दिल्ली विधानसभा के डिप्टी स्पीकर मोहन सिंह बिष्ट ने रविवार को वीर विट्ठलभाई पटेल और शहीद भगत सिंह की जयंती पर उन्हें याद किया। उन्होंने देश की आजादी और संसदीय इतिहास में दोनों के योगदान को नमन किया।
रविवार को दिल्ली विधानसभा के डिप्टी स्पीकर मोहन सिंह बिष्ट ने वीर विट्ठलभाई झवेरभाई पटेल और शहीद भगत सिंह को उनकी जयंती पर फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई और संसदीय इतिहास में दोनों महापुरुषों के योगदान को याद किया।
दिल्ली विधानसभा सचिवालय के कई सीनियर अफसरों और कर्मचारियों ने भी इन दोनों महान हस्तियों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
आधिकारिक बयान के मुताबिक, डिप्टी स्पीकर मोहन सिंह बिष्ट ने वीर विट्ठलभाई झवेरभाई पटेल की 153वीं और शहीद भगत सिंह की 119वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए कहा, "दिल्ली विधानसभा उन लोगों की हिम्मत का जीता-जागता सबूत है, जिन्होंने भारत की लोकतांत्रिक आवाज को मजबूत किया और देश की आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी।"
विधानसभा सचिवालय के अधिकारियों ने भी दोनों हस्तियों को फूल चढ़ाए और भारत की संसदीय विरासत में उनके बड़े योगदान को नमन किया।
बिष्ट ने आगे कहा, "वीर विट्ठलभाई पटेल और शहीद भगत सिंह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दो मजबूत पहलू हैं। एक ने विधायी संस्थाओं के जरिए भारतीयों की आवाज और सम्मान को बढ़ाया, तो दूसरे ने अपनी हिम्मत और बलिदान से पूरी पीढ़ी में जोश भर दिया। दिल्ली विधानसभा का यह ऐतिहासिक परिसर हमें याद दिलाता है कि आजादी की लड़ाई सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि सदनों के अंदर भी लड़ी गई थी।"
वीर विट्ठलभाई पटेल की विरासत
बिष्ट ने वीर विट्ठलभाई पटेल के ऐतिहासिक योगदान का जिक्र किया। 24 अगस्त 1925 को पटेल सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के अध्यक्ष (स्पीकर) चुने जाने वाले पहले भारतीय बने थे। यह वही असेंबली है जो आज के दिल्ली विधानसभा परिसर से चलती थी। उनका कार्यकाल भारत के संसदीय इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर माना जाता है।
विट्ठलभाई पटेल ने हमेशा अध्यक्ष पद की गरिमा और आजादी को बनाए रखा। उन्होंने सदस्यों के अधिकारों की रक्षा की और एक स्वतंत्र विधानसभा सचिवालय बनाने की दिशा में काम किया। उनकी निष्पक्षता, संसदीय अनुशासन और संस्थागत स्वायत्तता आज भी देशभर की विधानसभाओं के लिए एक मिसाल है।
शहीद भगत सिंह का साहसिक विरोध
शहीद भगत सिंह को याद करते हुए डिप्टी स्पीकर ने कहा कि उनका नाम ऐतिहासिक सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली से हमेशा के लिए जुड़ा है। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अंग्रेजी हुकूमत के काले कानूनों के विरोध में इसी असेंबली में बम फेंके थे। इसके बाद चली अदालती कार्यवाही का इस्तेमाल उन्होंने विरोध का अपना संदेश फैलाने के लिए किया था।
भगत सिंह की हिम्मत, देशभक्ति और देश के लिए जान कुर्बान करने का जज्बा आज भी पीढ़ियों को प्रेरणा देता है।
लोकतांत्रिक विरासत की याद
ऐतिहासिक दिल्ली विधानसभा परिसर में विट्ठलभाई पटेल और भगत सिंह को दी गई यह श्रद्धांजलि, भारत की विधायी विरासत और आजादी की लड़ाई के गहरे कनेक्शन को दिखाती है। यह आज की पीढ़ी को उन लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने की जिम्मेदारी भी याद दिलाती है, जिनके लिए अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जान दे दी।
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