न्याय की राह में भाषा और दिव्यांगता नहीं बनेगी बाधा:ब्रेल लिपि में मिलेगी कानूनी जानकारी; इंदौर कॉन्फ्रेंस में दिव्यांगों के लिए समावेशी न्याय का मॉडल
इंदौर2 घंटे पहले
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कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल हुए।
न्याय का दरवाजा हर नागरिक के लिए खुला है, लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति के लिए क्या होगा, जो अपनी बात बोलकर नहीं कह सकता, सुनकर नहीं समझ सकता या आंखों से पढ़ नहीं सकता? क्या भाषा, शारीरिक अक्षमता या सामाजिक परिस्थितियां, उसके और न्याय के बीच दीवार बन सकती हैं? इंदौर में आयोजित वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस ने इन सवालों का बेहद संवेदनशील और प्रभावी जवाब दिया कि न्याय केवल सक्षम लोगों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है, जिसे इसकी जरूरत है।
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SALSA) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस में न्याय व्यवस्था को अधिक सर्वसमावेशी और सुलभ बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल सामने आईं। खास तौर पर मूक-बधिर और दृष्टिबाधित लोगों को न्यायिक व्यवस्था और विधिक सहायता की योजनाओं से जोड़ने के प्रयास ने आयोजन को अलग पहचान दी।
कॉन्फ्रेंस में मुख्य अतिथियों और विशिष्ट अतिथियों का स्वागत भी सामान्य औपचारिकताओं से अलग था। आनंद सर्विस सोसाइटी के मूक-बधिर बच्चों और अन्य संस्थाओं से जुड़े दिव्यांग बच्चों ने अपने हाथों से तैयार किए ग्रीटिंग कार्ड और पौधे भेंट कर अतिथियों का स्वागत किया।
इन बच्चों के हाथों से बने कार्ड सिर्फ स्वागत संदेश नहीं थे, बल्कि यह एहसास भी करा रहे थे कि न्याय व्यवस्था में उनकी मौजूदगी और उनकी आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी बच्चों की इस पहल की सराहना की। उन्होंने इसे आयोजन की संवेदनशील और कल्पनाशील पहल बताते हुए बच्चों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।

इंदौर में वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन हुआ।
दृष्टिबाधितों के लिए अब ब्रेल में मिलेगी कानूनी जानकारी
न्याय तक पहुंच केवल कोर्ट तक पहुंचने का नाम नहीं है। इसके लिए सबसे पहले व्यक्ति को यह पता होना जरूरी है कि उसके अधिकार क्या हैं और वह कानूनी सहायता कहां से और कैसे प्राप्त कर सकता है। इसी सोच के साथ नालसा की विभिन्न योजनाओं और विधिक सेवाओं की जानकारी को ब्रेल लिपि में तैयार किया गया है। इसकी विशेष गाइड ‘स्पर्श’ (SPARSH) का कॉन्फ्रेंस में विमोचन किया गया।
इस पहल का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि दृष्टिबाधित व्यक्ति अब कानूनी सहायता से जुड़ी जानकारी किसी दूसरे पर निर्भर हुए बिना अपनी सुविधा के अनुसार प्राप्त कर सकेंगे। यानी जानकारी तक पहुंच के बाद ही न्याय तक पहुंच का रास्ता और आसान होगा।
मूक-बधिरों के लिए मंच पर ही मौजूद रहा ‘उनका माध्यम’
मूक-बधिर प्रतिभागियों को कॉन्फ्रेंस से अलग न रहना पड़े, इसके लिए पूरे कार्यक्रम के संवाद का लाइव भारतीय सांकेतिक भाषा (Indian Sign Language) में अनुवाद किया गया।
सांकेतिक भाषा एक्सपर्ट्स अक्षय सोनी और खुशी डोंगरे ने मंच पर होने वाली बातचीत और संबोधनों को सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत किया। इससे मूक-बधिर प्रतिभागी भी सम्मेलन की हर महत्वपूर्ण बात को समझ सके। कॉन्फ्रेंस में NALSA के थीम सॉन्ग को भी भारतीय सांकेतिक भाषा में जारी किया गया। यह संदेश महत्वपूर्ण था कि समावेशन केवल मंच पर मौजूद रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति को पूरी प्रक्रिया समझने और उसमें बराबरी से भाग लेने का अवसर देना भी जरूरी है।

‘द सिम्फनी ऑफ होप’ ने बताया- उम्मीद की कोई भाषा नहीं होती
आनंद सर्विस सोसाइटी के मूक-बधिर बच्चों और अन्य संस्थाओं के दिव्यांग बच्चों ने ‘द सिम्फनी ऑफ होप’ नाम से सांस्कृतिक प्रस्तुति दी। बच्चों की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद न्यायाधीशों, अधिकारियों और अतिथियों को भावुक कर दिया।
इस पहल में आनंद सर्विस सोसाइटी के ज्ञानेन्द्र पुरोहित और मोनिका पुरोहित की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी देखरेख में बच्चों ने अपनी प्रतिभा के जरिए यह संदेश दिया कि शारीरिक अक्षमता प्रतिभा, संवेदनशीलता और सपनों के रास्ते में बाधा नहीं है।
संवाद और आपसी सहमति से सुलझेंगे सामुदायिक विवाद
कॉन्फ्रेंस में न्याय तक पहुंच के एक दूसरे महत्वपूर्ण पहलू कम्युनिटी मेडिएशन यानी सामुदायिक मध्यस्थता की सफलता भी साझा की गई। NALSA और मध्यप्रदेश SALSA की पहल पर शुरू की गई 40 घंटे की कम्युनिटी मेडिएशन ट्रेनिंग का उद्देश्य समुदाय स्तर पर विवादों को संवाद, समझ और आपसी सहमति के माध्यम से सुलझाने के लिए प्रशिक्षित लोगों को तैयार करना है।
इसका खास पहलू यह है कि हर विवाद को कोर्ट तक ले जाना जरूरी नहीं। कई मामलों में दोनों पक्षों को साथ बैठाकर, उनकी बात सुनकर और उनके बीच समझ विकसित कर समाधान निकाला जा सकता है।
मूक-बधिरों के दो जटिल मामलों में मध्यस्थता बनी समाधान का रास्ता
कम्युनिटी मेडिएशन से जुड़े अपने अनुभव में अतुल राठौर ने बताया कि ज्ञानेन्द्र पुरोहित के मार्गदर्शन और सहयोग से उन्होंने मूक-बधिरों से जुड़े दो जटिल मामलों को आपसी समझ और मध्यस्थता के जरिए सुलझाने में सफलता हासिल की।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मूक-बधिर व्यक्ति की बात को समझने और दोनों पक्षों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करने में सामान्य मध्यस्थता की तुलना में अतिरिक्त संवेदनशीलता और विशेष कौशल की जरूरत होती है।
‘हम खुश हैं कि मामला बिना लंबी कानूनी लड़ाई के सुलझा’
मध्यस्थता की इस पहल से लाभान्वित पूजा गुप्ता और दीपक गुप्ता ने न्यायपालिका और संबंधित संस्थाओं के प्रति आभार जताया। उन्होंने बताया कि मूक-बधिरों से जुड़ा यह पहला ऐसा मामला था, जो मध्यस्थता के माध्यम से इतनी सहजता से सुलझ सका।
उनके लिए यह सिर्फ एक कानूनी विवाद का समाधान नहीं था, बल्कि ऐसी व्यवस्था का अनुभव था, जिसमें उनकी बात को समझने, सुनने और समाधान तक पहुंचाने के लिए न्यायिक तंत्र ने उनके अनुरूप रास्ता तैयार किया।
कानूनी नजरिए से बड़ा संदेश- ‘समान न्याय’ का मतलब समान अवसर भी
संविधान का मूल दर्शन हर व्यक्ति को समानता और न्याय का अधिकार देता है, लेकिन व्यवहार में समान न्याय तभी संभव है, जब हर व्यक्ति को न्याय व्यवस्था तक पहुंचने के लिए आवश्यक साधन और सुविधाएं भी मिलें।
दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिए ब्रेल में जानकारी, मूक-बधिर व्यक्ति के लिए सांकेतिक भाषा में संवाद और विशेष जरूरत वाले लोगों के लिए संवेदनशील विधिक सहायता, ये सभी कदम इसी व्यापक कानूनी अवधारणा को व्यवहार में उतारते हैं।
यानी समान न्याय का अर्थ हर व्यक्ति के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार करना ही नहीं, बल्कि उसकी जरूरत के अनुसार ऐसी सुविधा उपलब्ध कराना भी है, जिससे वह न्याय की प्रक्रिया में बराबरी से शामिल हो सके।
न्याय की भाषा वही होनी चाहिए, जिसे जरूरतमंद समझ सके
इस कॉन्फ्रेंस की सबसे महत्वपूर्ण सीख यही रही कि न्याय केवल कोर्ट का फैसला नहीं है। न्याय तक पहुंचने के लिए जानकारी, संवाद, सम्मान और विश्वास भी उतने ही जरूरी हैं।
जब किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति को उसकी भाषा यानी ब्रेल में कानून की जानकारी मिलती है, जब किसी मूक-बधिर व्यक्ति के लिए उसकी सांकेतिक भाषा में पूरा संवाद उपलब्ध कराया जाता है और जब किसी कमजोर वर्ग के व्यक्ति को उसकी परिस्थिति के अनुरूप कानूनी सहायता मिलती है, तब न्याय व्यवस्था वास्तव में ‘सबके लिए न्याय’ के संवैधानिक संकल्प के करीब पहुंचती है।
इंदौर का यह आयोजन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ गया कि न्याय के दरवाजे पर पहुंचने के लिए किसी व्यक्ति को अपनी भाषा, अपनी पहचान या अपनी शारीरिक क्षमता बदलने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, न्याय व्यवस्था को ही उसके करीब पहुंचना होगा।
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