कौन हैं घनश्याम सिंह? कांग्रेस ने दतिया उपचुनाव में दिया टिकट, क्या है जाति? राजघराने से ताल्लुक

Published on 11 जुल॰ 2026

कौन हैं घनश्याम सिंह? कांग्रेस ने दतिया उपचुनाव में दिया टिकट, क्या है जाति? राजघराने से ताल्लुक

Time Published: Sunday, July 12, 2026, 2:36 [IST]

Ghanshyam Singh Congress Datia Candidate: मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। बीजेपी के दिग्गज नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाकर राजनीतिक समीकरण बदल दिए। इसी बीच कांग्रेस ने भी अपना दांव चल दिया और अनुभवी नेता घनश्याम सिंह को मैदान में उतार दिया।

दिलचस्प बात यह है कि घनश्याम सिंह सिर्फ पुराने कांग्रेस नेता ही नहीं, बल्कि दतिया राजघराने से भी जुड़े हैं। ऐसे में अब सवाल यह है कि आखिर कांग्रेस ने उन्हीं पर भरोसा क्यों जताया और उनकी राजनीतिक ताकत क्या है?

Ghanshyam Singh Congress Datia Candidate

कौन हैं घनश्याम सिंह? (Who is Ghanshyam Singh?)

घनश्याम सिंह दतिया की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा हैं। वह लंबे समय से कांग्रेस के साथ जुड़े हुए हैं और कई बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। उनकी पहचान ऐसे नेता की रही है जो लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और जनता के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखते हैं। घनश्याम सिंह ठाकुर (राजपूत) समुदाय से हैं।

दतिया और सेवढ़ा दोनों इलाकों में उनका अच्छा जनाधार माना जाता है। राजनीतिक भाषणों और संगठन को संभालने की उनकी क्षमता भी कांग्रेस के लिए बड़ी ताकत मानी जाती है।

घनश्याम सिंह का संबंध दतिया के पूर्व राजघराने से है। उनके पिता महाराज कृष्ण सिंह जू देव वर्ष 1984 में कांग्रेस के टिकट पर भिंड-दतिया लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे। यही पारिवारिक विरासत आज भी उनकी राजनीतिक पहचान का अहम हिस्सा मानी जाती है।

कांग्रेस का मानना है कि स्थानीय लोगों के बीच उनकी साफ-सुथरी छवि, सामाजिक स्वीकार्यता और राजघराने से जुड़ा बैकग्राउंड चुनाव में पार्टी को अतिरिक्त बढ़त दिला सकता है।

कैसा रहा अब तक घनश्याम सिंह का राजनीतिक सफर? (Ghanshyam Singh Political Journey)

घनश्याम सिंह का चुनावी रिकॉर्ड उतार-चढ़ाव भरा रहा है, लेकिन उन्होंने कई अहम मुकाबलों में जीत भी दर्ज की है।

  • 1993 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार दतिया से विधायक बने।
  • 1998 में चुनाव हार गए।
  • 2003 में फिर वापसी करते हुए दोबारा विधायक चुने गए।
  • 2008 में बीजेपी के डॉ. नरोत्तम मिश्रा से हार का सामना करना पड़ा।
  • 2013 में सेवढ़ा से चुनाव लड़ा लेकिन जीत नहीं मिली।
  • 2018 में सेवढ़ा सीट से बीजेपी के राधेलाल बघेल को हराकर विधानसभा पहुंचे।
  • 2023 के चुनाव में बीजेपी के प्रदीप अग्रवाल ने उन्हें हरा दिया।

अब कांग्रेस ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताते हुए दतिया उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया है।

कांग्रेस ने फिर क्यों जताया भरोसा?

सूत्रों के मुताबिक घनश्याम सिंह का नाम मध्य प्रदेश कांग्रेस संगठन ने दिल्ली भेजा था और पार्टी नेतृत्व ने उसी पर मुहर लगा दी। पहले चर्चा थी कि अयोग्य घोषित किए गए पूर्व विधायक राजेंद्र भारती के परिवार से किसी सदस्य को टिकट मिल सकता है, लेकिन कांग्रेस ने आखिरकार अनुभवी चेहरे पर दांव लगाया।

घनश्याम सिंह ने उम्मीदवार बनने के बाद कहा कि उनका फोकस विकास, सामाजिक सद्भाव और सकारात्मक राजनीति पर रहेगा। उन्होंने कहा कि चुनाव पूरी ताकत से लड़ा जाएगा और जनता के बीच विकास के मुद्दे लेकर जाएंगे।

बीजेपी की अंदरूनी नाराजगी पर कांग्रेस की नजर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस इस चुनाव में बीजेपी के भीतर चल रही नाराजगी का फायदा उठाना चाहती है। नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किए, राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया, बाजार बंद कराया और स्थानीय बीजेपी कार्यालय में ताला तक लगा दिया। कई कार्यकर्ताओं के इस्तीफे की भी चर्चा रही।

हालांकि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने साफ कहा कि पार्टी ने किसी भी इस्तीफे को स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने कहा कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और उनके मार्गदर्शन में बीजेपी दतिया उपचुनाव बड़े अंतर से जीतेगी।

दतिया उपचुनाव का पूरा शेड्यूल

दतिया उपचुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 13 जुलाई तय की गई है। नाम वापस लेने की अंतिम तारीख 16 जुलाई होगी। मतदान 30 जुलाई को होगा, जबकि वोटों की गिनती 3 अगस्त को की जाएगी। दतिया सीट पर अब मुकाबला कांग्रेस के घनश्याम सिंह और बीजेपी के आशुतोष तिवारी के बीच होगा।

एक तरफ कांग्रेस अनुभवी और स्थानीय पकड़ वाले नेता पर भरोसा कर रही है, तो दूसरी तरफ बीजेपी नए चेहरे के साथ मैदान में उतरी है। इस चुनाव का असर सिर्फ दतिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे मध्य प्रदेश की राजनीति के लिए भी अहम संकेत माना जा रहा है।