Niti Aayog: भारत का लक्ष्य 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने का है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सिर्फ तेज आर्थिक विकास ही काफी नहीं होगा, बल्कि देश के युवाओं को बदलती तकनीक और रोजगार की जरूरतों के हिसाब से तैयार करना भी जरूरी होगा. इसी दिशा में नीति आयोग ने देश के स्किलिंग सिस्टम में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है. आयोग चाहता है कि युवाओं को नौकरी के लिए तैयार करने की प्रक्रिया सिर्फ कॉलेज या नौकरी मिलने से पहले शुरू न हो, बल्कि इसकी शुरुआत स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही हो.
नीति आयोग ने स्किलिंग को अलग-अलग सरकारी योजनाओं तक सीमित रखने के बजाय स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ने का प्रस्ताव दिया है. इसका मकसद केवल ज्यादा से ज्यादा युवाओं को ट्रेनिंग और सर्टिफिकेट देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रशिक्षण के बाद उन्हें बेहतर नौकरी, ज्यादा कमाई और करियर में आगे बढ़ने के अवसर मिलें.
कक्षा 6 से रोजगार की तैयारी
नीति आयोग के प्रस्ताव के मुताबिक कक्षा 6 से ही छात्रों को सामान्य रोजगार और उद्यमिता से जुड़ी स्किल सिखाई जानी चाहिए. इसके बाद कक्षा 9 से छात्रों के लिए व्यवस्थित वोकेशनल यानी व्यावसायिक शिक्षा के रास्ते खोले जाएं.
इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चों को कम उम्र में किसी एक नौकरी के लिए तैयार किया जाएगा. बल्कि उन्हें अलग-अलग काम, तकनीक, उद्यमिता और भविष्य में जरूरी कौशल से परिचित कराया जाएगा.
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, अभी देश के माध्यमिक स्तर के 12 स्कूलों में से एक से भी कम स्कूलों में वोकेशनल विषय उपलब्ध हैं. ऐसे में स्कूली शिक्षा में कौशल आधारित पढ़ाई का विस्तार एक बड़ा बदलाव हो सकता है.
कॉलेज की पढ़ाई के साथ मिलेगी काम की ट्रेनिंग
नीति आयोग ने उच्च शिक्षा में भी उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने की सिफारिश की है. इसके तहत डिग्री और डिप्लोमा को अप्रेंटिसशिप से जोड़ने का सुझाव दिया गया है.
यानी छात्र सिर्फ किताबों से पढ़ाई करने के बजाय पढ़ाई के साथ किसी कंपनी या संस्थान में काम का अनुभव भी हासिल कर सकते हैं. इसके अलावा वर्क-इंटीग्रेटेड प्रोग्राम और मॉड्यूलर कोर्स शुरू करने का प्रस्ताव है.
इससे छात्रों को डिग्री पूरी करने के बाद पहली नौकरी खोजने में होने वाली मुश्किल कम हो सकती है. कंपनियों को भी ऐसे उम्मीदवार मिल सकते हैं, जिन्हें पढ़ाई के साथ वास्तविक काम का अनुभव हासिल हो.
काम कर रहे लोगों के लिए भी आसान होगी स्किलिंग
स्किलिंग का प्रस्ताव केवल छात्रों और बेरोजगार युवाओं तक सीमित नहीं है. नीति आयोग ने पहले से काम कर रहे लोगों, खासकर अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वालों के लिए भी छोटे और लचीले कोर्स का सुझाव दिया है.
ऐसे लोगों के लिए लंबे समय तक नौकरी छोड़कर ट्रेनिंग लेना मुश्किल होता है. इसलिए छोटे अवधि के कोर्स और ऐसी ट्रेनिंग की जरूरत है, जिसे काम के साथ किया जा सके.
इस व्यवस्था का फायदा उन लोगों को भी मिल सकता है जो अपने मौजूदा काम में नई तकनीक सीखकर अपनी कमाई बढ़ाना चाहते हैं या करियर बदलना चाहते हैं.
सरकार को अभी इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई?
भारत में पिछले कुछ वर्षों में स्किलिंग कार्यक्रमों का काफी विस्तार हुआ है. नीति आयोग के अनुसार, वित्त वर्ष 2014-15 से अब तक 7.67 करोड़ से ज्यादा लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है. इसके अलावा केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में अलग-अलग मंत्रालयों के माध्यम से स्किलिंग से जुड़ी योजनाओं के लिए करीब 34,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था.
फिर भी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. बड़ी चुनौती यह है कि ट्रेनिंग और वास्तविक रोजगार के बीच अभी भी अंतर है. कई बार लोगों को सर्टिफिकेट तो मिल जाता है, लेकिन उस स्किल के अनुरूप नौकरी नहीं मिलती. इसीलिए नीति आयोग अब पूरी व्यवस्था को जोड़ने पर जोर दे रहा है.
600 करोड़ रुपये की ISSA योजना भी इसी दिशा में कदम
केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में इंटीग्रेटेड स्कीम इन स्किलिंग आर्किटेक्चर यानी ISSA के लिए 600 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. सरकार के अनुसार, ISSA को प्रस्तावित सुधारों की दिशा में शुरुआती कदम के तौर पर देखा जा सकता है. इसका उद्देश्य शिक्षा, स्किलिंग, रोजगार और जीवनभर सीखने की प्रक्रिया को एक-दूसरे से जोड़ना है. यानी भविष्य में किसी व्यक्ति के लिए स्किलिंग को एक अलग सरकारी योजना के रूप में देखने के बजाय इसे उसकी पूरी शिक्षा और करियर यात्रा का हिस्सा बनाने की कोशिश होगी.
87 मिलियन NEET युवाओं का आंकड़ा क्या है?
नीति आयोग की रिपोर्ट में 15 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 8.7 करोड़ लोगों के NEET होने का अनुमान दिया गया है. NEET का मतलब ऐसे लोग हैं जो न तो शिक्षा में हैं, न रोजगार में और न ही किसी ट्रेनिंग में. लेकिन इस आंकड़े को बेरोजगार युवाओं की संख्या समझना सही नहीं है.
रिपोर्ट में करीब 2 करोड़ बेरोजगार लोगों की संख्या अलग से बताई गई है. NEET में ऐसे लोग भी शामिल हो सकते हैं जो घरेलू काम कर रहे हैं, स्वैच्छिक काम कर रहे हैं, पारिवारिक कारोबार में लगे हैं, स्वास्थ्य कारणों से काम नहीं कर पा रहे हैं या फिलहाल रोजगार की तलाश नहीं कर रहे हैं.
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अनुमान 2020-21 के महामारी काल के आंकड़ों पर आधारित है. इसलिए इसे मौजूदा बेरोजगारी की सीधी तस्वीर नहीं माना जाना चाहिए.
छात्र और नौकरीपेशा लोगों को क्या फायदा होगा?
अगर नीति आयोग के प्रस्ताव लागू होते हैं तो शिक्षा से रोजगार तक पहुंचने का तरीका काफी बदल सकता है. इसका फायदा अलग-अलग स्तर पर मिल सकता है.
इस प्रस्ताव के संभावित फायदे:
- कक्षा 6 से रोजगार और उद्यमिता की शुरुआती समझ
- कक्षा 9 से व्यवस्थित वोकेशनल शिक्षा
- कॉलेज की डिग्री के साथ अप्रेंटिसशिप और काम का अनुभव
- नौकरी कर रहे लोगों के लिए छोटे और लचीले स्किलिंग कोर्स
- महिलाओं के लिए दोबारा नौकरी में लौटने के लिए विशेष ट्रेनिंग
- डिजिटल स्किल पासपोर्ट में प्रमाणित और पोर्टेबल रिकॉर्ड
- स्किल वाउचर, स्कॉलरशिप और प्लेसमेंट आधारित फाइनेंसिंग
- युवाओं के लिए कोर्स और नौकरी खोजने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म
Digital Skills Passport क्या होगा?
नीति आयोग ने Digital Skills Passport का भी सुझाव दिया है. इसमें किसी व्यक्ति की स्किल और उसके हासिल किए गए प्रमाणपत्रों का डिजिटल और सत्यापित रिकॉर्ड रखा जा सकता है.
इसका फायदा यह होगा कि नौकरी बदलते समय उम्मीदवार को हर बार अपने सभी सर्टिफिकेट अलग-अलग दिखाने की जरूरत कम हो सकती है. नियोक्ता डिजिटल रिकॉर्ड के जरिए व्यक्ति की स्किल और योग्यता को सत्यापित कर सकेंगे.
यह व्यवस्था खास तौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है जो अलग-अलग जगहों पर काम करते हैं या समय के साथ कई तरह की स्किल हासिल करते हैं.
सबसे बड़ा बदलाव: सर्टिफिकेट नहीं, नौकरी पर जोर
नीति आयोग की सिफारिशों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि स्किलिंग की सफलता को सिर्फ इस आधार पर नहीं मापा जाए कि कितने लोगों ने ट्रेनिंग ली या कितने सर्टिफिकेट बांटे गए.
असल सवाल यह होना चाहिए कि ट्रेनिंग के बाद कितने लोगों को रोजगार मिला, उनकी आय कितनी बढ़ी और करियर में कितना सुधार हुआ.
इसके लिए उद्योगों की भूमिका भी बढ़ाने का सुझाव दिया गया है. कंपनियों को कोर्स तैयार करने, अप्रेंटिसशिप देने और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में ज्यादा शामिल किया जा सकता है.
On-the-job training क्यों जरूरी है?
किसी नौकरी को सिर्फ किताबों से सीखना और उसे वास्तविक कार्यस्थल पर करना दो अलग चीजें हैं. इसलिए नीति आयोग ने ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग को शिक्षा और रोजगार के बीच महत्वपूर्ण पुल माना है.
उदाहरण के तौर पर हेल्थकेयर सेक्टर में डॉक्टर, नर्स, विशेषज्ञ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत लगातार बनी रहती है. ऐसे क्षेत्रों में पढ़ाई के साथ वास्तविक काम का अनुभव युवाओं को ज्यादा रोजगार योग्य बना सकता है.
इसी तरह मैन्युफैक्चरिंग, आईटी, बैंकिंग, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और दूसरे क्षेत्रों में भी उद्योग आधारित प्रशिक्षण युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ा सकता है.
भारत के लिए आगे की चुनौती क्या है?
नीति आयोग का प्रस्ताव कागज पर बड़ा बदलाव है, लेकिन इसकी सफलता लागू करने के तरीके पर निर्भर करेगी. स्कूलों में वोकेशनल शिक्षा के लिए प्रशिक्षित शिक्षक, कॉलेजों में उद्योगों की भागीदारी और काम कर रहे लोगों के लिए लचीली ट्रेनिंग व्यवस्था तैयार करनी होगी.
साथ ही यह भी जरूरी होगा कि जिन स्किल्स की ट्रेनिंग दी जा रही है, उनकी बाजार में वास्तविक मांग हो. तकनीक तेजी से बदल रही है, इसलिए स्किलिंग का पाठ्यक्रम भी समय-समय पर बदलना होगा.
शिक्षा से नौकरी तक एक ही रास्ता
भारत के सामने चुनौती सिर्फ युवाओं की बड़ी संख्या को ट्रेनिंग देने की नहीं है. असली चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें स्कूल से शुरू हुई शिक्षा आगे चलकर कौशल, अप्रेंटिसशिप और रोजगार से जुड़ सके.
नीति आयोग का प्रस्ताव इसी दिशा में बड़ा बदलाव सुझाता है. अगर इसे प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है तो भविष्य में स्किलिंग का मतलब केवल सर्टिफिकेट हासिल करना नहीं रहेगा. इसका लक्ष्य ऐसी वर्कफोर्स तैयार करना होगा, जो उद्योग की जरूरतों के मुताबिक काम कर सके, नई तकनीक अपना सके और बदलते रोजगार बाजार में लगातार आगे बढ़ सके.
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