संस्कृत के साथ बी.टेक - डाटा सांइस और अन्य टेक्नोफ्रेंडली भाषाओं को क्यों पढ़ें
By प्रो अजय कुमार मिश्र
Published: Sunday, August 9, 2026, 16:09 [IST]
कुछ दिनों से केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (सीएसयू), दिल्ली से जुड़े विविध सोशल मीडिया पर विशेष कर युवा पीढ़ियों के बीच इस मुद्दे को लेकर जम कर चर्चा हो रही है कि सीएसयू की स्थापना संस्कृत और इसके शास्त्र रक्षा के लिए की गयी थी। अतः एआई या आधुनिक विषयों की पढाई लिखाई को महत्त्व देना वाजिब नहीं है।
शास्त्र के प्रति छात्र-छात्राओं की चिन्ता होना लाजिमी है और यह चिन्ता संस्कृत को लेकर एक नयी जागृति के रूप में भी देखा जाना चाहिए। लेकिन इसका भी ख़्याल रहे कि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने संस्कृत को आधुनिक इमर्जिंग डिसिप्लिन ( बी.टेक तथा डाटा सांइस, नासिक परिसर, महाराष्ट्र) के साथ साथ अपने श्रृंगेरी ( कर्णाटक) और देवप्रयाग ( उत्तराखण्ड ) परिसरों में शास्त्र की समग्र उन्नति के लिए नितान्त रुप से शास्त्र उत्कर्ष केन्द्रों की भी स्थापना की है।
लगातार चौतरफा उन्नति की ओर अग्रसर सीएसयू ने देश के पारम्परिक छात्र छात्राओं के लिए बहुत ही प्रचुर मात्रा तथा संख्या में वजीफा की भी व्यवस्था की है जिन्हें देश के विविध लब्धप्रतिष्ठ आईआईटी में भी जा कर अध्ययन करने का अवसर मिलेगा । वहां के शिक्षक भी सीएसयू में आकर अल्पकालिक अध्यापन कर सकते हैं।
भारतीय शिक्षा नीति - 2020 में संस्कृत को केन्द्र में रख कर भारतीय भाषाओं की उन्नति की बात की गयी ,उसका सीधा मतलब सिर्फ़ भाषा ही नहीं है क्योंकि कोई भी भाषा तथा उसका साहित्य तभी आम जन तक पहुंच पाता है, जब उसके पास सम्प्रेषण के विविध प्रभावी तथा युगधर्मी - द्रुतगामी माध्यम का संसाधन मौजूद हो । सूचना प्रोद्यौगिकी के इस दौर में संस्कृत और उसके शास्त्रों में छुपी सामग्री को आम जनता तक पहुंचाने के लिए आज के दौर में हम एआई तथा डाटा साइंस के जायज़ इस्तेमाल करने से अपना मुंह नहीं मोड़ सकते हैं । अतः इसके लिए यह आवश्यक है कि इसके विषय में हमारे संकाय सदस्यों के साथ साथ संस्कृत के छात्र छात्राएं भी इस विज्ञान से ठीक ठाक से वाकिफ हों।
शास्त्रजीवि समाज को इसका भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए कि सीएसयू को ही सबसे पहले देश में संस्कृत विश्वविद्यालय के रुप में ए ++ रैंक मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । यह रैंक इसे सिर्फ़ इसलिए नहीं हासिल हो सका कि संस्कृत शास्त्रों के प्रचार प्रसार में इसने अपनी एक मानीखेज़ भूमिका निभाया है , बल्कि एन.ई.पी. 2020 के हिसाब से सीएसयू ने संस्कृत के पठन पाठन को मल्टी डिसिप्लिनरी साबित किया है और भारत सरकार के हिसाब से बनाये गये एन. आई. आर. एफ. के मापदण्डों पर खरा उतरने के कारण देश के संस्कृत विश्वविद्यालयों में अव्वल तो आया ही है। साथ ही देश के विविध विश्वविद्यालयों में भी उम्दा स्थान बना कर शैक्षणिक जगत में ख़ास पहचान दर्ज किया है। यह सब सिर्फ शास्त्र के कारण ही नहीं मुमकिन हो सका, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर जो एक मानक तैयार किया गया है, उस लिहाज से भी यह सीएसयू ने शास्त्र के साथ साथ आधुनिक ज्ञान विज्ञान के पैमानों का भी अमिट खाका़ विशेष कर चार सालों में तैयार कर अपने संकाय सदस्यों , अकादमिक प्रशासकों और छात्र छात्राओं के साथ मिल कर खींचा है।
अतः ऐसा लगता है सोशल मीडिया में आ रहे कुछ छात्र छात्राओं समुदाय की नाराज़गी केन्द्रीय संस्कृति विश्वविद्यालय के इस चौतरफा विकास का बौद्धिक अश्वमेध यज्ञ में थोड़ा रुकावट का काम कर सकता है । इस फूट डालो और शासन करो की कुनीति का फ़ायदा कुछ मुट्ठी भर संस्कृत विरोधी ताकत उठा सकते हैं । पिछले साल भारत के अक्षुण्ण गौरवशाली राज्य तमिलनाडु के माननीय सांसद द्वारा संस्कृत को लेकर उठाये प्रश्न शायद आपको भी याद होगा, जिसका मुंहतोड़ जवाब उन्हें न केवल संसद के अन्दर , बल्कि बाहर भी माननीय कुलपति प्रो श्रीनिवास वरखेडी के अगुवाई में संस्कृत अनुरागियों ने जवाब दिया था । ऐसा तो नहीं, शास्त्र बनाम आधुनिक भाषा को संस्कृत विरोधी खेमा तिल का तार न बना कर इसे अपना राजनीतिक हथकंडा न बना लें।
अपने व्यक्तिगत या गुटबाजी के स्वार्थ के कारण इस खेल में आधुनिक भाषा तथा शास्त्र के दोनों गुटों की भी खेमेबाजी हो सकती है। यहां यह भी याद दिलाना जायज़ लगता है कि भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय का संविधान पीठ का यूजीसी के पक्ष में जो 90 के दशक में ऐतिहासिक फैसला दिया गया था उसके हिसाब से देश का प्रत्येक विश्वविद्यालय को यूजीसी का मापदण्डों को मानना पड़ेगा । इसलिए भी यहां पर फैकेल्टी की बात उठाई गयी है और जहां तक तकनीक आदि से जुड़ी आधुनिक भाषाओं की बात रही, यदि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय को भी भारत के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में शीर्ष की ओर बढ़ना है, तो शास्त्र के साथ साथ एआई तथा डेटा सांइस , एल . एल . बी . भारतीय विधिशास्त्र , कम्प्यूटर साइंस , आयुर्वेदगुरुकुलम् या अन्य नवाचारी प्रोग्राम को बढ़ावा देना पड़ेगा।
आज के ज्ञान विज्ञान के दौर में संस्कृत के शास्त्रों को इन नवाचार पाठ्यक्रमों को अपनी युगीनता के साथ शस्त्र के रूप में अपनाना ही होगा । अन्यथा संस्कृत भाषा तथा साहित्य पर अतीत तथा पूजा पाठ मात्र की भाषा का जो इल्ज़ाम लगाया जाता रहा है ,उस ऑपनिवेशिक कटघरे से बाहर निकल पाना मुमकिन नहीं हो पाएगा ।भारत के संविधान के प्रारूप को लेकर विदेशी प्रभाव का भी प्रश्न उठाया जाता रहा है । लेकिन अब समय आ गया है कि संस्कृत में जो इस दृष्टि से भारत प्रत्यय का मूल भाव समाया हुआ है उसे उजागर किया जाय, जिसमें एल .एल. बी .भारतीय विधि शास्त्र के पढ़ने पढ़ाने वाले की अहम भूमिका होगी । हमें यह तथ्य भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत के न्यायलय में ऐसे अनेक अहम फैसले लिए गये हैं जिनका आधार भारतीय धर्मशास्त्र और मीमांसा दर्शन आदि ही रहा है।
इस दृष्टि से केरल का माननीय उच्च न्यायालय काफ़ी चर्चा में रहा है । ध्यान रहे कि किसी भी कानून में जब उस देश की सामाजिक , आध्यात्मिक , दार्शनिक , रीति रिवाज तथा रहने सहन की सांस्कृतिक व्यवस्था समाहित होती है, तो उसके निर्णय में अधिक स्वभाविकता रहती है क्योंकि किसी भी देश का निर्मित धर्मशास्त्र अपनी समकालीन वस्तु स्थिति का अन्त: साक्ष्य होता है । यही कारण है कि भारतीय टीकाकार यहां के धर्मशास्त्र का तहकी़का़त अपने अपने क्षेत्र के अनुकूल करते आये हैं। यही तो शास्त्र का लचीलापन है ।जैसे दक्षिण के कुछ राज्यों में पुत्री को भी अपने पिता को मुखाग्नि देने का अधिकार बहुत ही पहले दे दिया था। अतः वही शास्त्र मूल तथा कालजयी शास्त्र हो सकता है जो अपने नवाचारी समकालीन युगबोधों को अपने मूल्यों में समेटते हुए हजारों सालों को लांघता हुआ ,अपने समकालीन महत्त्वों को भी बरकरार रखे। संस्कृत की यही अपार कालजयी शास्त्र शक्ति है और वर्तमान युग में भी इमर्जिंग बहुभाषिक विषयों के साथ जो सरगम का संगम प्रवाहमान होने को तत्पर है उसके तरंग को भंग नहीं किया जाना चाहिए।
संस्कृत का शास्त्र जो हर शताब्दी में एक नयी सुषमा की ऊष्मा के साथ आकर विमर्श का केन्द्र बन जाती है। अतः इसकी शास्त्रीयता की किसी बाह्य शक्ति से कोई खतरा तो नहीं है। यदि नितान्त एक रैखिक शास्त्र की बातें होती ,तो कालिदास की तरह अन्य संस्कृत नाटकों में संस्कृत के साथ साथ प्राकृत ,शौरसेनी या अर्धमागधी आदि के पात्र आपस में संवाद कैसे स्थापित कर पाते ?आज के संस्कृत रुपकों में भोजपुरी तथा हिन्दी भाषा भाषियों का प्रयोग भी गौ़रतलब है । संस्कृत का क्षेत्रीय भाषा ( कन्नड) के साथ मणि प्रवाल शैली संस्कृत में भारतीय भाषाओं के साथ घुलने मिलने का एक प्रबल प्रमाण है।
संस्कृत के आधुनिक काव्य रचना का वट्सैप के संवाद को आधार बना कर प्रकाशन होना , संस्कृत में अभिनव शब्दावली के आगाज़ के साथ संस्कृत के डाटा सांइस में इज़ाफ़ा के लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण पहल माना जाना चाहिए। इस तरह के कार्य बहुत ही कम प्रकाश में हैं। संभवतः इसलिए भी शास्त्र के पण्डितों को इस तरह के ज्ञान विज्ञान के इमर्जिंग तकनीकी भाषाओं के साथ बहुत अधिक ओरिएंट नहीं किया जा सका है। संस्कृत को केन्द्र में रख कर बी.टेक तथा डाटा साइंस की पढ़ाई संस्कृत विद्या को एआई के क्षेत्र में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली है । यह समय की मांग है कि शास्त्र के विद्वत् समाज पाणिनी व्याकरण की दुर्लभ प्रतिभा से संस्कृत के नजदीक वाले भारतीय भाषाओं की शब्दावली का निर्माण तथा इक्ट्ठा कर एआई के लिए मुहैय्या करायें ,ताकि आने वाले समय में भारत एआई के क्षेत्र में अपना दबदवा क़ायम कर सके । इसलिए भी सीएसयू को नये पाठ्यक्रमों को चलाने की जरुरत है।
सीएसयू को ए++ से नवाजे जाने के अवसर की एक बैठक में सीएसयू के कुलपति प्रो श्रीनिवास वरखेडी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में यह साफ़ तौर पर कहा था कि सीएसयू को ऐसा श्रेष्ठ रैंक मिला तो गया है । लेकिन भविष्य में इसे बचा कर रखना और उत्तरोत्तर शैक्षणिक दुनिया में नाम कमाने के लिए हमें और अधिक प्रयास करते रहना पड़ेगा । वस्तुत: एआई जैसे नवाचारी पाठ्यक्रमों का आग़ाज़ संस्कृत के उज्ज्वल भविष्य की ओर एक ऊंची उड़ान माना जाना चाहिए । इसका संस्कृत के व्यापक प्रचार प्रसार के साथ साथ सांस्कृतिक महत्त्व भी है क्योंकि एआई हम आप के बीच के ही प्रयोग किये जाने वाले दत्तांश ( डाटा) को लेकर अपना काम करता है। लेकिन यह तब तक अधिक खतरनाक है, जब तक कि अपने भारतीय भाषाओं विशेष कर संस्कृत से जुड़े तकनीकी शब्दावली को एआई को मुहैय्या न कराया जाय।
इसका भी ध्यान रहे कि इस दिशा में भारत सरकार की सर्वोपरि संस्था वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग ( सीएसटीटी) , दिल्ली ने भारत के अन्य भारतीय भाषाओं को संस्कृत को केन्द्र में रख कर तकनीकी शब्दावली निर्माण में ऐतिहासिक कार्य इस आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष प्रो गिरीश नाथ झा , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली की अध्यक्षता में किया गया है। इसका परिणाम यह है कि आईटी के बदौलत संस्कृत शब्दावली भारतीय भाषाओं के तकनीकी शब्दकोश के जरिए सारी दुनिया में पहुंच रही है और एआई को भारतीय भाषाओं के तकनीकी शब्दों का डाटा संसाधन भी मिल रहा है । इसका दूरगामी परिणाम यह भी होगा कि एआई को संस्कृत के शब्दों का डाटा हाथ लग जाने पर ,यह शब्द सर्जन की दृष्टि से हम पाश्चात्य तकनीक के बौद्धिक गुलाम होने से बच सकेंगे और भविष्य में भारतीय मूल का कारगर एआई तकनीक का भी ईजाद कर पाएंगे।
केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (सीएसयू) संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए भारत सरकार का एक नोडल इकाई के रूप में भी जाना जाता है। अतः केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो श्रीनिवास वरखेडी के मार्गदर्शन में संस्कृत के साथ बी.टेक तथा डाटा साइंस जैसे नये प्रोग्राम का आगाज़ किया गया है ,वह संस्कृत तथा उसके शास्त्र के वैश्विक प्रसार में रामबाण की भूमिका अदा कर सकता है और इसे सीएसटीटी के साथ हाथ मिला कर आगे बढ़ने की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण पहल माना जा सकता है।
युग के साथ परिवर्तन लाजमी है ।उस तब्दीली से मुंह मोड़ना कभी कभी घातक हो जाता । किसी उत्कर्ष के लिए यह ज़रूरी है कि उसकी परम्परा के आगे बढाने के लिए उसके अतीत को पिछला कदम तथा अगले कदम को उसकी आधुनिकता को लेकर उसके समुचित विकास का संसाधन माना जाना चाहिए । हिन्दुस्तान के देववाणी के विराट् पुरुष के रूप में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की अक्षुण्ण शास्त्र परम्परा इसका पिछला कदम है तथा बी.टेक तथा डाटा साइंस , भारतीय विधि शास्त्र में एल. एल. बी. जैसे आधुनिक विषयों तथा इमर्जिंग ज्ञान विज्ञान विषयों को पठन पाठन में अपनाया जाना अगला कदम के रूप में माना जाना चाहिए । तभी हम सीएसयू के संकाय सदस्य या छात्र छात्रा तथा कर्मयोगी परिवार अपने सीएसयू रुपी शरीरावयव मिल कर इसका और अधिक नवाचारी रुप में नाम रौशन कर सकते हैं।
सीएसयू द्वारा आयुर्वेदगुरूकुलम् या भारतीय विधि शास्त्र पाठ्यक्रम को आरंभ किया जाना भी शास्त्र तथा भारतीय ज्ञान परम्परा को आधुनिक कसौटी पर कस कर दुनिया में लाने का सार्थक कदम कहा जा सकता है । इसमें शास्त्र के साथ समकालीनता का भी बोध झलकता है । इससे संस्कृत के क्षेत्र में बहुआयामी रोज़गार के नये अवसर भी खुलेंगे । साथ ही साथ अंग्रेजी हुकू़मत के समय भारतीय शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक तथा पारम्परिक धाराओं में बांट कर जो खाई पैदा किया गया था ,उसकी भी भरसक भरपाई की यह थोड़ी कोशिश है । इस बंटवारे की आड़ में जहां आयुर्वेद की जगह एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति को तरजीह देना था, वहीं गुरुकुल जो मूल भारतीय शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी थी तथा प्रखर सांस्कृतिक राष्ट्रवादी अंग्रेज़ विरोधी गतिविधियों का ऊर्जा केन्द्र भी था, उसे भी पूरी तरह दरकिनार करना था । अंग्रेज़ यह समझ गये थे कि संस्कृत में सांस्कृतिक तथा भाषिक इस्पाती एकता का एक प्राणदायिनी शक्ति । अतः "फूट डालो और शासन करो" की कुनीति के तहत संस्कृत को भारतीय भाषाओं की मुख्यधारा से अलग थलग कर किया गया।
संस्कृत के साथ अरबी , फारसी तथा उर्दू आदि भाषाओं के नाम पर भी यही विघटनकारी खेल खेला गया । ग़ौरतलब है कि आज के दौर में भी संस्कृत -तमिल को लेकर विवाद खड़ा किया जाता रहा है । इस वर्तमान भाषिक विवाद को ऑपनिवेशिक सैडो के रूप में देखा जाना चाहिए। यह कहना कोई ग़लत नहीं प्रतीत होता है कि जाने अंजाने में ही सही ,संस्कृत और शास्त्र सम्मत महिमा मण्डन का खास मिजा़ज़ तथा आज के विविध टेक्नोफ्रेंडली भाषा अध्ययन अध्यापन के बीच यही विघटनकारी शक्ति छद्म रूप में जुटी हो । आम तौर पर यह देखा गया है कि पहले लंदन की हुकूमत किसी मुल्क को कब्जा कर के पूरा दोहन करती है और फिर उसे चूसने के लिए अमेरिका के हवाले कर देती है । ध्यान रहे ,दिल्ली के जंतर मंतर की हाल फिलहाल के जेन जी के आधी अधूरी सफलता को लेकर जो सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा से विदेशी ताकतों के हाथ होने की भनक लगती है , उसके कई मायने हो सकते हैं।
यह मुमकिन है कि संस्कृत के शास्त्र तथा भारतीय भाषाओं तथा टेक्नोफ्रेंडली ज्ञान विज्ञान की भाषाओं के बीच टकराहट की शमां बांधने के लिए देश के अन्दर के ही कुछ विभेदकारी शक्तियां इसे सह देने के फिराक में लगी हो और दुनिया का सबसे युवा आबादी वाला अपना मुल्क भारत के नौजवान इस तथ्य को न समझने की भूल भी कर रहें हो । संस्कृत रूपी रथ के चक्के में ज्ञान विज्ञान से जुड़े इमर्जिंग तकनीकी भाषा के रूप में बी.टेक तथा डाटा साइंस आदि विषय इनकी आरणियां हैं जो इनके चक्कों को अन्त: शक्ति और ऊर्जा देगी ,उन शक्तियों की सहायता के बिना हम अलग थलग पड़ जाएंगे।अतः यह आवश्यक है कि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ही नहीं ,अपितु देश के अन्य पारम्परिक विश्वविद्यालयों को भी संस्कृत के साथ इन नवाचारी विषयों के नूतन प्रयोगों के साथ बढ़ चढ़ कर आगे आना चाहिए । यह बात सही है कि किसी भी नये पहल को लागू करने के लिए बहुत ही साहसिक कदम उठाने की ज़रूरत होती है और कभी कभार उसका चौतरफा घोर विरोध भी किया जाता है । लेकिन सीएसयू ने एक बहुत ही बड़ा साहसिक कदम उठाया है जिसमें शास्त्र, छात्र तथा तकनीक का मिल जुल कर व्यापक प्रयोग होने जा रहा है । संस्कृत और उसके शास्त्र में छुपे ज्ञान विज्ञान को ये नये प्रोग्राम्स आईटी तथा एआई आदि विषयों के साथ अपना हाथ बटा कर एक सशक्त अभिव्यक्ति का संवाहक बनाएगा । यह तथ्य भी कोई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि आखिर इसका क्या कारण है कि नासा जैसा दुनिया का जाना माना विज्ञान से जुड़े संस्था संस्कृत को कम्प्युटर के लिए सर्वाधिक सुटेबल भाषा क्यों माना है ? जहां एक ओर समय समय पर हम संस्कृत के लोग इसका बखान कर के आत्मगौरव का अनुभव करते हैं ,लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ , आज संस्कृत और उसके शास्त्र को तकनीकी ज्ञान विज्ञान की भाषाओं के साथ मिल जुल कर काम करने में आना कानी कर रहें हैं ।ऐसा तो नहीं कि हम अपने अतीत गौरव के बखान के चक्कर में वर्तमान के भविष्योन्मुखी यथार्थ से अलग थलग हो रहें हैं । शास्त्र के शंखनाद के शोर में बी.टेक तथा डाटा साइंस जैसे आधुनिक विषयों के सरगम को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं ? संस्कृत वैसे ही नहीं भविष्य की भाषा बनने वाली है । संस्कृत रुपी रथ के चक्के की धुरि में द्रुत तथा समावेशी संवाहक का उत्तरदायित्व ,यही सब उभरते टेक्नोलॉजी निभाने वाले हैं।
अतः यह बहुत ही ज़रूरी है कि विशेष कर संस्कृत संकाय सदस्य अपनी मानस संतति छात्र - छात्राओं के साथ सार्थक संवाद कर शास्त्र और आज के इमर्जिंग डिसीप्लीन के समन्वित महत्त्व को समझे और समझायें । इसके लिए सभी को मिल जुल कर सच्चे मन से एक साथ बैठ कर अपनी अपनी बातें रखनी पड़ेगी ।
शास्त्र के प्रति युवा पीढ़ी का बढ़ता रूझान संस्कृत की लोकप्रियता की दृष्टि से मायने रखता है । लेकिन इस युवा पीढ़ी की इस शक्ति को संस्कृत के चौतरफे विकास की ओर मोड़ना पड़ेगा । संस्कृत के इसी उथल पुथल के माहौल में संस्कृत के लिए एक टिकाऊ तथा दूरगामी रोडमैप बनाना होगा । क्यों न भले कुछ मुट्ठी भर लोग संस्कृत की प्रासंगिकता के खिलाफ़ मनगढ़ंत सवाल उठा रहें हों । लेकिन बौद्धिक दुनिया में संस्कृत से हट कर जो समाज है ,उनका इस भाषा के ज्ञान संपदा को लेकर आकर्षण बढ़ा है। लेकिन यह भी सच है कि विदेशों के बहुत सारे विश्वविद्यालयों में संस्कृत के अनेक चेयर्स पर ताले लटका दिये गये हैं । लेकिन इसका बहुत बड़ा कारण यह भी लगता है भारतीय जनमानस और प्राशासनिक दृष्टि से भारत का छान बीन करने के लिए इन चेयर्स को खोला गया था , लेकिन समय के साथ उस अध्ययन की प्रासंगिकता ,अब उतनी रही नहीं । समय के साथ विकसित तथा विकासशील देशों के चिन्तन का पैमाने बदल गये हैं । अतः आज की नजरीये से संस्कृत के ज्ञान विज्ञान को दुनिया को बताना और समझाना होगा । संभव है भविष्य में विशेष कर सीएसयू की पीढ़ी इस ताले को अपने ज्ञान से पुनः खोल सकेंगे ।एआई तथा ज्ञान विज्ञान के टेक्नोफ्रेंडली भाषाओं के साथ संस्कृत और उसके शास्त्रों के साथ अनिवार्य रुप से आकादमिक तथा तकनीकी मायने से तहकी़का़त करने की खा़स ज़रूरत है।
(इस आलेख के लेखक वरिष्ठ समीक्षक तथा संस्कृत में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित डा अजय कुमार मिश्रा , केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली में संस्कृत के साहित्य विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं जो इस विश्वविद्यालय के विद्वत्परिषद् के सदस्य भी हैं । इस आलेख में लेखक का अपना स्वतन्त्र विचार है)