अमरोहा जिले की हसनपुर विधानसभा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उन महत्वपूर्ण सीटों में शामिल है, जहां हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं का सामाजिक प्रभाव लगभग संतुलित माना जाता है। Hasanpur Assembly Caste Equations को देखें तो मुस्लिम, अनुसूचित जाति, खड़गवंशी, गुर्जर, सैनी, जाट, प्रजापति, कश्यप, ब्राह्मण और वैश्य मतदाता चुनावी नतीजे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 2026 की अंतिम मतदाता सूची में हसनपुर विधानसभा के कुल 3,39,642 मतदाता दर्ज हैं। विधानसभा क्षेत्र में 226 मतदान केंद्र और 423 मतदेय स्थल बनाए गए हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति की दशा और दिशा निर्धारित करने वाला एक निर्णायक मोड़ है।
हसनपुर का हालिया चुनावी रिकॉर्ड भाजपा के पक्ष में रहा है। भाजपा के महेंद्र सिंह खड़गवंशी ने 2017 में तत्कालीन सपा विधायक कमाल अख्तर को 27,770 वोट से हराया था। इसके बाद 2022 में उन्होंने सपा के मुखिया गुर्जर को 22,382 वोट से पराजित कर लगातार दूसरी जीत दर्ज की। 2024 लोकसभा चुनाव में भी हसनपुर विधानसभा सेगमेंट में भाजपा ने कांग्रेस पर बड़ी बढ़त बनाई। इन नतीजों से फिलहाल भाजपा का मजबूत सामाजिक आधार दिखाई देता है, लेकिन 2026 में मतदाता संख्या में आए बड़े बदलाव ने 2027 के लिए पुराने बूथ गणित की दोबारा समीक्षा जरूरी कर दी है।
हसनपुर विधानसभा एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| विधानसभा | हसनपुर |
| विधानसभा संख्या | 42 |
| जिला | अमरोहा |
| लोकसभा क्षेत्र | अमरोहा |
| आरक्षण | सामान्य |
| वर्तमान विधायक | महेंद्र सिंह खड़गवंशी |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| 2022 जीत का अंतर | 22,382 वोट |
| 2026 कुल मतदाता | 3,39,642 |
| मतदान केंद्र | 226 |
| मतदेय स्थल | 423 |
| प्रमुख सामाजिक समूह | मुस्लिम, SC, खड़गवंशी, गुर्जर, सैनी, जाट और अन्य OBC |
| क्षेत्रीय स्वरूप | मुख्य रूप से ग्रामीण |
| प्रमुख मुद्दे | गन्ना, कृषि, बाढ़, सिंचाई, बिजली, रोजगार और ग्रामीण सड़क |
हसनपुर सामान्य यानी अनारक्षित विधानसभा सीट है। इसका गठन 1957 में हुआ था और यह अमरोहा लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में शामिल है। शुरुआती दो चुनावों में यह दो सदस्यीय सीट थी, जबकि 1967 से एक सदस्यीय विधानसभा क्षेत्र के रूप में चुनाव होता आ रहा है।
Hasanpur Assembly Caste Equations की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के बीच लगभग संतुलित सामाजिक प्रभाव है। पुराने निर्वाचन प्रोफाइल में दोनों समुदायों की संख्या करीब-करीब बराबर मानी गई है। अनुसूचित जाति मतदाताओं की हिस्सेदारी पुराने जनसांख्यिकीय आकलन में लगभग 18.03 प्रतिशत बताई गई थी।
हिंदू मतदाताओं के भीतर खड़गवंशी, गुर्जर, सैनी, जाट, अनुसूचित जाति, प्रजापति, कश्यप, ब्राह्मण, वैश्य और दूसरे छोटे पिछड़े-सवर्ण समुदायों की मौजूदगी है। इन समूहों का मतदान एक दिशा में जाने पर भाजपा को मजबूत आधार मिलता है, जबकि मुस्लिम मतों के साथ गुर्जर, दलित और दूसरे OBC मतदाताओं का गठजोड़ विपक्ष को मुकाबले में ला सकता है।
हसनपुर विधानसभा का सामाजिक चुनावी प्रभाव
| सामाजिक समूह | चुनावी भूमिका |
|---|---|
| मुस्लिम | सबसे बड़े सामाजिक समूहों में, विपक्ष का प्रमुख आधार |
| अनुसूचित जाति | पुराने प्रोफाइल में करीब 18.03 प्रतिशत प्रभाव |
| खड़गवंशी | मौजूदा विधायक की सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण महत्वपूर्ण |
| गुर्जर | 2022 में सपा प्रत्याशी के कारण प्रमुख चुनावी समूह |
| सैनी | सीट के पुराने राजनीतिक इतिहास में मजबूत मौजूदगी |
| जाट | ग्रामीण और किसान राजनीति में प्रभाव |
| प्रजापति-कश्यप | गैर-यादव OBC समीकरण में महत्वपूर्ण |
| ब्राह्मण-वैश्य | भाजपा के व्यापक सामाजिक आधार का हिस्सा |
| अन्य पिछड़े वर्ग | करीबी मुकाबले में परिणाम बदलने की क्षमता |
ये जातिवार आंकड़े 2026 की आधिकारिक मतदाता गणना नहीं हैं। विधानसभा स्तर पर जाति और धर्म के अनुसार वर्तमान मतदाता संख्या प्रकाशित नहीं की जाती। इसलिए सामाजिक प्रभाव पुराने चुनावी आकलनों, जनगणना आधारित प्रोफाइल, प्रत्याशियों की सामाजिक पृष्ठभूमि और पिछले परिणामों के आधार पर समझा जाना चाहिए।
2026 में हसनपुर विधानसभा में 3,39,642 मतदाता
अप्रैल 2026 में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची के अनुसार हसनपुर विधानसभा में कुल 3,39,642 मतदाता हैं। यहां 226 मतदान केंद्र और 423 मतदेय स्थल निर्धारित हैं। मतदाताओं की संख्या के हिसाब से हसनपुर अमरोहा जिले की सबसे बड़ी विधानसभा सीट है।
| विवरण | संख्या |
|---|---|
| 2026 कुल मतदाता | 3,39,642 |
| मतदान केंद्र | 226 |
| मतदेय स्थल | 423 |
| प्री-SIR से शुद्ध कमी | 33,760 |
2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण में हसनपुर विधानसभा से 33,760 मतदाताओं की शुद्ध कमी दर्ज की गई। अंतिम संख्या और शुद्ध कमी को जोड़ें तो प्री-SIR मतदाता आधार करीब 3,73,402 बैठता है। इस प्रकार पुराने आधार की तुलना में करीब नौ प्रतिशत मतदाता कम हुए हैं।
| मतदाता सूची का चरण | मतदाता |
|---|---|
| अनुमानित प्री-SIR आधार | लगभग 3,73,402 |
| 2026 अंतिम मतदाता | 3,39,642 |
| शुद्ध कमी | 33,760 |
| अनुमानित गिरावट | करीब 9.04% |
यह बदलाव 2027 के चुनाव के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दल 2022 या 2024 के बूथवार परिणामों को नई सूची से मिलाए बिना सही चुनावी रणनीति तैयार नहीं कर सकते।
2012 से लगातार बढ़े मतदाता, 2026 में आया बड़ा बदलाव
हसनपुर विधानसभा में मतदाता संख्या 2012 से 2024 तक लगातार बढ़ती रही। 2012 में यहां 3,07,728 मतदाता थे। 2017 में संख्या बढ़कर 3,42,743, 2019 में 3,54,144, 2022 में 3,64,215 और 2024 में 3,71,225 हो गई थी। 2026 की अंतिम सूची में यह संख्या घटकर 3,39,642 रह गई।
| वर्ष | पंजीकृत मतदाता | मतदान प्रतिशत |
|---|---|---|
| 2012 | 3,07,728 | 71.72% |
| 2017 | 3,42,743 | 74.39% |
| 2019 लोकसभा | 3,54,144 | 71.39% |
| 2022 विधानसभा | 3,64,215 | 73.90% |
| 2024 लोकसभा | 3,71,225 | 65.02% |
| 2026 अंतिम सूची | 3,39,642 | — |
2024 के मुकाबले भी वर्तमान मतदाता संख्या करीब 31 हजार कम है। इसलिए पुराने सामाजिक प्रतिशतों को सीधे 2026 के मतदाता आधार पर लागू करना उचित नहीं होगा।
मुस्लिम वोट हसनपुर में कितना महत्वपूर्ण?
हसनपुर में मुस्लिम मतदाता सबसे बड़े सामाजिक समूहों में शामिल हैं। पुराने निर्वाचन प्रोफाइल में हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब-करीब बराबर बताई गई है। यही सामाजिक संतुलन हसनपुर को अमरोहा विधानसभा से अलग राजनीतिक चरित्र देता है।
अमरोहा विधानसभा में मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से अधिक दिखाई देता है, जबकि हसनपुर में गैर-मुस्लिम OBC, दलित और सवर्ण मतदाताओं का संयुक्त सामाजिक आधार मुस्लिम वोट के मुकाबले संतुलन तैयार करता है।
2012 में मुस्लिम उम्मीदवार कमाल अख्तर ने सपा के टिकट पर बड़ी जीत दर्ज की थी। उन्हें 92,843 वोट मिले और उन्होंने बसपा के गंगा सरन को 32,228 वोट से हराया था। इससे पता चलता है कि मुस्लिम मतों के साथ दूसरे समुदायों का समर्थन मिलने पर विपक्ष यहां मजबूत स्थिति बना सकता है।
2017 और 2022 में भाजपा की लगातार जीत बताती है कि मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी मौजूदगी के बावजूद गैर-मुस्लिम सामाजिक समूहों का व्यापक गठजोड़ अधिक प्रभावी साबित हुआ।
मुस्लिम मतों का बंटवारा किसके लिए फायदेमंद?
2022 में सपा के मुखिया गुर्जर को 97,753 वोट मिले। इसके अलावा AIMIM के अतेशाम रजा हाशमी को 4,972, कांग्रेस के आसिम सबरी को 1,734 और दूसरे मुस्लिम प्रत्याशियों को भी कुछ वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर 22,382 था।
छोटे मुस्लिम प्रत्याशियों के वोट जोड़ने पर भी भाजपा की बढ़त पूरी तरह समाप्त नहीं होती, लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता है कि विपक्ष के लिए मुस्लिम मतों का अधिकतम एकीकरण जरूरी है।
2027 में बसपा, कांग्रेस, AIMIM या किसी मजबूत स्थानीय मुस्लिम प्रत्याशी की मौजूदगी सपा के सामाजिक आधार को प्रभावित कर सकती है। मुस्लिम वोटों का विभाजन भाजपा के लिए अनुकूल स्थिति बना सकता है।
दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा एक उम्मीदवार के साथ जाए और उसे गुर्जर, दलित या दूसरे OBC समुदायों का समर्थन मिले तो मुकाबला 2022 की तुलना में अधिक करीबी हो सकता है।
खड़गवंशी मतदाता भाजपा के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
हसनपुर के मौजूदा विधायक महेंद्र सिंह खड़गवंशी हैं। उन्होंने 2017 और 2022 में लगातार चुनाव जीतकर अपनी सामाजिक और राजनीतिक पकड़ मजबूत की है।
2017 में बसपा ने भी गंगा सरन खड़गवंशी को प्रत्याशी बनाया था। उन्हें 51,930 वोट मिले, जबकि भाजपा के महेंद्र सिंह खड़गवंशी को 1,11,269 वोट मिले। एक ही सामाजिक पहचान वाले दो प्रमुख उम्मीदवारों के बावजूद भाजपा ने सपा को हराकर सीट जीती।
इस परिणाम से संकेत मिलता है कि भाजपा की जीत केवल खड़गवंशी वोट तक सीमित नहीं थी। पार्टी को सैनी, जाट, दलित, वैश्य, ब्राह्मण और दूसरे OBC-सवर्ण समुदायों का भी बड़ा समर्थन मिला होगा।
2027 में भाजपा के लिए खड़गवंशी मतदाताओं में अपनी बढ़त बनाए रखना जरूरी होगा। प्रत्याशी बदलने पर इस वोट का ट्रांसफर भी महत्वपूर्ण चुनावी सवाल बन सकता है।
गुर्जर वोट ने 2022 में सपा को पहुंचाया एक लाख के करीब
2022 में समाजवादी पार्टी ने मुखिया गुर्जर को प्रत्याशी बनाया। उन्हें 97,753 वोट और 36.35 प्रतिशत वोट शेयर मिला। यह सपा का मजबूत प्रदर्शन था, लेकिन वह भाजपा से 22,382 वोट पीछे रह गई।
गुर्जर मतदाता पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संख्या के साथ गांव, किसान राजनीति और स्थानीय पंचायत नेटवर्क में भी इस समुदाय का प्रभाव रहता है।
सपा की मुस्लिम-गुर्जर रणनीति ने पार्टी को करीब एक लाख वोट तक पहुंचाया, लेकिन जीत के लिए दलित और दूसरे OBC समूहों में पर्याप्त अतिरिक्त समर्थन नहीं मिल सका।
2027 में सपा या विपक्ष फिर गुर्जर प्रत्याशी पर भरोसा करता है तो मुस्लिम मतों के साथ गुर्जर वोट का तालमेल उसकी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
सैनी समाज का पुराना राजनीतिक प्रभाव
हसनपुर विधानसभा के चुनावी इतिहास में सैनी समाज की मजबूत राजनीतिक मौजूदगी रही है। भाजपा के तुलाराम सैनी ने 1991 और 1993 में लगातार दो बार सीट जीती थी।
1996 में तुलाराम सैनी सिर्फ 563 वोट से सपा के रिफाकत हुसैन से हार गए थे। रिफाकत हुसैन को 65,782 और तुलाराम सैनी को 65,219 वोट मिले थे।
| चुनाव वर्ष | प्रत्याशी | पार्टी | परिणाम |
|---|---|---|---|
| 1991 | तुलाराम सैनी | भाजपा | विजेता |
| 1993 | तुलाराम सैनी | भाजपा | विजेता |
| 1996 | तुलाराम सैनी | भाजपा | 563 वोट से पराजित |
यह इतिहास बताता है कि सैनी मतदाता हसनपुर में लंबे समय से भाजपा के महत्वपूर्ण सामाजिक आधारों में शामिल रहे हैं।
आज भी भाजपा के लिए खड़गवंशी, सैनी, दलित और दूसरे गैर-यादव OBC समूहों का तालमेल बेहद महत्वपूर्ण है। सपा इसी गठजोड़ में सेंध लगाकर अपना मुस्लिम-गुर्जर आधार व्यापक बनाना चाहेगी।
अनुसूचित जाति का लगभग 18 प्रतिशत पुराना प्रभाव
पुराने जनसांख्यिकीय प्रोफाइल में हसनपुर विधानसभा की अनुसूचित जाति हिस्सेदारी करीब 18.03 प्रतिशत बताई गई है। यह मौजूदा 2026 मतदाता सूची का आधिकारिक जातिवार प्रतिशत नहीं है, लेकिन दलित समाज की मजबूत मौजूदगी का संकेत देता है।
2022 में बसपा के फिरेराम को 36,150 वोट और 13.44 प्रतिशत वोट शेयर मिला था। 2017 में बसपा के गंगा सरन खड़गवंशी ने 51,930 वोट हासिल किए थे।
| चुनाव | बसपा वोट | वोट शेयर |
|---|---|---|
| 2017 | 51,930 | 20.37% |
| 2022 | 36,150 | 13.44% |
बसपा के वोट में करीब 15,780 की गिरावट आई, लेकिन भाजपा-सपा के बीच जीत का अंतर 22,382 था। इसलिए बसपा के मतदाताओं का रुख 2027 में मुख्य मुकाबले को प्रभावित कर सकता है।
यदि बसपा अपने दलित आधार को दोबारा मजबूत करती है तो मुकाबला त्रिकोणीय रहेगा। उसका वोट कमजोर होने पर भाजपा और सपा दोनों इस सामाजिक समूह में हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश करेंगे।
जाट और किसान मतदाता क्यों हैं महत्वपूर्ण?
हसनपुर विधानसभा का करीब 82.95 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण और 17.05 प्रतिशत शहरी चरित्र वाला माना गया है। इस कारण यहां जातीय समीकरण के साथ किसान राजनीति भी चुनावी नतीजे पर बड़ा असर डालती है।
| क्षेत्रीय स्वरूप | पुराना अनुमान |
|---|---|
| ग्रामीण | 82.95% |
| शहरी | 17.05% |
गंगा के आसपास स्थित होने के कारण क्षेत्र में खेती, बाढ़ और सिंचाई बड़े स्थानीय सवाल हैं। गन्ना, खाद्यान्न, बागवानी और दुग्ध उत्पादन स्थानीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधारों में शामिल हैं।
जाट मतदाता किसान राजनीति, पंचायतों और गांवों के सामाजिक नेटवर्क के कारण प्रभावशाली माने जाते हैं। जाटों के साथ मुस्लिम, गुर्जर, सैनी, खड़गवंशी, प्रजापति और दलित परिवारों की भी बड़ी संख्या कृषि पर निर्भर है।
इसलिए गन्ना मूल्य, भुगतान, सिंचाई, बाढ़ से सुरक्षा, बिजली, खाद-बीज, आवारा पशु और ग्रामीण सड़कों जैसे मुद्दे जातीय सीमाओं से बाहर जाकर मतदान को प्रभावित कर सकते हैं।
प्रजापति, कश्यप और दूसरे OBC भी कर सकते हैं अंतर
हसनपुर में बड़े सामाजिक समूहों के अलावा प्रजापति, कश्यप, पाल और दूसरे पिछड़े वर्गों की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण है।
इन समुदायों की वर्तमान आधिकारिक मतदाता संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन गैर-यादव OBC समीकरण में इनकी भूमिका भाजपा और सपा दोनों की रणनीति का हिस्सा रहेगी।
भाजपा अपनी पिछली दो जीतों वाला व्यापक हिंदू सामाजिक गठजोड़ बनाए रखना चाहेगी। सपा मुस्लिम-गुर्जर आधार के साथ छोटे और मध्यम OBC समूहों में विस्तार की कोशिश करेगी।
2022 में 22 हजार से अधिक का अंतर था। यदि कोई पार्टी इन छोटे OBC समूहों में पांच से दस हजार अतिरिक्त वोट जोड़ती है तो मुकाबले का अंतर तेजी से कम या बढ़ सकता है।
2022 में भाजपा ने 22,382 वोट से जीती सीट
2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा के महेंद्र सिंह खड़गवंशी ने 1,20,135 वोट हासिल किए। उनका वोट शेयर 44.67 प्रतिशत रहा।
सपा के मुखिया गुर्जर को 97,753 और बसपा के फिरेराम को 36,150 वोट मिले। भाजपा ने चुनाव 22,382 वोट के अंतर से जीता।
| उम्मीदवार | पार्टी | वोट | वोट शेयर |
|---|---|---|---|
| महेंद्र सिंह खड़गवंशी | भाजपा | 1,20,135 | 44.67% |
| मुखिया गुर्जर | सपा | 97,753 | 36.35% |
| फिरेराम | बसपा | 36,150 | 13.44% |
| अतेशाम रजा हाशमी | AIMIM | 4,972 | 1.85% |
| आसिम सबरी | कांग्रेस | 1,734 | 0.64% |
| NOTA | — | 1,279 | 0.48% |
| जीत का अंतर | — | 22,382 | 8.32% |
2022 में कुल 2,68,924 वोट पड़े थे और मतदान करीब 73.9 प्रतिशत रहा। भाजपा को अकेले करीब 45 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन विपक्षी वोट कई दलों में बंटा रहा।
2017 में भाजपा ने सपा से छीनी थी सीट
2017 में भाजपा के महेंद्र सिंह खड़गवंशी को 1,11,269 वोट मिले थे। तत्कालीन सपा विधायक कमाल अख्तर को 83,499 वोट और बसपा के गंगा सरन खड़गवंशी को 51,930 वोट मिले।
भाजपा ने चुनाव 27,770 वोट के अंतर से जीता।
| उम्मीदवार | पार्टी | वोट |
|---|---|---|
| महेंद्र सिंह खड़गवंशी | भाजपा | 1,11,269 |
| कमाल अख्तर | सपा | 83,499 |
| गंगा सरन खड़गवंशी | बसपा | 51,930 |
| जीत का अंतर | — | 27,770 |
2017 से 2022 के बीच भाजपा के वोट में करीब 8,866 की वृद्धि हुई। सपा का वोट भी 14 हजार से अधिक बढ़ा, लेकिन भाजपा ने सीट बरकरार रखी।
बसपा का वोट 51,930 से घटकर 36,150 रह गया। इसके बावजूद सपा भाजपा के अंतर को केवल करीब पांच हजार वोट ही कम कर सकी।
2012 में सपा ने 32,228 वोट से जीती थी हसनपुर
2012 विधानसभा चुनाव में सपा के कमाल अख्तर ने 92,843 वोट हासिल किए थे। बसपा के गंगा सरन को 60,615 वोट मिले।
सपा ने यह चुनाव 32,228 वोट के बड़े अंतर से जीता था।
| चुनाव | विजेता | पार्टी | विजेता के वोट | जीत का अंतर |
|---|---|---|---|---|
| 2012 | कमाल अख्तर | सपा | 92,843 | 32,228 |
| 2017 | महेंद्र सिंह खड़गवंशी | भाजपा | 1,11,269 | 27,770 |
| 2022 | महेंद्र सिंह खड़गवंशी | भाजपा | 1,20,135 | 22,382 |
इन तीन चुनावों से हसनपुर की बदलती राजनीति साफ होती है। 2012 में मुस्लिम उम्मीदवार के नेतृत्व में सपा ने बड़ी जीत दर्ज की। 2017 में भाजपा ने खड़गवंशी प्रत्याशी और व्यापक गैर-मुस्लिम गठजोड़ के जरिए सीट पलट दी। 2022 में मुस्लिम-गुर्जर समीकरण के बावजूद सपा भाजपा से पीछे रह गई।
हसनपुर का चुनावी इतिहास किसी एक पार्टी का नहीं
हसनपुर विधानसभा ने अपने इतिहास में लंबे समय तक किसी एक पार्टी को स्थायी समर्थन नहीं दिया है।
कांग्रेस और भाजपा ने चार-चार बार सीट जीती है। भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी को दो-दो बार सफलता मिली। बसपा, निर्दलीय और कांग्रेस-जगजीवन को भी जीत मिल चुकी है।
| अवधि/वर्ष | प्रमुख राजनीतिक बदलाव |
|---|---|
| 1991 और 1993 | भाजपा के तुलाराम सैनी की लगातार जीत |
| 1996 | सपा के रिफाकत हुसैन की 563 वोट से जीत |
| 2002 | निर्दलीय देवेंद्र नागपाल की बड़ी जीत |
| 2007 | बसपा के फरहत हसन विजयी |
| 2012 | सपा के कमाल अख्तर विजयी |
| 2017 और 2022 | भाजपा के महेंद्र सिंह खड़गवंशी की लगातार जीत |
इतिहास बताता है कि हसनपुर सामाजिक गठजोड़ और प्रत्याशी के अनुसार अपना राजनीतिक रुख बदलती रही है। भाजपा की लगातार दो जीत हाल का मजबूत ट्रेंड जरूर है, लेकिन इसे स्थायी परिणाम नहीं माना जा सकता।
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ी बढ़त
2024 लोकसभा चुनाव में हसनपुर विधानसभा सेगमेंट में भाजपा उम्मीदवार को 1,15,277 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को 76,514 वोट हासिल हुए।
दोनों के बीच वोटों का अंतर 38,763 रहा।
| 2024 लोकसभा: हसनपुर सेगमेंट | वोट |
|---|---|
| भाजपा | 1,15,277 |
| कांग्रेस | 76,514 |
| भाजपा की बढ़त | 38,763 |
हसनपुर ने पिछले चार लोकसभा चुनावों में भी भाजपा या उसके सहयोगी को बढ़त दी है। 2009 में रालोद, 2014 में भाजपा, 2019 में भाजपा और 2024 में भाजपा यहां आगे रही।
यह रुझान बताता है कि लोकसभा चुनाव में हसनपुर का गैर-मुस्लिम सामाजिक आधार लगातार भाजपा या उसके गठबंधन के पक्ष में अधिक संगठित रहा है।
2022 और 2024 के परिणाम क्या बताते हैं?
| चुनाव | भाजपा | मुख्य विपक्ष | भाजपा की बढ़त |
|---|---|---|---|
| विधानसभा 2022 | 1,20,135 | सपा 97,753 | 22,382 |
| लोकसभा 2024 | 1,15,277 | कांग्रेस 76,514 | 38,763 |
भाजपा का वोट दोनों चुनावों में 1.15 लाख से अधिक रहा। इसके विपरीत विपक्ष का वोट 2024 में 2022 के मुकाबले करीब 21 हजार कम हो गया।
हालांकि विधानसभा और लोकसभा चुनावों के उम्मीदवार, मुद्दे तथा मतदान व्यवहार अलग होते हैं। 2024 में मतदान प्रतिशत भी 2022 के 73.9 प्रतिशत से घटकर करीब 65 प्रतिशत रह गया था। इसलिए 2024 की बढ़त को 2027 का निश्चित परिणाम नहीं माना जा सकता।
भाजपा का मजबूत चुनावी गणित क्या है?
हसनपुर में भाजपा की लगातार सफलता का आधार किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं दिखाई देता।
खड़गवंशी और सैनी मतदाताओं के साथ दलित, जाट, ब्राह्मण, वैश्य, प्रजापति, कश्यप और दूसरे गैर-यादव OBC समूहों का व्यापक समर्थन पार्टी को मजबूत आधार देता है।
मौजूदा विधायक की स्थानीय पहचान और लगातार दो जीत भी भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
2017, 2022 विधानसभा और 2019 तथा 2024 लोकसभा चुनावों में लगातार बढ़त से पार्टी का मजबूत कोर वोट दिखाई देता है।
2027 में भाजपा के सामने चुनौती 2026 की बदली मतदाता सूची पर इसी गठजोड़ को बनाए रखने की होगी।
सपा के लिए सीट जीतने का रास्ता
समाजवादी पार्टी के लिए हसनपुर में पहला बड़ा आधार मुस्लिम मतदाता हैं। 2022 में गुर्जर प्रत्याशी उतारकर पार्टी ने मुस्लिम-गुर्जर सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश की और करीब 98 हजार वोट हासिल किए।
सीट जीतने के लिए सपा को मुस्लिम मतों की अधिकतम एकजुटता के साथ गुर्जर, दलित, सैनी, जाट और दूसरे OBC समूहों में समर्थन बढ़ाना होगा।
2012 में सपा ने 32 हजार से अधिक वोट से सीट जीती थी। इसका मतलब है कि पार्टी के लिए हसनपुर असंभव सीट नहीं है।
लेकिन भाजपा के लगातार 1.10 लाख से अधिक वोट वाले आधार को चुनौती देने के लिए विपक्ष को तीसरे दलों में जाने वाले मतों को भी अपने साथ जोड़ना होगा।
बसपा का प्रदर्शन किसका खेल बिगाड़ सकता है?
हसनपुर में बसपा ने 2007 में सीट जीती थी। 2012 में वह दूसरे स्थान पर रही और 2017 में भी पार्टी ने 51,930 वोट हासिल किए।
2022 में बसपा के वोट घटकर 36,150 रह गए। इसके बावजूद यह भाजपा-सपा के अंतर से काफी बड़ा वोट बैंक है।
यदि बसपा मजबूत मुस्लिम, दलित या खड़गवंशी प्रत्याशी उतारती है तो वह फिर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है।
बसपा का मुस्लिम वोट सपा को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि दलित और OBC वोटों में उसकी मजबूती भाजपा के सामाजिक गठजोड़ को प्रभावित कर सकती है।
अगर बसपा का वोट और कमजोर होता है तो उसके मतदाताओं का भाजपा और सपा के बीच वितरण सीट का परिणाम तय कर सकता है।
2026 SIR ने कैसे बदला पुराना गणित?
हसनपुर में 2026 की अंतिम मतदाता संख्या 3,39,642 है। प्री-SIR आधार के मुकाबले 33,760 मतदाता कम हुए हैं।
2022 में भाजपा की जीत का अंतर 22,382 था। मतदाता सूची में हुई शुद्ध कमी जीत के पिछले अंतर से लगभग 11 हजार ज्यादा है।
इसका यह अर्थ नहीं है कि मतदाता सूची के बदलाव से किसी एक पार्टी को निश्चित लाभ या नुकसान हुआ है। उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि किस गांव, जाति या धर्म के कितने मतदाता कम हुए।
फिर भी संख्या इतनी बड़ी है कि भाजपा, सपा और बसपा को बूथवार सामाजिक आधार का नए सिरे से सत्यापन करना होगा।
2027 में इन सात जातीय समीकरणों पर रहेगी नजर
2027 के विधानसभा चुनाव में हसनपुर का परिणाम सात प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक सवालों से प्रभावित हो सकता है।
पहला सवाल मुस्लिम मतदाताओं की एकजुटता का होगा। करीब आधे सामाजिक प्रभाव वाला यह समूह अगर एक प्रमुख विपक्षी उम्मीदवार के साथ जाता है तो भाजपा के लिए मुकाबला कठिन हो सकता है।
दूसरा, खड़गवंशी वोट का रुख होगा। मौजूदा विधायक की सामाजिक पहचान और लगातार दो जीत के कारण भाजपा इस समूह में मजबूत स्थिति बनाए रखना चाहेगी।
तीसरा, गुर्जर मतदाता होंगे। 2022 में सपा ने गुर्जर प्रत्याशी के माध्यम से भाजपा को मजबूत चुनौती दी थी।
चौथा, सैनी वोट होगा। हसनपुर के पुराने चुनावी इतिहास में सैनी समाज भाजपा का मजबूत आधार रहा है।
पांचवां, अनुसूचित जाति मतदाता होंगे। पुराने प्रोफाइल में करीब 18 प्रतिशत प्रभाव वाला यह समूह भाजपा, सपा और बसपा तीनों की रणनीति के केंद्र में रहेगा।
छठा, जाट और व्यापक किसान वोट होगा। 83 प्रतिशत ग्रामीण चरित्र वाली सीट पर गन्ना, सिंचाई, बाढ़, बिजली और सड़क जैसे मुद्दे जातीय समीकरण के साथ मतदान को प्रभावित करेंगे।
सातवां और सबसे नया फैक्टर 2026 की 3,39,642 मतदाताओं वाली सूची होगी। करीब 33,760 मतदाताओं की शुद्ध कमी ने पुराने बूथ गणित को बदल दिया है।
2017 में भाजपा की 27,770 वोट की जीत, 2022 में 22,382 की बढ़त और 2024 लोकसभा चुनाव में करीब 38,763 वोट की बढ़त हसनपुर में पार्टी के मजबूत हालिया रिकॉर्ड को दिखाती है। लेकिन हिंदू-मुस्लिम सामाजिक संतुलन, बसपा का दलित वोट, मुस्लिम-गुर्जर समीकरण और 2026 की बदली मतदाता सूची 2027 में मुकाबले को खुला बनाए रखती है।
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