Form-6 क्या है? SIR के बीच क्यों हो रही है इसकी चर्चा, जानिए पूरा मामला

Published on 23 सित॰ 2026

What is Form-6: देश में मतदाता सूची के एसआईआर को लेकर चल रही बहस के बीच अब फॉर्म-6 भी चर्चा के केंद्र में आ गया है. दरअसल Form-6 को नया फॉर्म नहीं है. बल्कि यह लंबे समय से नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाला आधिकारिक आवेदन पत्र है. चुनाव आयोग के मुताबिक, 18 साल या उससे ज्यादा उम्र का पात्र भारतीय नागरिक इस फॉर्म के जरिए मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकता है.

लेकिन SIR के दौरान Form-6 के ऑनलाइन संस्करण में जोड़े गए एक नए हिस्से को लेकर सवाल उठे हैं. यही कारण है कि यह सामान्य मतदाता पंजीकरण फॉर्म अचानक से राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बन गया है. आइए जानते हैं कि आखिर Form-6 क्या है और क्यों एसआईआर के बीच इसकी चर्चा जोरों पर है. 

Form-6 आखिर होता क्या है?

Form-6 का पूरा उद्देश्य मतदाता सूची में नए व्यक्ति का नाम शामिल कराना है. आम तौर पर इसका इस्तेमाल पहली बार वोटर बनने वाले लोगों के लिए किया जाता है.

इसमें आवेदक का नाम, जन्मतिथि, पता और परिवार के किसी सदस्य से संबंधित जानकारी जैसी जानकारियां मांगी जाती हैं. आवेदन संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के Electoral Registration Officer यानी ERO को दिया जाता है. चुनाव आयोग की गाइडलाइन के अनुसार, आवेदक अपने सामान्य निवास वाले विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में पंजीकरण के लिए Form-6 भर सकता है.

आज यह प्रक्रिया ऑनलाइन भी की जा सकती है. चुनाव आयोग के Voters' Services Portal पर नए मतदाता के रूप में पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध है.

फिर SIR के बीच Form-6 क्यों चर्चा में आया?

विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब चुनाव आयोग के ECINET ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध Form-6 में SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा वाला हिस्सा दिखाई दिया.

इसमें नए आवेदक से पूछा गया कि क्या उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में था. यदि जवाब हां है, तो पुराने रिकॉर्ड से संबंधित विधानसभा क्षेत्र, मतदान केंद्र और क्रम संख्या जैसी जानकारी देने को कहा गया.

यानी सामान्य तौर पर नए मतदाता के नामांकन से संबंधित Form-6 में अब SIR के पुराने रिकॉर्ड का संदर्भ भी दिखाई देने लगा.

यही से सवाल उठा कि नए मतदाता को अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड की जानकारी क्यों देनी होगी?

पहली बार वोट देने वाले युवाओं पर क्या असर पड़ सकता है?

यह मुद्दा खास तौर पर उन युवाओं से जुड़ा है जो पहली बार मतदाता बनने के लिए आवेदन कर रहे हैं. मान लीजिए किसी व्यक्ति की उम्र अभी 18 वर्ष हुई है. उसके माता-पिता का नाम पुराने SIR रिकॉर्ड में किस विधानसभा क्षेत्र, किस बूथ और किस क्रम संख्या पर था, इसकी जानकारी उसके पास न हो. ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि आवेदन प्रक्रिया उसके लिए कितनी आसान या मुश्किल होगी. 

जुलाई 2026 में इस मुद्दे पर रिपोर्ट्टिंग के दौरान यह भी सामने आया कि ऑनलाइन Form-6 में नया SIR घोषणा वाला हिस्सा मौजूद था, जबकि डाउनलोड किए जाने वाले Form-6 में यह अतिरिक्त हिस्सा दिखाई नहीं देता था. इसी अंतर ने प्रक्रिया और कानूनी आधार को लेकर सवाल खड़े किए. 

चुनाव आयुक्तों ने भी उठाए सवाल

बता दें कि 23 सितंबर 2026 को सामने आई इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने Form-6 में SIR से जुड़ी जानकारी जोड़ने की प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज की थी. 

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों का तर्क था कि Form-6 एक statutory form है, यानी इसकी व्यवस्था कानून और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत है। इसलिए इसमें बदलाव के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए.

रिपोर्ट के मुताबिक, मई में दर्ज की गई आपत्तियों में यह सवाल उठाया गया था कि SIR के लिए बनाए गए विशेष फॉर्म और सामान्य वैधानिक Form-6 को एक-दूसरे से अलग रखा जाना चाहिए.

विवाद का सबसे बड़ा सवाल क्या है?

पूरे विवाद का मूल सवाल यह है कि क्या SIR से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी को Form-6 की प्रक्रिया में शामिल करने के लिए नियमों में औपचारिक संशोधन जरूरी था?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी और कहा था कि Form-6 में बदलाव के लिए Registration of Electors Rules में संशोधन की जरूरत है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अतिरिक्त घोषणा वाले हिस्से में जवाब देना अनिवार्य के तौर पर चिह्नित नहीं था, लेकिन उसे भरे बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ रहा था.

हालांकि, इस रिपोर्ट में सामने आए आंतरिक मतभेद और चुनाव आयोग की आधिकारिक स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है.

SIR और Form-6 में क्या अंतर है?

दोनों को एक ही चीज समझना सही नहीं होगा. 

SIR मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा की प्रक्रिया है. 

इसका उद्देश्य मौजूदा मतदाता सूची की जांच और पुनरीक्षण करना है.

वहीं Form-6 किसी पात्र नए मतदाता का नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाला आवेदन पत्र है.

चुनाव आयोग के SIR संबंधी दस्तावेजों में भी नए मतदाताओं के लिए Form-6 उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है. आयोग के निर्देशों में बूथ लेवल अधिकारियों को नए मतदाता के रूप में नामांकन चाहने वाले लोगों को Form-6 उपलब्ध कराने की बात कही गई है.

विपक्ष के सवाल और चुनाव आयोग की चुनौती

Form-6 में SIR से जुड़ी जानकारी आने के बाद विपक्षी दलों और आलोचकों ने सवाल उठाया है कि इससे पहली बार वोटर बनने वाले युवाओं पर अतिरिक्त दस्तावेजी या रिकॉर्ड संबंधी बोझ पड़ सकता है.

दूसरी ओर, मतदाता सूची को अपडेट करने के नजरिए से पुराने रिकॉर्ड का इस्तेमाल करने को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया जाता है कि मतदाता सूची में पात्र नागरिकों का सही तरीके से पंजीकरण हो और रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियों की पहचान की जा सके.

इसलिए विवाद केवल इस बात पर नहीं है कि Form-6 में कौन-सा सवाल पूछा गया, बल्कि यह भी है कि उस सवाल को जोड़ने का कानूनी आधार और प्रक्रिया क्या थी.

SIR विवाद से इसका कनेक्शन क्यों महत्वपूर्ण है?

Form-6 का विवाद ऐसे समय सामने आया है जब SIR को लेकर पहले से ही देशभर में बहस चल रही है. SIR में पुराने मतदाता रिकॉर्ड को नए रिकॉर्ड से जोड़ने और मतदाताओं की पात्रता की जांच की प्रक्रिया अपनाई जा रही है.

ऐसे में Form-6 में पुराने SIR रिकॉर्ड से संबंधित सवाल जुड़ने से दोनों प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़ती हुई दिखाई देती हैं.

इसी वजह से यह मामला केवल एक फॉर्म में बदलाव का नहीं रह गया है. यह नए मतदाताओं के पंजीकरण, पुराने मतदाता रिकॉर्ड, चुनावी सूची की शुद्धता और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन गया है.

आसान भाषा में समझें

अगर सरल शब्दों में कहें तो Form-6 नए वोटर की एंट्री का फॉर्म है, जबकि SIR मतदाता सूची की विशेष जांच और पुनरीक्षण की प्रक्रिया है.

Form-6 इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसके ऑनलाइन संस्करण में SIR से जुड़ी पुरानी मतदाता सूची की जानकारी मांगने वाला अतिरिक्त हिस्सा जोड़े जाने की रिपोर्ट सामने आई. इसी बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया पर चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने आपत्ति दर्ज की होने की रिपोर्ट है.

अब इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या यह बदलाव निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत किया गया था और पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिकों पर इसका व्यावहारिक असर क्या होगा. आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की आधिकारिक स्पष्टता और न्यायिक या प्रशासनिक स्तर पर होने वाली कार्रवाई से इस विवाद की तस्वीर और साफ हो सकती है.

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