Aug 12, 2026 05:44 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
CJI सूर्यकांत ने 'ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन' मामले में न्यायिक अधिकारियों की व्यक्तिगत अर्जियों पर ये कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों को सर्विस की शर्तों आदि से जुड़ी व्यक्तिगत अर्जियां बार-बार दाखिल न करने की सलाह दी।

देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत।
देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत आज (बुधवार, 12 अगस्त को) अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ बनाम केंद्र सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान जजों पर ही नाराज हो गए। उन्होंने सुनवाई के दौरान निचली अदालतों के न्यायिक अधिकारियों की इस बात के लिए आलोचना की कि वे अपने मूल न्यायिक कार्य और न्याय प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय बार-बार व्यक्तिगत सेवा-संबंधी आवेदन दायर कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक कार्य करने की बजाय ये लोग कोर्ट कॉरिडोर का चक्कर लगाते रहते हैं।
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस बी मोहना की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी। लाइव लॉ के मुताबिक, तभी CJI ने कहा, "न्यायिक कामकाज पर ध्यान देने के बजाय, वे कोर्ट के गलियारों में घूम रहे हैं।" इसके साथ ही CJI सूर्यकांत ने 'ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन' मामले में न्यायिक अधिकारियों की व्यक्तिगत अर्जियों पर कड़ी टिप्पणी की। CJI ने न्यायिक अधिकारियों को सर्विस की शर्तों आदि से जुड़ी व्यक्तिगत अर्जियां बार-बार दाखिल न करने की सलाह दी।
अब कोई अंतरिम अर्जी नहीं
इसके बाद सीनियर वकील विकास सिंहने कहा, "नहीं माय लॉर्ड्स, वे अपना न्यायिक काम कर रहे हैं। हम (वकील) यहां आ रहे हैं, वे नहीं।" इसी बीच, एक वकील एक अर्ज़ी पर अपनी बात रखने लगा। इस पर CJI ने उन्हे टोका, "आप इतने आक्रामक क्यों हो रहे हैं... हमें तो यह भी नहीं पता कि आपका मामला क्या है और आप बस अपनी ही बात कहे जा रहे हैं... यह क्या है?" उन्होंने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि एमिकस (न्याय मित्र) की मंज़ूरी के बिना ज़िला न्यायपालिका से जुड़ी किसी भी IA (अंतरिम अर्ज़ी) पर विचार नहीं किया जाएगा।
क्या है मामला?
दरअसल, ये मामला अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ के तहत न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों से संबंधित है। मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक अधिकारियों की उस प्रवृत्ति की आलोचना की जिसमें वे अदालती कर्तव्यों को प्राथमिकता देने के बजाय सेवा संबंधी मामलों पर बार-बार व्यक्तिगत आवेदन दाखिल करते हैं। न्यायिक देरी और जिम्मेदारियों पर प्रकाश डालते हुए, पीठ ने इस प्रथा की निंदा की कि न्यायिक अधिकारिी लंबित मुकदमों को निपटाने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय में व्यक्तिगत प्रशासनिक या सेवा संबंधी शिकायतों को निपटाने में समय व्यतीत करते हैं।
लोगों के दरवाज़ों तक न्याय पहुँचाया जाना चाहिए
अभी हाल ही में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि न्याय को कोर्टरूम के दरवाज़ों के पीछे इंतजार नहीं करना चाहिए। इसे लोगों के दरवाज़ों तक पहुँचाया जाना चाहिए। शनिवार को CJI सूर्य कांत ने इंदौर में नेशनल लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी (NALSA) के वेस्ट ज़ोन रीजनल कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा, “न्याय को नागरिक तक पहुँचना चाहिए, न कि नागरिक से न्याय तक आने की उम्मीद करनी चाहिए।”
न्याय तक सार्थक पहुँच के लिए बातचीत, सम्मान और सबको साथ लेकर चलने (समावेशन) को तीन मुख्य आधार बताते हुए जस्टिस कांत ने कहा कि संविधान में किए गए समान न्याय के वादे को तभी पूरा किया जा सकता है जब कानूनी संस्थाएँ ज़्यादा मानवीय, ज़्यादा सुलभ और आम नागरिकों की हकीकत के प्रति ज़्यादा संवेदनशील बनें। उन्होंने ज़ोर दिया कि न्याय तक पहुँच की शुरुआत कानूनों या अदालती आदेशों से नहीं, बल्कि लोगों की बात सुनने से होती है।
