CG High Court: बिलासपुर HC की निजी शरिया कोर्ट पर अहम टिप्पणी, कहा- वैवाहिक दर्जा तय करने और तलाक का कानूनी फैसला देने का अधिकार नहीं

Published on 8 सित॰ 2026

CG High Court Talak Decision:छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निजी शरिया कोर्ट (Private Sharia Court )को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कोई भी निजी या धार्मिक संस्था किसी व्यक्ति के वैवाहिक दर्जे को कानूनी तौर पर तय नहीं कर सकती। ऐसी संस्था को अदालत का दर्जा भी नहीं दिया जा सकता। दरअसल हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की। 

कोर्ट ने कहा कि तलाक (Talak) जैसे वैवाहिक मामलों में किसी धार्मिक संस्था की राय अपने आप कानूनी फैसला नहीं बन जाती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के वैवाहिक अधिकार और उसकी कानूनी स्थिति का फैसला देश के कानून के अनुसार ही होगा। इस मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट Bilaspur High Court ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का भी हवाला दिया और निजी संस्थाओं की कानूनी सीमाओं को स्पष्ट किया।

इदारा-ए-शरिया के तलाक आदेश पर सवाल

दरअलस पूरा मामला इदारा ए शरिया (Idara E Sharia )की ओर से जारी किए गए तलाक आदेश से जुड़ा है। जिसमें रायपुर की एक महिला ने इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें महिला ने इस आदेश को लेकर आपत्ति जताई गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी निजी धार्मिक संस्था की ओर से जारी किया गया ​तलाक का आदेश (Divorce Order) अपने आप कानूनी तलाक नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इदारा-ए-शरिया की ओर से जारी तलाक के आदेश को खारिज कर दिया। 

अदालत ने कहा कि वैवाहिक संबंधों से जुड़े अधिकारों का फैसला संबंधित कानून के तहत ही किया जाएगा। यानी किसी धार्मिक संस्था की ओर से जारी राय या आदेश तभी कानूनी प्रभाव रख सकता है, जब उसके लिए कानून में स्पष्ट अधिकार दिया गया हो।

निजी संस्था नहीं तय कर सकती वैवाहिक दर्जा

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि निजी (Private Sharia Court )को देश की सामान्य अदालत की तरह कानूनी अधिकार हासिल नहीं हैं। कोई संस्था धार्मिक या सामाजिक आधार पर अपनी राय दे सकती है, लेकिन वह किसी व्यक्ति का वैवाहिक दर्जा कानूनी रूप से तय नहीं कर सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी संस्थाओं को अदालत का दर्जा नहीं दिया जा सकता। इसका मतलब यह है कि किसी महिला या पुरुष के तलाकशुदा होने, विवाहित होने या वैवाहिक संबंध खत्म होने की कानूनी स्थिति केवल निजी संस्था के आदेश से तय नहीं होगी। इस तरह के मामलों में कानून के तहत सक्षम अदालत या संबंधित कानूनी प्रक्रिया ही मान्य होगी। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को वैवाहिक विवादों में निजी धार्मिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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