Sawan Somwar Vrat Katha : सावन के दूसरे सोमवार पर ऐसे करें शिवजी को प्रसन्न, पूजा के बाद पढ़ें यह व्रत कथा

Published on 9 अग॰ 2026

सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त 2026 को पड़ रहा है और इस दिन पूजा-अर्चना के साथ सोमवार व्रत कथा का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इस कथा को पढ़ने या सुनने से भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है और हर मनोकामना पूरी होती है।

Sawan Somwar Vrat Katha : सावन मास में सोमवार का व्रत रखना और भगवान शिव की आराधना करना सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के सोमवार पर शिव-पार्वती की पूजा के साथ व्रत कथा सुनना या पढ़ना अत्यंत फलदायी होता है। इस वर्ष सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त 2026 को है।

शास्त्रों में बताया गया है कि सोमवार का व्रत रखने से निसंतान को संतान की प्राप्ति होती है और जीवन के समस्त दुख-दर्द समाप्त होते हैं।

आइए जानते हैं सावन सोमवार की वह पौराणिक कथा, जिसे सुनने से मनवांछित फल मिलता है।

साहूकार की भक्ति और पुत्र प्राप्ति का वरदान

पौराणिक समय की बात है, एक नगर में एक बेहद समृद्ध साहूकार रहता था। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन कोई संतान न होने के कारण वह और उसकी पत्नी हमेशा दुखी रहते थे।

पुत्र प्राप्ति की इच्छा से साहूकार हर सोमवार को भगवान शिव का व्रत रखता था और शाम के समय मंदिर जाकर नियम से दीपक जलाया करता था।

उसकी निष्ठा देखकर माता पार्वती ने भगवान शिव से आग्रह किया कि वे इस सच्चे भक्त की मनोकामना पूरी करें। इस पर भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह संसार कर्मक्षेत्र है, इंसान जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल मिलता है।

लेकिन माता पार्वती के बार-बार अनुनय-विनय करने पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि बालक की आयु केवल 12 वर्ष होगी।

साहूकार मंदिर में ही मौजूद था और उसने शिव-पार्वती की यह पूरी बातचीत सुन ली। उसने न तो अत्यधिक खुशी जताई और न ही उदास हुआ। वह पहले की तरह ही शांत मन से भक्ति और पूजा करता रहा।

शिक्षा के लिए काशी की यात्रा

समय बीतने पर साहूकार की पत्नी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया। साहूकार जानता था कि बालक की उम्र सीमित है, इसलिए उसने यह बात किसी को नहीं बताई।

जब बालक 11 वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी भेजने का निर्णय लिया। उसने बालक के मामा को बुलाकर बहुत सारा धन दिया और कहा कि वे बालक को सुरक्षित काशी ले जाएं।

साथ ही हिदायत दी कि रास्ते में जहां भी ठहरें, वहां यज्ञ-हवन करें और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें।

राजकुमारी से अनोखा विवाह

मामा और भांजा धर्म-कर्म करते हुए काशी की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में एक राजा के नगर में उसकी पुत्री के विवाह का आयोजन चल रहा था।

जिस राजकुमार से राजकुमारी का विवाह तय हुआ था, वह एक आंख से काना था। उसके पिता को डर था कि सच सामने आने पर विवाह टूट जाएगा।

राजकुमार के पिता की नजर साहूकार के सुंदर पुत्र पर पड़ी। उन्होंने लड़के के मामा से बात की और उसे कुछ समय के लिए नकली वर बनाने का प्रस्ताव दिया।

मामा और भांजा इसके लिए तैयार हो गए। विवाह की रस्में संपन्न हुईं, लेकिन जाते-जाते साहूकार के लड़के ने राजकुमारी की चुनरी के पल्ले पर सच लिख दिया—”तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है, लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजा जा रहा है, वह एक आंख से काना है। मैं पढ़ाई के लिए काशी जा रहा हूं।”

जब राजकुमारी ने यह पढ़ा, तो उसने काने राजकुमार के साथ जाने से इनकार कर दिया। विवश होकर राजा ने बारात वापस लौटा दी।

शिव-पार्वती की कृपा से मिला नया जीवन

उधर, साहूकार का लड़का काशी पहुंचकर पढ़ाई में मन लगाने लगा और उसके मामा नियमित यज्ञ करते रहे। जब लड़का ठीक 12 वर्ष का हुआ, तो उस दिन भी घर में यज्ञ का आयोजन था।

लड़के ने मामा से कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं लग रही है और वह अंदर जाकर सो गया। कुछ ही देर में उसके प्राण निकल गए।

मामा ने देखा कि भांजा शांत पड़ा है, लेकिन उन्होंने धैर्य रखा ताकि यज्ञ का काम अधूरा न छूटे। यज्ञ पूरा होने के बाद जब वे रोने लगे, उसी समय मार्ग से भगवान शिव और माता पार्वती गुजर रहे थे।

दुखी आवाज सुनकर माता पार्वती ने शिवजी से प्रार्थना की कि वे इस रोते हुए व्यक्ति का कष्ट दूर करें। जब वे पहुंचे तो माता पार्वती ने बालक को पहचान लिया और भोलेनाथ से कहा कि यह वही साहूकार का पुत्र है।

उन्होंने बालक को पुनः जीवन देने का आग्रह किया। माता पार्वती की करुणा देखकर भगवान शिव ने बालक को दीर्घायु का वरदान दे दिया और वह जीवित उठ बैठा।

सुखद अंत और व्रत की महिमा

शिक्षा पूरी कर जब लड़का अपने मामा के साथ वापस लौट रहा था, तो वे उसी नगर से गुजरे जहां उसका विवाह हुआ था।

राजा ने अपने दामाद को पहचान लिया और आदर-सत्कार के साथ अपनी पुत्री को बहुत सारे उपहारों के साथ विदा किया।

जब वे अपने नगर पहुंचे, तो साहूकार और उसकी पत्नी छत पर इस प्रण के साथ बैठे थे कि यदि पुत्र सकुशल नहीं लौटा तो वे प्राण त्याग देंगे।

पुत्र के सकुशल लौटने और बहु के साथ आने की खबर सुनकर वे नीचे आए और खुशी-खुशी अपने परिवार का स्वागत किया।

मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सावन सोमवार का व्रत रखते हैं और श्रद्धापूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और उन्हें हर कार्य में सफलता मिलती है।