Pitru Paksha 2026: महाभारत के कर्ण से जुड़ी है पितृ पक्ष की मान्यता, जानें कहानी

Published on 27 सित॰ 2026

Pitru Paksha 2026 Karna Shraddha Story: सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों को याद और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना जाता है. इस साल पितृ पक्ष आज 27 सितंबर से शुरू हुआ है, और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगी. इस दौरान लोग अपनी मृत्यु तिथि के अनुसार पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं.

श्राद्ध से जुड़ी है कर्ण की प्रसिद्ध कथा

महाभारत कथा के अनुसार, पितृपक्ष के साथ दानवीर कर्ण की एक पौराणिक कथा भी जोड़ी जाती है. मान्यता है कि कर्ण ने जीवनभर सोना, धन और दूसरी वस्तुओं का खूब दान किया, लेकिन अपने पितरों के लिए श्राद्ध और अन्न-जल का दान नहीं किया था. मृत्यु के बाद जब वह स्वर्ग पहुंचे तो उन्हें भोजन की जगह सोना मिलने लगा. यह देखकर कर्ण हैरान रह गए और उन्होंने इसका कारण पूछा.

इंद्र ने बताई कर्ण की भूल

कथा के अनुसार, देवराज इंद्र ने कर्ण को बताया कि जीवन में उन्होंने बहुत दान किया, लेकिन पितरों के निमित्त अन्न-जल अर्पित नहीं किया. कर्ण ने अपनी विवशता बताते हुए कहा कि उन्हें अपने वास्तविक कुल और पूर्वजों की जानकारी नहीं थी. मृत्यु से कुछ समय पहले ही उन्हें पता चला था कि वह कुंती के पुत्र हैं.

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16 दिनों तक किया पितरों का तर्पण

लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, कर्ण को अपनी भूल सुधारने का अवसर दिया गया और वह 16 दिनों के लिए पृथ्वी पर लौटे. इस दौरान उन्होंने अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और अन्न-जल का दान किया. मान्यता है कि इसी घटना से पितृपक्ष के 16 दिनों को कर्ण की कथा से जोड़ा जाता है.

महाभारत में श्राद्ध की शुरुआत का प्रसंग किसका है?

यहां एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय तथ्य समझना जरूरी है. महाभारत के अनुशासन पर्व में श्राद्ध की शुरुआत कर्ण से नहीं, बल्कि महर्षि निमि के प्रसंग से बताई गई है. भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि पुत्र की मृत्यु के बाद निमि ने उसके लिए श्रद्धापूर्वक भोजन और पिंड अर्पित किया. बाद में महर्षि अत्रि ने उन्हें बताया कि यह पितरों के सम्मान की विधि है.

गरुड़ पुराण और अन्य ग्रंथों में श्राद्ध का महत्व

गरुड़ पुराण में भी श्राद्ध और पितृकर्म की परंपरा तथा पितरों के प्रति कर्तव्य का विस्तार से वर्णन मिलता है. वहीं मार्कंडेय पुराण में पितरों के स्मरण और उनके आशीर्वाद से जुड़े धार्मिक विचार मिलते हैं. इसलिए कर्ण की 16 दिनों वाली कथा को लोकप्रिय पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है, जबकि महाभारत में श्राद्ध की उत्पत्ति का प्रमुख प्रसंग महर्षि निमि से जुड़ा है.

पितृपक्ष देता है कृतज्ञता का संदेश

पितृपक्ष का मूल भाव अपने पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है. श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और अन्न-जल अर्पण इसी परंपरा का हिस्सा हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धापूर्वक किए गए पितृकर्म से पितरों की तृप्ति और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है.