खेलो इंडिया नई पीढ़ी के भविष्य के लिए बेहद जरूरी, भारतीय हॉकी कोच ने दी प्रतिक्रिया

Published on 9 अग॰ 2026

खेलो इंडिया नई पीढ़ी के भविष्य के लिए बेहद जरूरी, भारतीय हॉकी कोच ने दी प्रतिक्रिया

By Oneindia Staff

Time Published: Sunday, August 9, 2026, 20:05 [IST]

भारत में खेलों को लेकर तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब खेलों को केवल मेडल जीतने और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन करने तक सीमित नहीं माना जा रहा। खेल युवाओं को आत्मविश्वास देने, उन्हें अनुशासन सिखाने और अपनी क्षमता पहचानने का भी जरिया हैं। यही वजह है कि खेलों में किया गया इन्वेस्टमेंट असल में देश की युवा पीढ़ी में किया गया इन्वेस्टमेंट है।

केंद्र सरकार की ओर से खेलो इंडिया योजना के विस्तार और राष्ट्रीय खेल महासंघों को मजबूत करने की दिशा में उठाए गए कदम इसी सोच को आगे बढ़ाते हैं। इसका सबसे अहम पहलू यह है कि युवा खिलाड़ियों को शुरुआती लेवल से लेकर बड़े मंच तक पहुंचाने के लिए एक बेहतर सिस्टम तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है।

Khelo India

स्कूल और गांव के मैदान से शुरू हो सकता है सफर

हर खिलाड़ी की कहानी किसी बड़ी एकेडमी या इंटरनेशनल इवेंट से शुरू नहीं होती। कई खिलाड़ी स्कूल के मैदान, गांव के खेल मैदान या स्थानीय प्रतियोगिताओं से अपनी पहचान बनाते हैं। ऐसे में प्रतिभा को शुरुआती स्तर पर पहचानना और फिर उसे आगे बढ़ने का मौका देना बेहद जरूरी है।

खेलो इंडिया फीडर स्कूल और खेलो इंडिया उत्कृष्ट विद्यालय जैसी पहल इसी दिशा में अहम हो सकती हैं। इनके साथ ट्रेनिंग सेंटर और अकादमियों का नेटवर्क बढ़ाने की कोशिश से युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा निखारने के ज्यादा मौके मिल सकते हैं।

किसी खिलाड़ी की प्रतिभा पहचान लेना आसान हिस्सा है। असली चुनौती उसे कई वर्षों तक सही तरीके से तैयार करने की होती है। इसके लिए अच्छी कोचिंग, पर्याप्त समय और लगातार प्रतियोगिताओं में खेलने का अनुभव जरूरी है।

सिर्फ प्रतिभा नहीं, लगातार सहयोग भी जरूरी

कई युवा खिलाड़ी शुरुआत में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, लेकिन आगे बढ़ने के लिए उन्हें जरूरी सुविधाएं और मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। यही वह जगह है जहां इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट्स प्रोग्राम जैसी पहल महत्वपूर्ण हो सकती है।

इसका उद्देश्य ज्यादा खिलाड़ियों को शुरुआती दौर से ही जरूरी सहयोग और मार्गदर्शन की दिशा में काम करना है। अगर प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को केवल तब सपोर्ट मिले जब वे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच जाएं, तो इससे पहले ही कई प्रतिभाएं पीछे छूट सकती हैं। एक मजबूत खेल व्यवस्था की पहचान यही है कि वह खिलाड़ी को उसके सफर के हर पड़ाव पर मिले।

अच्छे खिलाड़ी के साथ अच्छे कोच भी जरूरी

किसी खिलाड़ी की सफलता में कोच की भूमिका को कम करके नहीं देखा जा सकता। कोच केवल तकनीक नहीं सिखाता, बल्कि खिलाड़ी की सोच, आत्मविश्वास और खेल के प्रति नजरिए को भी प्रभावित करता है।

इसी लिहाज से नेशनल कोच अक्रिडएशन बोर्ड की स्थापना को महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। बेहतर कोच तैयार होंगे तो उसका फायदा सिर्फ एक खिलाड़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी खेल व्यवस्था मजबूत होगी।

भारतीय और विदेशी कोच को एक-दूसरे के मुकाबले में देखने की जरूरत भी नहीं है। भारतीय कोच देश के खिलाड़ियों और घरेलू खेल व्यवस्था को अच्छी तरह समझते हैं, जबकि विदेशी कोच अपने अनुभव से नई तकनीक और अलग नजरिया ला सकते हैं। दोनों के अनुभव का सही इस्तेमाल खिलाड़ियों के लिए फायदेमंद हो सकता है।

अब खेल सिर्फ मैदान की ट्रेनिंग तक सीमित नहीं

आधुनिक खेलों में खिलाड़ी की तैयारी का तरीका भी बदल चुका है। अब केवल मैदान पर अभ्यास करना पर्याप्त नहीं है। स्पोर्ट्स साइंस, फिटनेस, रिकवरी और चोट से बचाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं।

खिलाड़ी अगर सही तरीके से ट्रेनिंग करे, पर्याप्त रिकवरी ले और चोट लगने के बाद वैज्ञानिक तरीके से वापसी करे, तो उसके करियर की लंबाई और प्रदर्शन दोनों बेहतर हो सकते हैं। इसलिए आधुनिक खेल व्यवस्था में सपोर्ट स्टाफ की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है।

हॉकी ने दिखाया मजबूत सिस्टम का फायदा

भारतीय हॉकी इस बात का उदाहरण है कि लगातार मेहनत और मजबूत घरेलू ढांचे का फायदा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे मिलता है। पुरुष हॉकी टीम का लगातार ओलंपिक में पोडियम पर पहुंचना एक लंबे समय की प्रक्रिया का परिणाम है।

घरेलू स्तर पर होने वाली प्रतियोगिताएं खिलाड़ियों को खुद को साबित करने का मौका देती हैं। हॉकी इंडिया नेशनल चैंपियनशिप जैसी प्रतियोगिताओं से भी खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का रास्ता मिलता है। जब किसी खिलाड़ी को लगातार मुकाबले खेलने, बेहतर ट्रेनिंग हासिल करने और आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं, तो उसका असर बड़ी प्रतियोगिताओं में दिखाई देता है।

भारत के पास प्रतिभा की कमी नहीं

भारत में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। असली जरूरत उस प्रतिभा के आसपास ऐसा सिस्टम तैयार करने की है, जिसमें खिलाड़ी शुरुआत से लेकर टॉप लेवल तक लगातार आगे बढ़ता रहे। एक युवा खिलाड़ी को अगर सही समय पर अच्छा कोच, बेहतर सुविधाएं, नियमित प्रतियोगिताएं और आगे बढ़ने का स्पष्ट रास्ता मिल जाए तो उसके बड़े खिलाड़ी बनने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

खेलो इंडिया जैसी योजनाओं की सफलता को केवल जीते गए पदकों की संख्या से नहीं आंकना चाहिए। इसकी असली कामयाबी तब होगी जब देश के छोटे शहरों, गांवों और स्कूलों से निकलने वाली प्रतिभाओं को भी आगे बढ़ने का पूरा मौका मिले। आखिरकार खेलों में किया गया निवेश सिर्फ आज के चैंपियन तैयार करने के लिए नहीं है। यह उन हजारों बच्चों के लिए रास्ता तैयार करने की कोशिश है, जिनमें से कोई आने वाले समय में भारत का अगला ओलंपिक पदक विजेता बन सकता है।

-लेखक भारतीय पुरुष हॉकी टीम के कोच हैं