भारत ने अपनी आजादी के बाद से पिछले आठ दशकों (लगभग 80 वर्षों) में कई शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन कूटनीति, रक्षा और विदेश नीति के मोर्चे पर कुछ ऐसी ऐतिहासिक और रणनीतिक गलतियां भी हुईं, जिनका खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है.
भारत ने अपनी आजादी के बाद से पिछले आठ दशकों (लगभग 80 वर्षों) में कई शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन कूटनीति, रक्षा और विदेश नीति के मोर्चे पर कुछ ऐसी ऐतिहासिक और रणनीतिक गलतियां भी हुईं, जिनका खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है.
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भारत ने अपनी आजादी के बाद से पिछले आठ दशकों (लगभग 80 वर्षों) में कई शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन कूटनीति, रक्षा और विदेश नीति के मोर्चे पर कुछ ऐसी ऐतिहासिक और रणनीतिक गलतियां भी हुईं, जिनका खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है.
कश्मीर का अनसुलझा मुद्दा
भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों के दौरान भारतीय सेना ने अदम्य साहस का परिचय दिया था. एक समय ऐसा भी आया जब भारतीय फौजों ने दुश्मन को पछाड़ते हुए लाहौर के बाहरी इलाकों तक कदम रख दिए थे. सामरिक जानकारों का मानना है कि सैन्य मोर्चे पर मिली इस विशाल बढ़त का इस्तेमाल कूटनीतिक वार्ता की मेज पर किया जाना चाहिए था. लाहौर तक पहुंचने के बाद उस दबाव का उपयोग करके कश्मीर के विवादित हिस्सों को हमेशा के लिए वापस लिया जा सकता था. इस ऐतिहासिक मौके का पूरा सामरिक लाभ न उठा पाना एक बड़ी भूल साबित हुई, जिसके कारण कश्मीर का मुद्दा आज तक एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बना हुआ है.
चीन को समझने में भूल और 1962 का युद्ध
आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में भारत ने 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' की नीति पर गहरा विश्वास जताया. इस कूटनीतिक आदर्शवाद में चीन की विस्तारवादी नीतियों और उसकी सैन्य तैयारियों को काफी हद तक कम आंका गया. अति-आत्मविश्वास और सीमाओं पर सैन्य बुनियादी ढांचे की कमी के कारण 1962 में भारत को एक कड़वा सच झेलना पड़ा. चीन के अचानक हुए हमले ने न सिर्फ देश को झकझोर दिया, बल्कि भारत को अक्साई चिन जैसा अपना एक बड़ा और अहम भूभाग भी गंवाना पड़ा. इस युद्ध ने एक कठोर सबक दिया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यथार्थ और सैन्य तैयारियां ही असल सुरक्षा हैं.
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आपातकाल का काला अध्याय
साल 1975 में देश में लगाया गया आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर माना जाता है. यह सिर्फ एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं था, बल्कि इसने देश के लोकतांत्रिक ढांचे और विकास को गहरा नुकसान पहुंचाया. प्रेस की आजादी पर पाबंदी, संस्थाओं के कमजोर होने और अस्थिरता के कारण देश की प्रगति कई साल पीछे चली गई. इस दौर ने सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ आर्थिक नीतियों में भी ऐसा भटकाव पैदा किया, जिसकी भारी कीमत पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ी.
लाइसेंस राज की बेड़ियां
आजादी के बाद दशकों तक भारत की अर्थव्यवस्था सख्त सरकारी नियंत्रण यानी 'लाइसेंस राज' की बेड़ियों में जकड़ी रही. उद्योगों को शुरू करने और चलाने के लिए जटिल सरकारी अनुमतियों की आवश्यकता होती थी, जिसने नवाचार और निजी क्षेत्र के विकास को बुरी तरह रोक दिया. जब दुनिया के कई देश तेजी से औद्योगीकरण कर रहे थे, तब भारत आर्थिक रूप से पिछड़ रहा था. यह सिलसिला तब जाकर टूटा जब 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक सुधार करते हुए अर्थव्यवस्था के दरवाजे दुनिया के लिए खोले. हालांकि, तब तक देश अपने आर्थिक विकास के कई बहुमूल्य दशक खो चुका था.
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रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में निवेश की कमी
साल 1947 के आसपास भारत और चीन दोनों ने लगभग एक साथ अपनी नई यात्रा शुरू की थी. लेकिन आज दोनों देशों की स्थिति में एक बड़ा अंतर है, जिसका मुख्य कारण अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश की भारी कमी है. चीन ने शुरू से ही तकनीकी नवाचार, विज्ञान और विनिर्माण क्षमता को बढ़ाने के लिए अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा आरएंडडी में लगाया. इसके विपरीत, भारत में अनुसंधान को वह प्राथमिकता और पूंजी नहीं मिल सकी जिसकी आवश्यकता थी. इसी रणनीतिक चूक का नतीजा है कि आज वैश्विक सप्लाई चेन, रक्षा उत्पादन और नई तकनीक के मामले में चीन और भारत के बीच एक बड़ा फासला बन गया है.
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