UPI MDR Explained: भारत में डिजिटल पेमेंट की बात हो और UPI का नाम न आए, ऐसा अब शायद ही हो. चाय की दुकान हो, सब्जी का ठेला हो, मॉल हो या कोई बड़ा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे कि मोबाइल से QR कोड स्कैन करके भुगतान करना लोगों की रोजमर्रा की आदत बन चुका है. यही वजह है कि UPI को भारत के डिजिटल पेमेंट सिस्टम की रीढ़ कहा जाता है.
लेकिन अब इस सिस्टम को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने के लिए Merchant Discount Rate यानी MDR को लेकर बहस शुरू हो गई है. NPCI के MD और CEO दिलीप अस्बे ने कहा है कि UPI के बढ़ते नेटवर्क, तकनीकी जरूरतों और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बड़े निवेश की जरूरत है. इसी वजह से कुछ खास तरह के बड़े कारोबारी लेन-देन पर शुल्क की व्यवस्था पर चर्चा हो रही है.
6 साल से UPI पर MDR शून्य
UPI पर MDR को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि यह होता क्या है. जब कोई ग्राहक डिजिटल माध्यम से किसी व्यापारी को भुगतान करता है तो पेमेंट सिस्टम से जुड़े पक्षों को एक शुल्क मिल सकता है. इसी शुल्क को Merchant Discount Rate यानी MDR कहा जाता है.
साल 2020 तक UPI से जुड़े कुछ भुगतानों पर MDR लागू था. लेकिन कोरोना महामारी के दौरान डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने और कारोबारियों को राहत देने के लिए इसे शून्य कर दिया गया. इसके बाद से UPI के जरिए भुगतान करना कारोबारियों के लिए बिना MDR के जारी रहा.
दिलीप अस्बे के मुताबिक इतने लंबे समय तक मुफ्त व्यवस्था चलने के बाद किसी भी तरह का शुल्क वापस लाना आसान फैसला नहीं है. लेकिन उनका तर्क है कि UPI जैसे विशाल डिजिटल नेटवर्क को सुरक्षित और आधुनिक बनाए रखने के लिए लगातार निवेश जरूरी है.
UPI को चलाने में खर्च इतना क्यों बढ़ गया?
UPI का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ा है. करोड़ों लोग हर दिन इसके जरिए भुगतान कर रहे हैं. लेकिन जितना बड़ा नेटवर्क होता है, उसे चलाने और सुरक्षित रखने की लागत भी उतनी ही बढ़ती है.
NPCI के मुताबिक, पिछले साल RBI को दिए गए आंकड़ों में UPI नेटवर्क को संचालित करने की सालाना लागत करीब 21,000 करोड़ रुपये बताई गई थी.
इसके अलावा साइबर अपराध का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है. हैकर नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में पेमेंट नेटवर्क को सुरक्षित रखने, धोखाधड़ी रोकने और संदिग्ध लेन-देन की पहचान करने के लिए नई तकनीक और AI आधारित सिस्टम पर निवेश करना जरूरी हो गया है. यानी MDR को लेकर दिया जा रहा तर्क सिर्फ कमाई का नहीं, बल्कि UPI के बुनियादी ढांचे और सुरक्षा में निवेश का भी है.
आम लोगों पर कितना असर पड़ेगा?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या UPI से पैसे भेजने या QR कोड से भुगतान करने पर आम लोगों को चार्ज देना पड़ेगा? दिए गए प्रस्ताव के मुताबिक ऐसा नहीं है. UPI के करीब 96 प्रतिशत लेन-देन शुल्क से बाहर रहने की बात कही गई है.
खास तौर पर:
- व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेंगे.
- सामान्य दुकानों पर 2,000 रुपये तक के भुगतान पर कोई शुल्क नहीं होगा.
- बड़े कारोबारियों से जुड़े कुछ खास लेन-देन ही MDR के दायरे में आएंगे.
- UPI AutoPay को भी इस शुल्क से बाहर रखने की बात कही गई है.
- शेयर बाजार और पूंजी बाजार से जुड़े लेन-देन को भी शुल्क से छूट दी गई है.
इसका मतलब है कि रोजमर्रा में UPI इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर लोगों पर सीधे तौर पर इसका असर नहीं पड़ना चाहिए.
किन कारोबारियों पर लागू होगा MDR?
नई व्यवस्था का फोकस बड़े कारोबारियों पर रखा गया है. इसके तहत 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा सालाना टर्नओवर वाले कारोबारियों को लक्षित किया गया है.
यानी अगर आप किसी बड़ी कंपनी, बड़े ब्रांड या बड़े कारोबारी प्लेटफॉर्म को UPI से भुगतान करते हैं तो उस लेन-देन पर MDR लागू हो सकता है. हालांकि, यहां एक अहम सवाल है कि यह शुल्क व्यापारी या ग्राहक, आखिर कौन देगा ?
दिलीप अस्बे के मुताबिक बड़े कारोबारी पहले से ही क्रेडिट कार्ड जैसे भुगतान माध्यमों पर शुल्क देते हैं. इसलिए उम्मीद है कि वे UPI का यह खर्च भी खुद वहन करेंगे. लेकिन उन्होंने यह भी माना है कि कुछ व्यापारी इस शुल्क को ग्राहक पर डालने की कोशिश कर सकते हैं. इसलिए नियामकों के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती होगी कि MDR का बहाना बनाकर ग्राहकों से अलग से UPI चार्ज न वसूला जाए.
छोटे दुकानदारों को क्या फायदा होगा?
UPI का अगला बड़ा लक्ष्य सिर्फ भुगतान की सुविधा बढ़ाना नहीं, बल्कि छोटे दुकानदारों के लिए डिजिटल पेमेंट को और आसान बनाना है. भारत में करीब 6 करोड़ सक्रिय व्यापारी UPI के जरिए भुगतान लेते हैं. इनमें लगभग 3.5 से 4 करोड़ ऐसे व्यापारी हैं, जो अभी भी केवल कागज पर छपे QR कोड का इस्तेमाल करते हैं.
ऐसे दुकानदारों के सामने एक आम समस्या होती है, उदाहरण के तौर पर ग्राहक भुगतान करने के बाद कहता है कि पैसे भेज दिए हैं, लेकिन दुकानदार को तुरंत पुष्टि नहीं मिलती. साउंडबॉक्स इस समस्या को दूर करने में मदद करता है. ग्राहक के भुगतान के बाद डिवाइस आवाज के जरिए बता देता है कि रकम खाते में आ गई है.
साउंडबॉक्स के लिए बनेगा 3,000 करोड़ रुपये का फंड
इसी जरूरत को देखते हुए करीब 3,000 करोड़ रुपये के UPI फंड की योजना बताई गई है. इसका इस्तेमाल डिजिटल पेमेंट के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और ज्यादा से ज्यादा छोटे कारोबारियों तक साउंडबॉक्स जैसी सुविधाएं पहुंचाने में किया जा सकता है. इसका मकसद यह भी है कि छोटे दुकानदारों को फर्जी स्क्रीनशॉट या नकली भुगतान के जरिए होने वाली ठगी से बचाया जा सके.
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अब अगला लक्ष्य क्या है?
UPI के विस्तार का अगला चरण सिर्फ भुगतान तक सीमित नहीं रहने वाला है. NPCI की योजना UPI के जरिए क्रेडिट और बीमा जैसी वित्तीय सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की भी है. यानी भविष्य में कोई व्यक्ति UPI के डिजिटल नेटवर्क के जरिए छोटे समय के लिए जरूरी कर्ज या आसान बीमा सुविधा तक पहुंच सकता है.
NPCI का बड़ा लक्ष्य देश के करीब 100 करोड़ लोगों को डिजिटल वित्तीय व्यवस्था से जोड़ना है. इसका उद्देश्य सिर्फ यह नहीं है कि लोग डिजिटल भुगतान करें, बल्कि यह भी है कि डिजिटल सिस्टम के जरिए उन्हें दूसरी वित्तीय सेवाएं आसानी से मिल सकें.
आखिर MDR की जरूरत क्यों बताई जा रही है?
पूरी कहानी को आसान भाषा में समझें तो मामला यह है कि UPI जितना बड़ा हुआ है, उसे चलाने और सुरक्षित रखने की लागत भी उतनी ही बढ़ी है. अगर नेटवर्क को लगातार अपग्रेड करना है, साइबर हमलों से बचाना है और करोड़ों नए यूजर्स तथा कारोबारियों को जोड़ना है, तो इसके लिए निवेश चाहिए.
इसलिए कुछ बड़े कारोबारी लेन-देन पर MDR लगाने की बात सामने आई है. वहीं आम लोगों और छोटे दुकानदारों को इससे बचाने के लिए बड़ी संख्या में लेन-देन को शुल्क से बाहर रखने का प्रस्ताव है. यानी UPI की मूल सुविधा खत्म करने की बात नहीं है. असली बहस यह है कि इस विशाल डिजिटल नेटवर्क को भविष्य में सुरक्षित और मजबूत बनाए रखने का खर्च कौन उठाए.
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