रसरंग में मायथोलॉजी: राजधर्म की धारणा को कार्तिकेय की कथा से ऐसे समझें

Published on 11 जुल॰ 2026

रसरंग में मायथोलॉजी:राजधर्म की धारणा को कार्तिकेय की कथा से ऐसे समझें

देवदत्त पट्टनायक1 घंटे पहले

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वर्ष 1850 के आसपास गौश रंगों से बनाई गई कार्तिकेय की एक पेंटिंग। यह ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित है। - Dainik Bhaskar

वर्ष 1850 के आसपास गौश रंगों से बनाई गई कार्तिकेय की एक पेंटिंग। यह ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित है।

करीब 400 वर्ष पहले केरल में प्रचलित हुई कुछ दंतकथाएं हमें उसके रहस्यमय अतीत की ओर ले जाती हैं। इन कथाओं के अनुसार, जिस भूमि पर आज केरल स्थित है, उसे परशुराम ने समुद्र से प्राप्त कर ब्राह्मणों को सौंप दिया था। लेकिन समय के साथ ब्राह्मण समुदाय के भीतर इस भूमि के शासन को लेकर तीव्र प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। इसलिए यह तय किया गया कि केरल का शासन चलाने के लिए बाहरी क्षेत्रों से राजाओं को बुलाया जाए।

दूसरे शब्दों में कहें तो ब्राह्मणों को भूमि तो मिल गई थी और वे उससे लाभ भी उठा रहे थे। उनसे अपेक्षा थी कि वे अन्य ब्राह्मणों के भूमि संबंधी अधिकारों की रक्षा करेंगे। लेकिन जब उन पर भरोसा नहीं रहा, तब चेरामन पेरुमल नामक राजाओं को देश के अन्य भागों से केरल की देखरेख के लिए आमंत्रित किया गया। वे एक निश्चित अवधि तक शासन करते और फिर उनकी जगह कोई दूसरा राजा ले लेता। इस प्रकार, ऐसे कई संरक्षक राजा लगातार उभरकर आए।

कहा जाता है कि इस शृंखला का अंतिम राजा दुर्भाग्यवश नियमों का उल्लंघन कर अपने राज्य का उपभोग करने लगा। इस प्रकार, वह रक्षिक्कुक (अर्थात् रक्षा करने वाला) से अनुभाविक्कुक (अर्थात् भोग करने वाला) में बदल गया। इसलिए उससे राजपद त्यागने के लिए कहा गया। तब उसे लगा कि इस्लाम को छोड़कर अन्य किसी भी धर्म में राजा को अपने राज्य का भोग करने की अनुमति नहीं है। इसलिए उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया। ध्यान रहे, यह एक दंतकथा है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि केरल में राजसत्ता की अवधारणा इतनी विशिष्ट क्यों थी। इससे यह भी पता चलता है कि केरल के मुसलमान क्यों मानते हैं कि उनके एक राजा इस्लाम के प्रारंभिक धर्मांतरितों में से थे।

यहां रक्षक और उपभोक्ता के बीच के अंतर पर ध्यान देना आवश्यक है। क्या जिस व्यक्ति पर भूमि की रक्षा का दायित्व हो, उसके लिए उसी भूमि का उपभोग करना उचित है? वेदों में यह धारणा राज धर्म के रूप में समझाई गई है। यही धारणा शिवपुत्र कार्तिकेय की कथा में भी दिखाई देती है। कार्तिकेय का जन्म देवताओं की रक्षा के उद्देश्य से हुआ था। उन्होंने तारकासुर का वध किया और स्वर्ग की सेना के सेनापति बने। उनके नेतृत्व में देवताओं ने स्वर्ग की रक्षा की। लेकिन फिर कार्तिकेय स्वर्ग की स्त्रियों के प्रति आकर्षित होने लगे। यह देखकर इंद्र चिंतित हो गए। उन्हें भय हुआ कि यदि स्वर्ग का रक्षक भी इंद्र की तरह स्वर्ग का उपभोग करने लगे तो एक दिन वह उनकी जगह भी ले सकता है।

तब सभी देवताओं ने कार्तिकेय की माता शक्ति से सहायता मांगी। शक्ति ने उन्हें आश्वस्त किया। इसके बाद जब भी कार्तिकेय किसी स्त्री की ओर आकर्षित होते, उनके मन में अपनी मां की छवि उभर आती। इस प्रकार उन्हें अपनी कामनाओं पर नियंत्रण करना पड़ा। अंततः वे एक तपस्वी योद्धा बन गए। बाद में तपस्वी योद्धाओं का एक पंथ उभरा, जिसने कार्तिकेय को अपना आराध्य माना। ये योद्धा भारत के संरक्षक हैं, लेकिन उसका भोग नहीं करते। इसी अर्थ में वे भारत के राजनीतिज्ञों से भिन्न हैं। भारत की रक्षा का दावा करने वाले अनेक राजनीतिज्ञों का लक्ष्य अंततः उसके संसाधनों का उपभोग करना ही होता है।

इसी कारण उत्तर भारत में कार्तिकेय को एक महान योद्धा के रूप में देखा जाता है। यहां उनकी पहचान युद्ध से जुड़ी है। वे संयम और आत्मनियंत्रण के प्रतीक हैं। हालांकि कार्तिकेय का यह स्वरूप इतनी प्रसिद्धि नहीं पा सका और फिर उनकी जगह हनुमान ने ले ली। जिस प्रकार कार्तिकेय ने इंद्र के लिए युद्ध किया, उसी प्रकार हनुमान ने राम के लिए। लेकिन हनुमान ने राम के राज्य से कभी कुछ नहीं चाहा। वे केवल उसके संरक्षक थे, भोगी नहीं।

बाद के समय में भारत के अनेक राजाओं ने दुर्गा को अपने राज्यों की संरक्षक देवी के रूप में स्वीकार किया। दुर्गा मां भी हैं, इसलिए वे अपनी संतानों को भूमि का उपभोग करने देती हैं। इस प्रकार वे संरक्षिका बन जाती हैं। यह ऐसी बात है, जिसे हमारे राजनीतिज्ञों को बार-बार याद दिलाए जाने की आवश्यकता है।

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