नेपाल के रसुवा जिले की तलहटी पर बसा बेत्रावती कभी व्यस्त बाजार और सबसे बड़े कस्बों में से एक था. अब वहां सिर्फ कीचड़, मलबा और खंडहर बचे हैं. अगस्त 2026 के अंत में आई भयावह फ्लैश फ्लड ने पूरे शहर को नदी की धारा में बहा दिया. स्कूल, गांव, कस्बे, मंदिर कुछ भी नहीं बचा. बड़ी-बड़ी गाड़ियां खिलौनों की तरह बहती नजर आईं. पानी का स्तर कम होने के बाद तबाही की डरावनी तस्वीरें सामने आ रही हैं.
26 अगस्त 2026 की सुबह हिमालय में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर या चट्टान खिसकने से भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ आ गई. पानी त्रिशूली नदी में मिलकर नीचे की तरफ तेजी से बढ़ा. बेत्रावती पर यह बाढ़ कुछ ही मिनटों में टूट पड़ी. त्रिशूली नदी की चौड़ाई जो पहले करीब 30 मीटर थी, अब 500 मीटर से ज्यादा हो गई. पानी ने पूरे इलाके को निगल लिया. कई इमारतें कीचड़ में धंस गईं. एक घर से ही 24 शव निकाले गए. सड़कें, पुल और घर सब बह गए.
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गांव के ज्यादातर लोगों ने पहाड़ों और ऊंचे स्थानों पर भागकर अपनी जान बचाई. कई परिवारों ने जंगलों में शरण ली. लेकिन जो समय पर नहीं भाग सके, वे बाढ़ में समा गए. स्थानीय लोगों का कहना है कि चेतावनी का समय बहुत कम था. कुछ लोग छत पर चढ़कर बचे, लेकिन कई परिवार पूरी तरह लापता हो गए. बचाव दल अब दलदल और कीचड़ में शव खोज रहा है. नेपाली सेना और पुलिस की टीमें लगातार काम कर रही हैं.
मौतों का आंकड़ा और बचाव अभियान
इस आपदा में अब तक 1200 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. हजारों लोग अभी भी लापता हैं. कई विदेशी पर्यटक और मजदूर भी शामिल हैं. रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, चितवन और नवलपरासी जैसे जिलों में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. बचाव कार्य में हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल हो रहा है क्योंकि सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हैं. गल्छी-बेत्रावती-रसुवागढ़ी सड़क का बड़ा हिस्सा बह गया. जलविद्युत परियोजनाएं भी प्रभावित हुईं.
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पानी उतरने के बाद कीचड़ और मलबे में फंसे शव निकालना मुश्किल काम है. कई जगहों पर शव इतने क्षतिग्रस्त हैं कि पहचानना भी कठिन हो रहा है. परिवार वाले फोटो लेकर लापता परिजनों की तलाश कर रहे हैं. कुछ परिवार अंतिम संस्कार बिना शव के कर रहे हैं. भोजन, पानी और आश्रय की कमी है. हेलिकॉप्टर से राहत सामग्री पहुँचाई जा रही है. पुल और सड़क बनाने का काम शुरू हो गया है ताकि इलाका दोबारा जुड़ सके.
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर पिघलने और अस्थिर चट्टानों की वजह से ऐसी आपदाएं बढ़ रही हैं. बेत्रावती जैसी घटनाएं याद दिलाती हैं कि नदी किनारे बसे कस्बों और बाजारों को कितना खतरा है. चेतावनी प्रणाली मजबूत करने, सुरक्षित स्थानों की योजना बनाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझना होगा.
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