'हमारा घर पब्लिक टॉयलेट है...', इस कॉमेडियन ने किया चौंकाने वाला खुलासा, सुनाई अपनी दर्दनाक कहानी

Published on 11 जुल॰ 2026

Rajiv Thakur Recalled Poverty Days: 'द ग्रेट इंडियन कपिल शो' में अपनी शानदार कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों को हंसाने वाले कॉमेडियन राजीव ठाकुर (Rajeev Thakur) ने हाल ही में अपनी जिंदगी के उस दौर का जिक्र किया, जिसके बारे में वो आज भी खुलकर बात करने से बचते हैं. लोगों को अपनी कॉमेडी से हंसाने वाले राजीव ने इस बार अपने बचपन के संघर्ष, गरीबी और परिवार की आर्थिक परेशानियों को याद करते हुए भावुक कर देने वाला खुलासा किया.

बता दें कि वैभव मुंजाल के पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान राजीव ठाकुर कई बार भावुक हो गए. उन्होंने बताया कि उनका बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता. एक छोटे से कमरे में पूरा परिवार रहता था, पिता की नौकरी छूट गई थी, मां कपड़े सिलकर घर चलाती थीं और पढ़ाई के लिए उनके पास सिर्फ 40 वॉट का एक बल्ब हुआ करता था.

'अपने बचपन को याद भी नहीं करना चाहता'

राजीव ठाकुर ने कहा कि वो अपने संघर्षों के बारे में बहुत कम बात करते हैं क्योंकि उन दिनों को याद करना आज भी उनके लिए बेहद तकलीफदेह है. उन्होंने कहा, "मेरा सफर ऐसे हालात में शुरू हुआ, जिन्हें मैं याद भी नहीं करना चाहता. अगर आज मैं लोगों को अपने बचपन की कहानी बताऊं तो शायद उन्हें ये मनगढ़ंत लगे, क्योंकि अब उन बातों की पुष्टि करने वाला कोई नहीं है." उन्होंने आगे कहा कि कई लोग उन्हें सलाह देते हैं कि अपने दर्द को स्टैंड-अप कॉमेडी का हिस्सा बनाएं. कॉमेडियन ने कहा, "मैं कभी-कभी ऐसा करता भी हूं, लेकिन जब उन घटनाओं पर मजाक सुनाता हूं तो अंदर का दर्द फिर से ताजा हो जाता है. कई बार शो खत्म होने के बाद मैं बैकस्टेज जाकर रो पड़ता हूं. शायद यही वजह है कि मैं अपने जीवन के उस दौर के बारे में ज्यादा बात नहीं करता."

एक कमरे में गुजरता था पूरा परिवार

राजीव ठाकुर ने बताया कि उनका पूरा बचपन एक बेहद छोटे से कमरे में बीता, जहां पूरा परिवार एक साथ रहता था. उन्होंने कहा, "हम पांच लोग एक ही कमरे में रहते थे. उसी कमरे में हमारा खाना बनता था, वहीं हम सोते थे और वहीं हमारी पूरी जिंदगी गुजरती थी. अगर परिवार का कोई एक सदस्य नहाने जाता था तो बाकी चार लोगों को बाहर इंतजार करना पड़ता था. कई बार मुझे लगता था कि हमारा घर कोई पब्लिक टॉयलेट है. उन्होंने बताया कि उस समय प्राइवेसी जैसी कोई चीज उनकी जिंदगी में नहीं थी.

1984 के दंगों में बर्बाद हो गई थी पिता की फैक्ट्री

राजीव ठाकुर ने अपने परिवार की आर्थिक तंगी की वजह भी बताई. उन्होंने कहा कि उनके पिता अमृतसर में धागे की फैक्ट्री चलाते थे, लेकिन 1984 के दंगों में उनकी फैक्ट्री पूरी तरह बर्बाद हो गई. उन्होंने बताया, "फैक्ट्री बंद होने के बाद पिताजी बेरोजगार हो गए. हमारे पास कमाई का कोई स्थायी जरिया नहीं बचा था. कई बार तो घर का किराया देना भी मुश्किल हो जाता था." परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि रोजमर्रा का खर्च चलाना भी बड़ी चुनौती बन गया था.

40 वॉट के बल्ब में होती थी पढ़ाई

राजीव ने बताया कि उनके घर में सिर्फ 40 वॉट का एक पीले रंग का बल्ब था, जिसकी रोशनी में वो पढ़ाई किया करते थे. उन्होंने कहा, "मुझे पीली रोशनी से नफरत हो गई थी, क्योंकि मैंने कभी ट्यूब लाइट की सफेद रोशनी देखी ही नहीं थी. जब किसी दूसरे के घर जाता और वहां सफेद रोशनी देखता तो सोचता था कि हमारे घर में ऐसा बल्ब कब लगेगा." उन्होंने ये भी बताया कि उनके मकान मालिक रात 9 बजे बिजली बंद कर देते थे, क्योंकि किराए में बिजली का खर्च शामिल था. उन्होंने कहा, "उसके बाद हमारे पास सिर्फ दो ही ऑप्शन होते थे, या तो सो जाएं या फिर मिट्टी के तेल वाले लैंप की रोशनी में बैठें."

मां सिलती थीं कपड़े, तभी चलता था घर

राजीव ठाकुर ने बताया कि परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां ने संभाली. उन्होंने कहा, "मेरी मां लोगों के कपड़े सिलती थीं. वही ग्राहकों से कपड़े लेकर आती थीं और सिलने के बाद वापस पहुंचाती थीं. उसी कमाई से हमारा घर चलता था." उन्होंने बताया कि मां की मेहनत और त्याग को देखकर ही उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली.

रोज तीसरी मंजिल तक ढोना पड़ता था पानी

राजीव ने अपने बचपन की एक और मुश्किल का जिक्र करते हुए बताया कि उनका परिवार एक ऐसी बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर रहता था, जहां लिफ्ट नहीं थी. उन्होंने कहा, "हमें रोज नीचे से पानी की बाल्टियां भरकर तीसरी मंजिल तक ले जानी पड़ती थीं. उस समय ये सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा था."

'आज लगता है मैंने बहुत कुछ हासिल कर लिया'

अपनी सफलता पर बात करते हुए राजीव ठाकुर ने कहा कि कभी-कभी उन्हें लगता है कि उन्होंने अपनी कल्पना से कहीं ज्यादा हासिल कर लिया है. उन्होंने कहा, "आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि मैंने अपनी सोच से भी ज्यादा पा लिया है. लेकिन फिर जब आसपास देखता हूं तो लगता है कि कोई और मुझसे आगे निकल गया है. शायद जिंदगी का यही नियम है कि इंसान हमेशा आगे बढ़ना चाहता है."

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