शरीर में गांठ दिखाई देने पर अक्सर मरीज और उनके परिजन कैंसर की आशंका से घबरा जाते हैं, लेकिन एक्सपर्टस का कहना है कि हर गांठ कैंसर नहीं होती। कई मामलों में इसके पीछे आईजीजी4 रिलेटेड डिजीज (IgG4-RD) जैसी दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी भी हो सकती है, जिसकी सही
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इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में रविवार को आयोजित IgG4-RD रिलेटेड डिजीज-2026 कॉन्फ्रेंस में भारत, जापान, इटली सहित कई देशों के विशेषज्ञों ने इस बीमारी के निदान, इलाज और बढ़ती चुनौतियों पर चर्चा की। कॉन्फ्रें में 350 से अधिक डॉक्टर और 20 से ज्यादा एक्सपर्टस शामिल हुए।
कैंसर समझकर हो जाती हैं अनावश्यक सर्जरी
कॉन्फ्रेंस आयोजक डॉ. सौरभ मालवीय ने बताया कि IgG4-RD शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी एक दुर्लभ बीमारी है। इसमें शरीर के विभिन्न अंगों में सूजन और फाइब्रोसिस विकसित होने लगता है।
कई बार पैंक्रियाज या अन्य अंगों में बनने वाली गांठ को कैंसर समझ लिया जाता है और मरीज की अनावश्यक सर्जरी तक कर दी जाती है, जबकि सही जांच के बाद इसका इलाज दवाओं से संभव है।

कॉन्फ्रेंस में शामिल एक्सपर्टस।
शरीर के किसी भी अंग को बना सकती है निशाना
एक्सपर्ट्स के अनुसार यह बीमारी आंख, किडनी, हृदय, पैंक्रियाज, पिट्यूटरी ग्रंथि, नाक, गला और लार ग्रंथियों सहित शरीर के लगभग किसी भी अंग को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि इसकी पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
एक अंग में मिले तो पूरे शरीर की जांच जरूरी
जापान के प्रो. हिसानोरी उमेहारा ने बताया कि IgG4-RD एक सिस्टमिक बीमारी है, जो एक साथ कई अंगों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए यदि किसी एक अंग में इसके संकेत मिलें तो अन्य अंगों की भी जांच की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि स्टेरॉयड, इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं और आधुनिक बायोलॉजिकल थेरेपी इसके इलाज में प्रभावी साबित हो रही हैं।
6 से 8 महीने तक छिपे रह सकते हैं लक्षण
मुंबई के हिंदुजा अस्पताल की डॉ. रोहिणी सामंत ने कहा कि इस बीमारी के लक्षण कई बार 6 से 8 महीने बाद सामने आते हैं। यदि किसी मरीज में बिना स्पष्ट कारण के गांठ, सूजन या एक से अधिक अंगों में समस्या दिखाई दे तो IgG4-RD की संभावना पर भी विचार करना चाहिए।
डॉक्टरों में भी जागरूकता बढ़ाने की जरूरत
एक्सपर्टस ने माना कि इस बीमारी को लेकर अभी भी आम लोगों के साथ-साथ कई डॉक्टरों में पर्याप्त जागरूकता नहीं है। यदि डॉक्टर इस बीमारी की संभावना पर विचार ही नहीं करेंगे तो सही निदान भी नहीं हो पाएगा। इसलिए मरीजों के साथ-साथ डॉक्टरों में भी जागरूकता बढ़ाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।