झारखंड के गढ़वा में एक बैंक के बाहर रखा ताबूत पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ. आरोप है कि KYC अपडेट न होने की वजह से एक बुजुर्ग पेंशनधारी अपने ही खाते से पैसे नहीं निकाल पाए. परिजनों का कहना है कि इलाज के लिए रकम न मिलने से उनकी मौत हो गई. मौत के बाद ग्रामीण ताबूत लेकर बैंक पहुंचे और वहीं दफनाने की चेतावनी देकर विरोध प्रदर्शन किया. अब यह मामला पूरे राज्य में सुर्खियों में है और तूल पकड़ता जा रहा है. पढ़ें बुजुर्ग पेंशनधारी के दर्द से भरी कहानी.
झारखंड में एक बैंक के बाहर की तस्वीर वायरल हो रही है. बैंक के ठीक सामने बैंक को जाने वाले रास्ते पर काले रंग का एक ताबूत रखा है. इस ताबूत के साथ चार महिलाएं और दो पुरुष बैठे नज़र आ रहे हैं. सामने की तरफ लोगों की भीड़ है और उन्हीं भीड़ में से कोई एक शख्स ये कह रहा है कि इस ताबूत में लेटे रतन लकड़ा को बैंक के सामने वाले इसी रास्ते पर इसी जगह कब्र में दफना देंगे. फिर बैंक के लोगों को हर रोज़ रतन लकड़ा की इसी कब्र से होकर गुजरना होगा.
एक बैंक के बाहर ताबूत रखकर ये लोग यहां क्यों धरना दे रहे हैं? इस कहानी को समझने की कोशिश करते हैं. झारखंड का गढ़वा इलाके में मौजूद झारखंड ग्रामीण बैंक की बारगढ़ ब्रांच है. इस बैंक में ताबूत में बंद रतन लकड़ा का भी खाता था. बुजुर्ग रतन लकड़ा को झारखंड सरकार से पेंशन मिला करती थी. आदिवासी रतन लकड़ा का गुज़र बसर उसी पेंशन से होता था. पर पिछले तीन महीने से रतन बीमार थे. इलाज पर अलग से पैसे ख़र्च हो रहे थे. पर बीमारी की हालत में भी वो बैंक जाते. अपने पैसे निकालने के लिए. लेकिन बैंक वालों ने कहा कि खाते से पैसे निकालने से पहले उनका केवाईसी अपडेट करना होगा. कहानी यहीं से शुरु होती है. अब रतन लकड़ा केवाईसी अपडेट कराने के लिए बैंक जाते हैं. लेकिन काम बनता नहीं. तीन महीने तक बैंक मैनजर रतन लकड़ा को केवाईसी के नाम पर दौड़ाता रहा.
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इस ग्रामीण बैंक में केवाईसी या बायोमेट्रिक के लिए दूसरी मंजिल पर बैंक स्टाफ़ बैठा करते हैं. पहले से ही बीमार रतन एक बार बेहद गंभीर हालत में बैंक पहुंचते हैं. लेकिन उनकी हालत ऐसी थी कि वो दूसरी मंज़िल तक सीढ़ियां चढ़ नहीं सकते थे. रतन के साथ गई उनकी बहू ने बैंक मैनजर से गुज़ारिश की कि अगर कोई नीचे जाकर उनका केवाईसी कर दे तो उनके पैसे निकल आएंगे. वो बहुत बीमार हैं. लेकिन बैंक मैनेजर ने गुस्से में अपने स्टाफ से रतन लकड़ा और उसकी बहू को बैंक से बाहर निकाल दिया. बीमार रतन लकड़ा एक बार फिर खाली हाथ घर लौटे. केवाईसी हुआ नहीं, तो पैसे आए नहीं. पैसे आए नहीं, तो दवा ख़रीदी नहीं. दवा ख़रीदी नहीं, तो आख़िर में बिस्तर ही पकड़ लिया.
अब होता ये है कि रतन लकड़ा कि ये कहानी सुन गांव वाले ग़ुस्सा हो जाते हैं. कुछ लोकल लीडर के पास जाते हैं. फिर बात बैंक मैनेजर तक पहुंचती है. तब बैंक मैनेजर को पहली बार लगता है कि अगर रतन लकड़ा मर गया तो लोग बैंक के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आएंगे. इसी के बाद तीन महीने से एक बीमार बुजुर्ग पर केवाईसी के नाम पर बैंक के चक्कर कटवाने वाले बैंक के कर्मचारी एक रोज़ ख़ुद रतन लकड़ा के घर पहुंचते हैं. अंगूठे का निशान लेते हैं. केवाईसी की खानापूर्ती करते हैं. और फिर रतन के बेटे और रतन से कहते हैं कि अब आप अपने खाते से पैसे निकाल सकते हैं.
पर लगता है, रतन भी बस इसी उम्मीद में ज़िंदा था कि एक बार बस किसी तरह केवाईसी हो जाए. जैसे ही केवाईसी हुआ. रतन लकड़ा ने दम तोड़ दिया. खाता बैंक में ही खुला रह गया. उसके अपने पैसे खाते में ही पड़े रह गए. पर वो बैंक के निकम्मेपन और पत्थर दिल रवैये के चलते दवा खरीदने के लिए खुद अपने पैसे बैंक से निकाल नहीं पाया. ज़ाहिर है, बैंक में अब जो खाता है वो एक मुर्दे का है. जब केवाईसी के नाम पर बैंक ने तीन महीने तक बीमार रतन को बैंक के इतने चक्कर कटवाए तो अंदाज़ा लगाइए अब उसी मुर्दा रतन के खाते में जमा पैसे को उसके ज़िंदा रिश्तेदारों को देने में कितनी मुद्दत लगाएगा.
ख़ैर, मुर्दा बैंक खाते को छोड़िए. अब जैसे ही रतन लकड़ा की मौत होती है. पूरा इलाका गुस्से में उबलने लगता है. रतन लकड़ा की लाश को एक ताबूत में रखकर लोग बैंक तक पैदल चल पड़ते हैं. फिर बैंक के बाहर ताबूत रखकर रतन की लाश बैंक के बाहर ही दफनाने की ज़िद करने लगते हैं. लोकल मीडिया के ज़रिए ये तस्वीर और खबर झारखंड की राजधानी रांची तक पहुंचती है. राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तक भी ये ख़बर पहुंचती है. वो इसे लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी डालते हैं और घटना पर अफसोस जताते हैं.
आदिवासी इलाकों में ज्यादातर आदिवासी अपने या सरकारी योजनाओं से मिलने वाले पैसे झारखंड ग्रामीण बैंक में जमा करते हैं. सरकारी योजनाओं के कुछ पैसे इन आदिवासियों के खाते में सीधे इसी अर्धसरकारी ग्रामीण बैंक में पहुंचता है. अब जैसे ही झारखंड के मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया के ज़रिए इस घटना पर अफसोस जताया बैंक के अफसरों के हाथ पांव फूल गए. उन्हें अपनी नौकरी ही ख़तरे में पड़ती नज़र आई. नौकरी बचाने के लिए अब उसी बैंक के दो अफसर जिस बैंक में रतन लकड़ा का खाता था, रात के अंधेरे में रतन के घर उनकी बीवी और बेटे से बात करने चुपके से पहुंचे. पहले धमकी दी, फिर लालच.
पर इत्तेफ़ाक से उसी वक्त गांव के कई लोग रतन के घर पहुंच जाते हैं. एक शख्स मोबाइल पर ही रात में चोरी से आने वाले दोनों बैंक अफ़सरों से पूछताछ शुरु कर देता है. दोनों ऐसा घबराते हैं कि घर छोड़कर से निकलकर भाग जाते हैं. बेशर्मी का आलम देखिए जब रतन की मौत सुर्खियां बनी तब इसी बैंक का स्टाफ कहने लगा कि रतन का केवाईसी तो हो गया था. पैसा निकालने की कोई दिक्कत भी नहीं थी. पर पैसा निकालने कोई आया ही नहीं.
अब कहानी ये है कि इलाके के डीसी, एसडीमए और एलडीएम मामले की जांच में जुट गए. जांच के बाद कड़ी कार्रवाई की बाते भी कर रहे हैं. पर इन अफसरों से हटकर आपको एक बात बताते हैं ये जो सरकारी अफसर जांच और कार्रवाई के दावे और दम भर रहे हैं, असल में इनमें से ज़्यादातर हवा-हवाई ही होते हैं. ये क्या कार्रवाई करेंगे और क्या जांच? इसका एक छोटा सा नमूना देखिए कि जीते जी तो रतन लकड़ा को उसके पैसे नहीं मिल पाए. पर मरने के बाद भी रतन के मुर्दा खाते से उसके जिंदा परिवार को अब तक एक भी रुपया नहीं मिला है.
पहले केवाईसी के नाम पर रतन मर गया. अब उसी मुर्दा रतन के मुर्दा होने का सबूत यानि डेथ सर्टिफिकेट यानि मृत्यु प्रमाण पत्र का इंतज़ार हो रहा है. एक बार रतन के मुर्दा होने का सबूत कागज़ पर उतर आए उसके बाद बैंक वाले फिर से उस कागज़ की जांच करेंगे कि वो असली है कि नहीं. कहीं रतन ज़िंदा तो नहीं. कहीं रतन के परिवार वाले धोखे से उसका पैसा हड़पने की कोशिश तो नहीं कर रहे.
और इस तरह अब रतन के मुर्दा खाते से रतन के जिंदा रिश्तेदारों को पैसे निकालने के लिए भी इंतज़ार करना होगा. जब रतन ज़िंदा था, तब उसने इंतज़ार किया. अब रतन के घरवाले इंतज़ार करेंगे. एक इंतज़ार ही तो है जिसका कोई सबूत किसी सरकारी दफ़्तर में नहीं मांगा जाता. क्योंकि इंतज़ार सरकारी अफसर नहीं वो जनता करती है, जो इन्हें सरकारी अफसर बनाती है.
(गढ़वा से चंदन कुमार कश्यप का इनपुट)
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