DUSU चुनाव में राजनीतिक दखल का आरोप, दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा मामला, उम्मीदवारों की नई सूची जारी करने की मांग

Published on 15 सित॰ 2026

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी DUSU के चुनाव को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि छात्र संघ चुनाव में राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े छात्र संगठनों का सीधा या अप्रत्यक्ष दखल हो रहा है. याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की राजनीतिक भागीदारी छात्र चुनावों के लिए तय नियमों के खिलाफ है. मामले को दिल्ली हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने बुधवार को सुनवाई के लिए स्वीकार किया है.

सिफारिशों का हवाला दिया गया

याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा विजेता की ओर से दाखिल की गई है. इसमें मुख्य तौर पर सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों और लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का हवाला दिया गया है, जिनका मकसद छात्र संघ चुनावों को राजनीतिक दलों के सीधे प्रभाव से अलग रखना है. याचिका में कहा गया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में इस नियम का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है और राजनीतिक संगठनों से जुड़े छात्र संगठन चुनाव में अपने-अपने उम्मीदवारों के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

क्लॉज 6.3 का भी उल्लेख किया

याचिकाकर्ता ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के क्लॉज 6.3 का भी उल्लेख किया है. इस प्रावधान का संबंध छात्र चुनाव और छात्र प्रतिनिधित्व को राजनीतिक दलों से अलग रखने से है. याचिका के मुताबिक, दिल्ली विश्वविद्यालय में चुनाव लड़ने वाले कुछ उम्मीदवारों को राजनीतिक छात्र संगठनों का समर्थन मिल रहा है. इतना ही नहीं, आरोप है कि कुछ संगठनों ने बाकायदा अपने पैनल और उम्मीदवारों के नाम भी सामने रखे हैं.

संविधान की भावना के विपरीत होगा

याचिका में NSUI, ABVP, AAP से जुड़े छात्र संगठन Association of Students for Alternative Politics यानी ASAP, और SFI तथा AISA के गठजोड़ का भी जिक्र किया गया है. आरोप है कि इन संगठनों की ओर से उम्मीदवारों या पैनल का समर्थन किया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि अगर छात्र चुनाव में राजनीतिक दलों या उनके छात्र संगठनों का सीधा प्रभाव रहता है तो यह लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों और DUSU के संविधान की भावना के विपरीत होगा.

मामला सिर्फ राजनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं है. याचिका में चुनाव के दौरान पोस्टर, बैनर, होर्डिंग और रैलियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि चुनाव प्रचार के दौरान विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसरों में दीवारों और दूसरी जगहों पर पोस्टर लगाए गए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां भी हुईं.

उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया

याचिका में खास तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के मुख्य चुनाव अधिकारी की ओर से 11 सितंबर को जारी उस नोटिस को चुनौती दी गई है, जिसमें DUSU के अलग-अलग पदों के लिए उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया था. इनमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पद शामिल हैं. याचिकाकर्ता का दावा है कि इस सूची में ऐसे उम्मीदवार भी शामिल हैं जिनका संबंध राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों से है. इसी आधार पर इन उम्मीदवारों की उम्मीदवारी रद्द करने और नए सिरे से उम्मीदवारों की सूची तैयार करने की मांग की गई है.

याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट से मांग की गई है कि DUSU चुनाव को लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के 22 सितंबर 2006 के आदेश के मुताबिक कराया जाए. याचिकाकर्ता का कहना है कि छात्र संघ चुनाव का उद्देश्य छात्रों को अपने प्रतिनिधि चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार देना है, लेकिन अगर चुनाव में बाहरी राजनीतिक ताकतों का प्रभाव बढ़ जाता है तो इसका असर चुनाव की निष्पक्षता पर पड़ सकता है.

पारदर्शिता के लिए अहम माना जाता

दरअसल, लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को छात्र चुनावों में सुधार और पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्र संघ चुनाव पढ़ाई के माहौल के भीतर हों और उन पर बाहरी राजनीतिक दबाव हावी न हो. इसी वजह से दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे बड़े संस्थान में इन नियमों का पालन हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है.

अब इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई पर सबकी नजर रहेगी. अदालत के सामने यह सवाल है कि क्या मौजूदा DUSU चुनाव प्रक्रिया में राजनीतिक संगठनों की भूमिका तय नियमों की सीमा के अंदर है या नहीं. साथ ही, अदालत यह भी देख सकती है कि उम्मीदवारों की सूची और चुनाव प्रचार को लेकर लगाए गए आरोपों में कितना दम है.

राजनीतिक प्रभाव से जुड़े आरोप

फिलहाल याचिकाकर्ता ने अदालत से चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर नियमों को लागू कराने और राजनीतिक प्रभाव से जुड़े आरोपों की स्थिति साफ करने की मांग की है. इस मामले का असर सिर्फ मौजूदा DUSU चुनाव पर ही नहीं, बल्कि आने वाले समय में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र चुनावों में राजनीतिक संगठनों की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण हो सकता है.