Hartalika Teej Fast: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीज का पावन पर्व मनाया जाता है. इस साल 14 सितंबर यानी सोमवार के दिन यह कड़ा उपवास रखा जाएगा. यह पावन व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के अटूट प्रेम और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है. सुहागिन स्त्रियां और कुंवारी कन्याएं इस दिन विशेष पूजा-पाठ करती हैं. इस पर्व के पीछे एक बेहद खास पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जो इस व्रत के नाम का आधार बनी. माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए जो कठोर तपस्या की थी, उसमें उनकी सखियों की बहुत बड़ी भूमिका रही थी. जब उनके पिता ने उनका रिश्ता तय किया, तो कुछ ऐसा हुआ जिससे उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा.
भगवान विष्णु के विवाह प्रस्ताव से दुखी हुईं माता पार्वती
शिव पुराण की कथा के अनुसार माता पार्वती बाल्यावस्था से ही भगवान शिव को अपने पति रूप में पाना चाहती थीं. इसके लिए वे बहुत ही कठोर तपस्या में लीन थीं. इसी बीच नारद जी पर्वतराज हिमालय के पास पहुंचे और भगवान विष्णु का विवाह प्रस्ताव लेकर आए. पर्वतराज हिमालय ने इस प्रस्ताव को बहुत खुशी से स्वीकार कर लिया. जब माता पार्वती को यह बात पता चली कि उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर रहे हैं, तो यह सुनकर वे अंदर से पूरी तरह टूट गईं. वे अत्यंत व्यथित और दुखी हो गईं, क्योंकि उनका मन तो पहले से ही भोलेनाथ को अपना पति स्वीकार कर चुका था. इस बात ने उन्हें बहुत गहरी चिंता में डाल दिया.
सखियों द्वारा हरण और घने जंगल में छिपने की कथा
माता पार्वती की यह दुखी मनोदशा देखकर उनकी घनिष्ठ सखियों ने उनसे इतनी उदासी का कारण पूछा. तब पार्वती जी ने अपनी सखियों को अपनी निष्ठा और भगवान शिव के प्रति अपने अनन्य प्रेम के बारे में सब कुछ बता दिया. माता पार्वती का शिव जी के प्रति ऐसा गहरा प्रेम देखकर उनकी सखियों ने एक बड़ा कदम उठाया. वे माता पार्वती को उनके पिता के महल से चुपचाप निकालकर ले गईं और एक घने व एकांत जंगल की गुफा में छिपा दिया. ‘हरित’ यानी हरण करना और ‘आलिका’ यानी सखी, इन दो शब्दों के मिलन से ही इस पावन व्रत का नाम हरितालिका पड़ा. सखियों के इस सहयोग ने ही इस कथा को एक नया मोड़ दिया.
रेत के शिवलिंग की पूजा और शिव जी का मिला वरदान
घर छोड़कर उस घने जंगल में पहुंचने के बाद माता पार्वती ने अपनी भक्ति को और कड़ा कर दिया. उन्होंने जंगल की गुफा में रहकर रेत से शिवलिंग बनाया और पूरी निष्ठा के साथ फिर से कठोर तपस्या शुरू कर दी. अन्न और जल का त्याग करके उन्होंने केवल भगवान शिव का ध्यान किया. उनकी इस निश्चल भक्ति और कड़े तप से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने माता पार्वती को अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया. इस प्रकार सखियों के उस सहयोग और माता पार्वती के कड़े तप के कारण ही उनका विवाह भगवान शिव से संपन्न हो सका. इसीलिए आज भी हरितालिका तीज का पर्व बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है. किसी भी प्रकार के सुझाव के लिए astropatri.com पर संपर्क करें.

चंद्रेश शर्मा
चंद्रेश शर्मा एक अनुभवी वैदिक ज्योतिषी हैं, जिनका ज्योतिष से जुड़ाव 35 से अधिक सालों का है. किशोरावस्था में शुरू हुई उनकी ज्योतिष यात्रा समय के साथ गहरे अध्ययन, निरंतर अभ्यास और आध्यात्मिक समझ में विकसित हुई. पिछले 15 सालों से वे पेशेवर रूप से लोगों को वैदिक ज्योतिष के माध्यम से मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं. ज्योतिष के साथ-साथ उन्होंने लगभग 38 वर्षों तक कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी कार्य किया. इस दौरान उन्हें टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू स्टील, थिसेनक्रुप और भूषण स्टील जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाने का अवसर मिला. व्यावसायिक जीवन के अनुभव और वैदिक ज्योतिष का गहन अध्ययन उनके दृष्टिकोण को संतुलित और व्यावहारिक बनाता है. उन्होंने भारतीय विद्या भवन से ज्योतिष आचार्य और ज्योतिष अलंकार की उपाधियां प्राप्त की हैं. उनका मानना है कि वैदिक ज्योतिष केवल भविष्य जानने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को खुद को समझने, सही समय पर उचित निर्णय लेने और जीवन की परिस्थितियों का बेहतर सामना करने की दिशा भी देता है. वे करियर, विवाह, व्यवसाय, वित्त, ग्रह गोचर, कुंडली विश्लेषण, पंचांग और वैदिक ज्योतिष से जुड़े विषयों पर अपने वर्षों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं. उनका उद्देश्य लोगों तक प्रामाणिक वैदिक ज्योतिष को सरल, व्यावहारिक और विश्वसनीय रूप में पहुंचाना है, ताकि वे जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय अधिक स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ ले सकें.
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