Published: Saturday, October 3, 2026, 8:00 [IST]
Jitiya Vrat Katha In Hindi 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जितिया व्रत रखा जाता है। जितिया व्रत को जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उनके सुखी जीवन की कामना से निर्जला उपवस रखती हैं। इस साल यह व्रत 3 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा। इस दिन माताएं प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की विधि-विधान पूजा करती हैं। इस व्रत में विधिवत पूजा-पाठ के साथ-साथ चील-सियारिन की पावन व्रत कथा का पाठ करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। कहते हैं इस कथा को पढ़े बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। तो चलिए, जानते हैं जितिया व्रत की कथा के बारे में विस्तार से -
जितिया व्रत की कथा (चील और सियारिन की कथा)
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक जंगल में एक चील और एक सियारिन रहती थीं। दोनों आपस में बहुत अच्छी सहेलियां थीं। एक दिन कुछ महिलाएं जंगल में आईं और आपस में जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया व्रत के बारे में बात करने लगीं। उनकी बातें सुनकर चील के मन में भी यह व्रत रखने की इच्छा हुई। उसने अपनी सहेली सियारिन को भी इस व्रत के बारे में बताया।
इसके बाद दोनों ने पूरे विधि-विधान से जितिया व्रत रखा और पूजा की। पूजा के बाद दोनों को बहुत तेज भूख लगने लगी। चील ने किसी तरह अपनी भूख पर काबू रखा, लेकिन सियारिन से भूख सहन नहीं हुई। वह व्रत तोड़कर जंगल में शिकार करने चली गई।
जब चील ने सियारिन को मांस खाते देखा तो उसने उसे बहुत समझाया और डांटा। इस तरह सियारिन का व्रत टूट गया, जबकि चील ने पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ व्रत पूरा किया।
कहा जाता है कि अगले जन्म में दोनों का जन्म बहनों के रूप में हुआ। सियारिन का विवाह एक राजकुमार से हुआ, जबकि चील का विवाह राज्य के मंत्री के पुत्र से हुआ। कुछ समय बाद सियारिन ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन जन्म के कुछ ही दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद चील के घर भी पुत्र का जन्म हुआ और उसका बच्चा स्वस्थ रहा।
अपने बच्चे को स्वस्थ देखकर सियारिन को अपनी बहन से ईर्ष्या होने लगी। उसने जलन के कारण अपनी बहन के पति और पुत्र को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन दोनों बच गए।
एक दिन देवी मां सियारिन के सपने में आईं। उन्होंने उसे बताया कि उसके पिछले जन्म के कर्मों के कारण उसकी संतान जीवित नहीं रहती। देवी ने कहा कि अगर वह अपने जीवन में सुधार चाहती है, तो सच्चे मन से जितिया व्रत करे।
सियारिन ने सुबह उठकर अपने पति को सपने की पूरी बात बताई। पति की सलाह पर उसने अपनी बहन चील से अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी। सियारिन को अपनी गलती का पछतावा देखकर चील ने उसे माफ कर दिया।
जब अगली बार जितिया व्रत आया, तो दोनों बहनों ने साथ मिलकर पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखा। मान्यता है कि माता जितिया की कृपा से सियारिन को एक स्वस्थ और सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद दोनों बहनें खुशी-खुशी रहने लगीं।
जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा (जीमूतवाहन वाली)
जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी एक अन्य कथा जीमूतवाहन की भी है। कहा जाता है कि जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में अपना राजपाट छोड़कर वानप्रस्थ जीवन अपनाने का फैसला किया। जीमूतवाहन को राजा बनने में कोई रुचि नहीं थी। इसलिए उन्होंने अपना राज्य अपने भाइयों को सौंप दिया और पिता की सेवा करने के लिए जंगल चले गए।
जीमूतवाहन का विवाह मलयवती नाम की राजकुमारी से हुआ था। एक दिन जंगल में जाते समय उन्हें एक बुजुर्ग महिला रोती हुई दिखाई दी। जीमूतवाहन ने उससे रोने का कारण पूछा। महिला ने बताया कि वह नागवंश से है और उसके बेटे शंखचूड़ की जान खतरे में है।
उसने बताया कि नागों ने पक्षियों के राजा गरुड़ को रोज एक नाग की बलि देने का वचन दिया है। अब उसके बेटे शंखचूड़ की बारी है। यह सुनकर जीमूतवाहन ने उस महिला की मदद करने का फैसला किया और कहा कि वह शंखचूड़ की जगह खुद गरुड़ को अपनी बलि देंगे।
जीमूतवाहन ने शंखचूड़ से लाल कपड़ा लिया और उसे अपने शरीर पर लपेटकर एक चट्टान पर लेट गए। कुछ समय बाद गरुड़ वहां पहुंचे। लाल कपड़े में ढके जीमूतवाहन को उन्होंने शंखचूड़ समझ लिया और अपने पंजों में उठाकर पहाड़ की ऊंचाई पर ले गए।
गरुड़ के पंजों में होने के कारण जीमूतवाहन को बहुत पीड़ा हुई और वह कराहने लगे। उनकी आवाज सुनकर गरुड़ को शक हुआ। उन्होंने पूछा कि वह कौन हैं और नाग की जगह यहां क्यों आए हैं। तब जीमूतवाहन ने उन्हें पूरी घटना के बारे में बताया।
जीमूतवाहन के साहस और त्याग से गरुड़ बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और आगे से किसी नाग की बलि न लेने का वचन दिया। मान्यता है कि इसी घटना के बाद जीमूतवाहन की पूजा की परंपरा शुरू हुई।
Story first published: Saturday, October 3, 2026, 8:00 [IST]