Horror Movies Shooting: हॉरर फिल्में देखते समय अक्सर दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. अंधेरा कमरा, अचानक सामने आता भूत, डरावना बैकग्राउंड म्यूजिक, रहस्यमयी आवाजें और अचानक स्क्रीन पर दिखाई देने वाला चेहरा ये सब मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि कई लोग फिल्म देखने के बाद भी लंबे समय तक डर महसूस करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन डरावने सीन्स को देखकर दर्शक घबरा जाते हैं, उन्हें आखिर शूट कैसे किया जाता है? क्या कलाकार सच में डरते हैं? क्या सेट पर भूत जैसा माहौल बनाया जाता है? या फिर ये सब कैमरे की तकनीक, वीएफएक्स और साउंड डिज़ाइन का कमाल होता है? चलिए जानते हैं कि हॉरर फिल्मों के सबसे डरावने सीन्स के पीछे आखिर कैसी तैयारी और तकनीक काम करती है.
सबसे पहले तैयार होती है डर पैदा करने वाली स्क्रिप्ट
किसी भी हॉरर फिल्म की शुरुआत कहानी से होती है. निर्देशक और लेखक सबसे पहले तय करते हैं कि दर्शकों को किस तरह का डर महसूस कराना है. कोई फिल्म भूत-प्रेत पर आधारित होती है, कोई मनोवैज्ञानिक डर पर, तो कुछ फिल्मों में रहस्य और सस्पेंस के जरिए डर पैदा किया जाता है. स्क्रिप्ट में पहले से तय होता है कि किस सीन में दर्शक चौंकेंगे, कहां सन्नाटा होगा, किस समय भूत दिखाई देगा और किस पल सिर्फ आवाज से डर पैदा किया जाएगा.
डरावना सेट नहीं, स्मार्ट सेट होता है डिजाइन
हॉरर फिल्मों के सेट को देखकर लगता है कि ये कोई पुरानी हवेली या भूतिया जगह होगी लेकिन असलियत अक्सर बिल्कुल अलग होती है. ज्यादातर सेट स्टूडियो के अंदर बनाए जाते हैं. आर्ट डायरेक्टर और सेट डिजाइनर दीवारों पर नकली दरारें, पुराना पेंट, टूटा हुआ फर्नीचर, जाले, धूल और पुरानी चीजें लगाकर माहौल तैयार करते हैं. कई बार एक सामान्य कमरे को ही लाइटिंग और कैमरा एंगल की मदद से इतना डरावना बना दिया जाता है कि दर्शक उसे असली भूतिया जगह समझ बैठते हैं.
लाइटिंग ही बनाती है आधा डर
हॉरर फिल्मों में रोशनी का बहुत बड़ा योगदान होता है. ज्यादातर सीन में कम रोशनी का इस्तेमाल किया जाता है ताकि हर चीज साफ दिखाई न दे. इससे दर्शकों के मन में रहस्य बना रहता है. कई बार सिर्फ टॉर्च, मोमबत्ती या हल्की नीली रोशनी का इस्तेमाल किया जाता है. चेहरे पर ऊपर या नीचे से पड़ने वाली रोशनी इंसान के चेहरे को भी डरावना बना देती है. लाइटिंग टीम हर फ्रेम को इस तरह तैयार करती है कि दर्शक को हर पल लगे कि कुछ बुरा होने वाला है.
कैमरे का एंगल बदलते ही बढ़ जाता है डर
हॉरर फिल्मों में कैमरा सिर्फ रिकॉर्डिंग का सामान नहीं होता, बल्कि कहानी का अहम हिस्सा होता है. कई डरावने सीन्स में कैमरा बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ता है ताकि दर्शकों की धड़कन बढ़ती जाए. कभी कैमरा किसी किरदार के पीछे-पीछे चलता है, तो कभी अचानक तेजी से मूव करता है. क्लोज़-अप शॉट, डच एंगल और हैंडहेल्ड कैमरा तकनीक का इस्तेमाल करके बेचैनी का एहसास कराया जाता है. कई बार जिस चीज से दर्शक डर रहे होते हैं, कैमरा उसे जानबूझकर देर से दिखाता है. यही सस्पेंस डर को और बढ़ा देता है.
मेकअप और प्रोस्थेटिक्स का बड़ा रोल
हर भूत या डरावना चेहरा कंप्यूटर से नहीं बनाया जाता. मेकअप आर्टिस्ट कई घंटे लगाकर कलाकारों का चेहरा पूरी तरह बदल देते हैं. सिलिकॉन, लेटेक्स, नकली खून, आर्टिफीसियल घाव, नकली आंखें, टूटे दांत और प्रोस्थेटिक मास्क की मदद से भयानक लुक तैयार किया जाता है. कई फिल्मों में एक कलाकार को तैयार होने में तीन से छह घंटे तक लग जाते हैं.
साउंड डिजाइन पैदा करता है सबसे ज्यादा डर
अगर किसी हॉरर फिल्म से आवाज हटा दी जाए, तो उसका आधा डर खत्म हो जाएगा. दरअसल, हॉरर फिल्मों का सबसे ताकतवर हथियार उनका साउंड डिजाइन होता है. दरवाजे की चरमराहट, हवा की आवाज, फुसफुसाहट, धीमा म्यूजिक, अचानक तेज धमाका, किसी के कदमों की आहट ये सारी आवाजें अलग-अलग रिकॉर्ड या तैयार की जाती हैं. कई बार ऐसी आवाजें बनाई जाती हैं जो असल जिंदगी में मौजूद ही नहीं होतीं. इन्हें अलग-अलग आवाजों को मिलाकर तैयार किया जाता है ताकि दर्शक के मन में बेचैनी पैदा हो.
जंप स्केयर कैसे शूट होता है?
हॉरर फिल्मों में अचानक सामने आ जाने वाले डरावने पल को "जंप स्केयर" कहा जाता है. इस सीन को शूट करने के लिए पहले नार्मल माहौल बनाया जाता है. कैमरा धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, बैकग्राउंड म्यूजिक शांत रहता है और अचानक तेज आवाज के साथ डरावना चेहरा स्क्रीन पर आ जाता है. असल डर सिर्फ भूत नहीं, बल्कि उस पल की टाइमिंग होती है. इसी वजह से निर्देशक एक ही सीन के कई टेक शूट करते हैं ताकि सही प्रभाव मिल सके.
क्या कलाकार सच में डरते हैं?
नहीं, क्योंकि कलाकार पहले से जानते हैं कि सीन में क्या होने वाला है. हालांकि कई निर्देशक कलाकारों के चेहरे पर वास्तविक भाव लाने के लिए कुछ सरप्राइज भी रखते हैं. कभी अचानक कोई प्रॉप हिल जाता है, कभी तेज आवाज चला दी जाती है या कभी किसी कलाकार की एंट्री का समय दूसरे कलाकार को नहीं बताया जाता. इससे चेहरे पर आने वाला वास्तविक डर कैमरे में कैद हो जाता है.
एडिटिंग में बनता है असली रोमांच
वहीं शूटिंग के बाद एडिटिंग रूम में फिल्म को नया रूप दिया जाता है. सीन्स की स्पीड, कट, रंग, धुंध, छाया और विजुअल इफेक्ट्स जोड़कर डर का स्तर बढ़ाया जाता है. कलर ग्रेडिंग के जरिए पूरी फिल्म को हल्का नीला, ग्रे या हरा टोन दिया जाता है, जिससे माहौल और रहस्यमय लगता है.
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