में भारत की आर्थिक मदद, तकनीकी विशेषज्ञता और बड़ा बिजली बाजार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि भूटान और भारत के बीच हाइड्रोपावर को लेकर लंबे समय से आपसी फायदे वाली साझेदारी बनी हुई है।

हिमालयी नदियां हैं भूटान की सबसे बड़ी ताकत

भूटान हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जहां कई नदियां ऊंचे पहाड़ी इलाकों से तेजी से नीचे की ओर बहती हैं। इन नदियों को बारिश के साथ-साथ बर्फ और ग्लेशियर के पिघलने से भी पानी मिलता है। ऊंचाई में बड़ा अंतर और तेज बहाव हाइड्रोपावर उत्पादन के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाते हैं।

भूटान की संभावित हाइड्रोपावर क्षमता करीब 30,000 मेगावाट आंकी जाती है। ऐसे में पानी के संसाधन देश की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपत्तियों में शामिल हैं।

घरेलू बिजली की मांग सीमित

भूटान की आबादी 8 लाख से कम है। देश में भारत या दूसरे बड़े देशों की तरह बड़े पैमाने पर भारी उद्योग भी नहीं हैं। इसलिए घरेलू स्तर पर बिजली की मांग उसकी संभावित उत्पादन क्षमता की तुलना में काफी कम है।

बड़े हाइड्रोपावर प्लांट जब अपनी क्षमता के अनुसार बिजली पैदा करते हैं तो घरेलू जरूरत पूरी होने के बाद बिजली बच जाती है। इसी अतिरिक्त बिजली को भूटान भारत को बेचकर विदेशी आय हासिल करता है।

भारत की मदद से तैयार हुए बड़े प्रोजेक्ट

बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट तैयार करने के लिए भारी निवेश, आधुनिक इंजीनियरिंग और तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती है। भूटान को इन क्षेत्रों में दशकों से भारत का सहयोग मिलता रहा है।

भारत ने ग्रांट और रियायती ऋण के जरिए आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में तकनीकी सहयोग भी किया है। इससे भूटान के लिए अपनी नदियों की ऊर्जा क्षमता को आर्थिक संसाधन में बदलना संभव हुआ।

चुखा से मांगदेछु तक कई बड़े प्रोजेक्ट

भारत-भूटान सहयोग से देश में कई महत्वपूर्ण हाइड्रोपावर परियोजनाएं विकसित हुई हैं। इनमें चुखा, ताला, मांगदेछु और पुनातसांगछु-II जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।

इन प्रोजेक्ट्स ने भूटान की बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ भारत को बिजली निर्यात करने की उसकी क्षमता को भी मजबूत किया है।

570 मेगावाट प्रोजेक्ट से बढ़ेगा सहयोग

हाइड्रोपावर क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा अब और बढ़ रहा है। हाल ही में 570 मेगावाट की परियोजना के विकास के लिए अडानी पावर और भूटान की सरकारी कंपनी के बीच करीब 6,000 करोड़ रुपये के समझौते की खबर सामने आई है। इससे आने वाले समय में भूटान के हाइड्रोपावर सेक्टर में निवेश और क्षमता बढ़ने की उम्मीद है।

भूटान के लिए बिजली निर्यात क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

भूटान के लिए हाइड्रोपावर सिर्फ बिजली पैदा करने का माध्यम नहीं है। भारत को बिजली बेचने से मिलने वाली आय उसकी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण योगदान देती है।

बिजली निर्यात से होने वाली कमाई का इस्तेमाल देश के विकास और विभिन्न सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाने में किया जा सकता है। इस तरह भूटान अपनी प्राकृतिक जल संपदा को आर्थिक विकास के साधन में बदल रहा है।

भारत को भी मिलता है फायदा

यह साझेदारी सिर्फ भूटान के लिए फायदेमंद नहीं है। भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भूटान से हाइड्रोपावर आयात करने से भारत को अतिरिक्त नवीकरणीय बिजली मिलती है।

हाइड्रोपावर कोयला आधारित बिजली की तुलना में कम कार्बन उत्सर्जन वाला स्रोत है। इसलिए भूटान से मिलने वाली बिजली भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की कोशिशों में भी योगदान दे सकती है।

छोटी अर्थव्यवस्था, बड़ा ऊर्जा संसाधन

भूटान की कहानी यह दिखाती है कि सीमित आबादी वाला देश भी अपने प्राकृतिक संसाधनों और पड़ोसी देशों के सहयोग का इस्तेमाल करके बड़ी आर्थिक क्षमता तैयार कर सकता है। भूटान अपनी नदियों और हाइड्रोपावर क्षमता का इस्तेमाल करता है, भारत वित्तीय और तकनीकी सहयोग के साथ एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराता है।

यानी भूटान की तेज बहती नदियां सिर्फ बिजली नहीं बना रहीं, बल्कि भारत-भूटान की आर्थिक साझेदारी को भी मजबूती दे रही हैं।