Nighasan Assembly Caste Equations निघासन विधानसभा के जातिगत समीकरण 2027

Published on 19 अग॰ 2026

Nighasan Assembly Caste Equations में दलित, कुर्मी, मुस्लिम, मौर्य-कुशवाहा, सिख, यादव और दूसरे पिछड़े समुदाय 2027 के चुनावी मुकाबले की प्रमुख सामाजिक धुरियां हैं। पुराने चुनावी आकलनों में दलित मतदाताओं को सबसे बड़ा समूह और उसके बाद मुस्लिम तथा मौर्य मतदाताओं को निर्णायक माना गया था। 2026 की अंतिम मतदाता सूची में निघासन विधानसभा में 3,26,572 मतदाता हैं। मौजूदा विधायक भाजपा के शशांक वर्मा हैं, जिन्होंने 2022 में सपा के आर.एस. कुशवाहा को 41,009 वोट से हराया था। 2024 लोकसभा चुनाव में भी भाजपा निघासन विधानसभा खंड में आगे रही, लेकिन उसकी बढ़त 17,306 वोट रह गई।

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के जातिगत समीकरण / जातीय समीकरण और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर चुनावी परिणाम काफी हद तक निर्भर करता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 एक ऐसा निर्णायक अवसर है जो राज्य की दीर्घकालिक राजनीतिक दिशा को स्पष्ट करेगा।

उत्तर प्रदेश एसआईआर (SIR) की अंतिम सूची 2026 के तहत राज्य के सभी 75 जिलों में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप कुल मतदाताओं की संख्या में कमी दर्ज की गई है।

लखीमपुर खीरी जिले के निघासन विधानसभा के 2007  से 2022 तक का तुलनात्मक विश्लेषण, ताज़ा अपडेट, चुनावी इतिहास और पिछले चुनावों के नतीजे

उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के पिछले चुनावी नतीजों का 2007 से 2022 तक तुलनात्मक विश्लेषण, जिसमें प्रत्येक सीट का चुनावी इतिहास, विजेता और उपविजेता प्रत्याशी, मत प्रतिशत, जीत का अंतर और बदलते राजनीतिक समीकरण शामिल हैं।

निघासन विधानसभा संख्या 138 सामान्य यानी अनारक्षित सीट है और खीरी लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में शामिल है। सीट पर पहला चुनाव 1957 में हुआ था। 2008 के परिसीमन के बाद इसे वर्तमान विधानसभा संख्या 138 मिली। विधानसभा का करीब 89.46 प्रतिशत सामाजिक-भौगोलिक आधार ग्रामीण और करीब 10.54 प्रतिशत शहरी है। 2011 की जनगणना आधारित प्रोफाइल में अनुसूचित जाति का हिस्सा करीब 20.5 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति का हिस्सा करीब 1.6 प्रतिशत बताया गया है।

निघासन विधानसभा एक नजर में

विवरणजानकारी
विधानसभानिघासन
विधानसभा संख्या138
जिलालखीमपुर खीरी
लोकसभा क्षेत्रखीरी
आरक्षण स्थितिसामान्य
वर्तमान विधायकशशांक वर्मा
पार्टीभाजपा
2026 कुल मतदाता3,26,572
SIR से पहले मतदाता3,53,604
SIR नेट कमी27,032
SIR कमीकरीब 7.64%
2026 मतदेय स्थल387
2022 विजेताशशांक वर्मा, BJP
2022 उपविजेताआर.एस. कुशवाहा, SP
2022 जीत का अंतर41,009 वोट
2024 लोकसभा खंड BJP वोट1,16,230
2024 लोकसभा खंड SP वोट98,924
2024 BJP बढ़त17,306 वोट
ग्रामीण हिस्साकरीब 89.46%
SC सामाजिक हिस्साकरीब 20.5%
प्रमुख समूहदलित, कुर्मी, मुस्लिम, मौर्य-कुशवाहा, सिख, यादव, अन्य OBC

2026 के पुनरीक्षण में निघासन की मतदाता संख्या 3,53,604 से घटकर 3,26,572 रह गई। ड्राफ्ट सूची में 3,03,510 नाम थे। दावा-आपत्ति के दौरान 25,259 नाम जोड़े गए और 2,197 नाम हटाए गए। अंतिम सूची में विधानसभा के लिए 387 मतदेय स्थल दर्ज किए गए।

Nighasan Assembly Caste Equations में पुराने राजनीतिक आकलन दलित समाज को सबसे बड़ा समूह बताते हैं। उसके बाद मुस्लिम और मौर्य मतदाताओं को निर्णायक माना गया। एक दूसरे पुराने अनुमान में करीब 1.10 लाख दलित, 1.37 लाख पिछड़ा वर्ग और 48 हजार मुस्लिम मतदाता बताए गए थे। वहीं 2011 की जनगणना आधारित प्रोफाइल SC आबादी को करीब 20.5 प्रतिशत बताती है। इन अनुमानों में बड़ा अंतर खुद बताता है कि जाति-वार पुराने आंकड़ों को 2026 की आधिकारिक मतदाता संख्या नहीं माना जा सकता।

2022 के चुनावी सामाजिक आकलन में कुर्मी, कुशवाहा, मौर्य, यादव और सिख मतदाताओं को भी महत्वपूर्ण माना गया था। मौजूदा विधायक शशांक वर्मा कुर्मी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, जबकि 2022 में मुख्य विपक्षी उम्मीदवार आर.एस. कुशवाहा थे। इससे गैर-यादव OBC वोट की राजनीतिक अहमियत और स्पष्ट होती है।

निघासन विधानसभा का संकेतात्मक जातीय-सामाजिक समीकरण

जाति/समुदायसंकेतात्मक स्थिति2027 में महत्व
दलित/SCसबसे बड़े सामाजिक समूहों मेंBJP-SP-BSP तीनों के लिए निर्णायक
पिछड़ा वर्गपुराने अनुमान में बहुत बड़ा संयुक्त आधारचुनाव का केंद्रीय सामाजिक वर्ग
कुर्मीमजबूत OBC समूहमौजूदा भाजपा नेतृत्व की सामाजिक धुरी
मौर्यमहत्वपूर्ण गैर-यादव OBCBJP-SP के बीच स्विंग क्षमता
कुशवाहाप्रभावशाली OBCSP-BSP का भी पुराना आधार
मुस्लिमबड़ा स्वतंत्र सामाजिक समूहविपक्षी समीकरण में अहम
सिखतराई-किसान क्षेत्र में प्रभावकृषि और स्थानीय मुद्दों पर महत्वपूर्ण
यादवSP के लिए महत्वपूर्ण आधारव्यापक PDA गणित की कड़ी
ब्राह्मण/अन्य सवर्णबूथवार प्रभावकरीबी मुकाबले में महत्व
2026 कुल मतदाता3,26,572

जाति-वार वर्तमान मतदाता संख्या आधिकारिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए 2027 का वास्तविक गणित नई मतदाता सूची और बूथवार सामाजिक संरचना से ही बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।

दलित वोट निघासन की सबसे बड़ी चुनावी धुरी

निघासन के पुराने चुनावी विश्लेषण में दलित मतदाताओं को सबसे बड़ा सामाजिक समूह माना गया है। 2011 आधारित जनसांख्यिकीय प्रोफाइल भी अनुसूचित जाति आबादी को करीब 20.5 प्रतिशत बताती है। एक पुराने राजनीतिक अनुमान में दलित मतदाताओं की संख्या इससे कहीं ज्यादा बताई गई थी, इसलिए सटीक संख्या पर सावधानी जरूरी है।

दलित राजनीति का असर चुनावी इतिहास में भी दिखाई देता है। 2002 में बसपा के आर.एस. कुशवाहा ने निघासन सीट जीती थी। उन्हें 44,367 वोट मिले थे और उन्होंने सपा के कृष्ण गोपाल पटेल को 4,386 वोट से हराया था।

इसके बाद BSP सीट नहीं जीत सकी, लेकिन लंबे समय तक उसका प्रभाव बना रहा। 2017 में BSP को 40,674 वोट मिले थे। 2022 में यह वोट घटकर 15,392 रह गया।

यही गिरावट 2027 में BJP और SP दोनों के लिए अवसर बनाती है। दलित मतों का कितना हिस्सा भाजपा के गैर-जाटव सामाजिक गठजोड़, सपा की PDA रणनीति या BSP की वापसी के साथ जाता है, यह चुनावी परिणाम के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

कुर्मी वोट और शशांक वर्मा की राजनीतिक पकड़

निघासन में कुर्मी समाज चुनावी राजनीति की बड़ी OBC धुरियों में है। मौजूदा विधायक शशांक वर्मा कुर्मी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। उनके पिता पटेल रामकुमार वर्मा भी निघासन के विधायक रहे और 2017 में भाजपा के टिकट पर 1,07,487 वोट लेकर जीते थे।

रामकुमार वर्मा के निधन के बाद 2019 में उपचुनाव हुआ। भाजपा ने उनके पुत्र शशांक वर्मा को टिकट दिया। शशांक ने 1,20,269 वोट हासिल किए, जबकि सपा प्रत्याशी को 68,987 वोट मिले। जीत का अंतर 51,282 वोट रहा।

2022 में शशांक वर्मा का वोट और बढ़कर 1,26,488 पहुंच गया। यानी उपचुनाव से आम विधानसभा चुनाव तक उनका वोट करीब छह हजार और बढ़ा।

इसका अर्थ यह नहीं कि सभी कुर्मी मतदाता भाजपा के साथ हैं। लेकिन उम्मीदवार की सामाजिक पहचान, पारिवारिक राजनीतिक नेटवर्क और BJP संगठन तीनों मिलकर इस समाज को 2027 के केंद्र में रखते हैं।

मौर्य मतदाता पुराने चुनावी आकलन में निर्णायक

निघासन के पुराने जातीय विश्लेषण में मुस्लिमों के साथ मौर्य मतदाताओं को निर्णायक बताया गया था। 2022 से पहले के एक राजनीतिक आकलन में मौर्य समाज के एक बड़े हिस्से को भाजपा की ओर झुका हुआ माना गया था। इसे वर्तमान मतदान व्यवहार की गारंटी नहीं माना जा सकता, लेकिन यह गैर-यादव OBC राजनीति की पुरानी दिशा दिखाता है।

2022 के मुकाबले में सपा की कोशिश कुशवाहा-मौर्य, मुस्लिम, यादव, सिख और दूसरे पिछड़े समूहों को एक साथ जोड़ने की थी। उसी चुनाव में BJP के कुर्मी प्रत्याशी और SP के कुशवाहा प्रत्याशी के बीच मुख्य मुकाबला हुआ।

2027 में मौर्य वोट BJP और SP के बीच सबसे महत्वपूर्ण स्विंग समूहों में हो सकता है। भाजपा इसे अपने गैर-यादव OBC आधार में बनाए रखना चाहेगी, जबकि सपा PDA रणनीति से इसमें सेंध की कोशिश करेगी।

कुशवाहा समाज का निघासन में मजबूत राजनीतिक इतिहास

कुशवाहा समाज का चुनावी महत्व केवल 2022 तक सीमित नहीं है। 2002 में आर.एस. कुशवाहा बसपा के टिकट पर निघासन से विधायक चुने गए थे। दो दशक बाद 2022 में वही आर.एस. कुशवाहा समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में मुख्य मुकाबले में आए और 85,479 वोट हासिल किए।

यह राजनीतिक यात्रा बताती है कि निघासन में कुशवाहा वोट अलग-अलग दलों के साथ जा सकता है।

2022 में SP का 85 हजार से अधिक वोट तक पहुंचना यादव-मुस्लिम आधार से आगे गैर-यादव OBC समर्थन की मौजूदगी का संकेत देता है, हालांकि किसी उम्मीदवार को मिले सभी वोटों को उसकी जाति से जोड़ना उचित नहीं होगा।

मुस्लिम वोट BJP विरोधी समीकरण की बड़ी ताकत

पुराने चुनावी अनुमान में निघासन में करीब 48 हजार मुस्लिम मतदाता बताए गए थे। दूसरे स्थानीय राजनीतिक आकलनों में भी मुस्लिम समाज को दलित और मौर्य मतदाताओं के साथ निर्णायक माना गया है।

2012 में समाजवादी पार्टी ने आर.ए. उस्मानी को उम्मीदवार बनाया था और उन्हें 43,966 वोट मिले। उसी चुनाव में एक अन्य मुस्लिम प्रत्याशी को भी 9,138 वोट मिले थे। भाजपा के अजय कुमार मिश्रा 75,005 वोट लेकर चुनाव जीते।

2022 में BSP ने आर.ए. उस्मानी को उम्मीदवार बनाया, लेकिन उन्हें केवल 15,392 वोट मिले। मुख्य विपक्षी वोट बड़ी मात्रा में सपा उम्मीदवार आर.एस. कुशवाहा के पीछे केंद्रित दिखाई दिया।

2027 में मुस्लिम वोट की दिशा इसलिए महत्वपूर्ण होगी। यदि यह बड़े स्तर पर किसी एक विपक्षी उम्मीदवार के पीछे केंद्रित होता है तो सपा को फायदा हो सकता है। BSP मजबूत मुस्लिम या दलित-मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है तो समीकरण अलग हो सकता है।

सिख किसान वोट तराई की राजनीति में अलग महत्व रखता है

निघासन लखीमपुर खीरी की तराई पट्टी का हिस्सा है। यहां सिख किसान मतदाताओं की भी उल्लेखनीय राजनीतिक मौजूदगी मानी जाती है। 2022 के चुनावी आकलन में सिख मतदाताओं को मुस्लिम, मौर्य, यादव और दूसरे पिछड़े समुदायों के साथ चुनावी समीकरण का हिस्सा माना गया था।

सिख किसान वोट को केवल धार्मिक पहचान से नहीं देखा जा सकता। कृषि लागत, गन्ना मूल्य और भुगतान, फसल मूल्य, सड़क तथा किसान राजनीति जैसे मुद्दे इस वर्ग के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।

2024 के संसदीय चुनाव से पहले भी खीरी क्षेत्र में किसानों की आर्थिक चिंतियां चुनावी विमर्श का हिस्सा रही थीं।

निघासन वोटर लिस्ट 2026: कुल 3,26,572 मतदाता

2026 की अंतिम मतदाता सूची में निघासन विधानसभा के कुल मतदाता 3,26,572 हैं। SIR से पहले यह आंकड़ा 3,53,604 था। यानी 27,032 की नेट कमी दर्ज हुई।

निघासन विधानसभा वोटर लिस्ट 2026

चरणमतदाता
SIR से पहले3,53,604
आलेख्य सूची3,03,510
परिवर्धन+25,259
अपमार्जन-2,197
2026 अंतिम सूची3,26,572
नेट कमी27,032
कमी प्रतिशतकरीब 7.64%

ड्राफ्ट सूची के मुकाबले अंतिम प्रकाशन में लगभग 23 हजार की शुद्ध बढ़ोतरी हुई। इसलिए 2026 के पुनरीक्षण को केवल मतदाता घटने के रूप में देखना सही नहीं होगा; दावा-आपत्ति के दौरान बड़ी संख्या में पात्र मतदाता वापस जुड़े भी।

2012 से 2026 तक कैसे बदला निघासन का मतदाता आधार?

निघासन में 2012 विधानसभा चुनाव के समय 3,20,502 मतदाता थे। 2017 में यह संख्या बढ़कर 3,27,486 हुई। 2019 लोकसभा चुनाव के समय कुल मतदाता करीब 3,35,987 थे। 2022 विधानसभा चुनाव में मतदाता संख्या 3,40,374 तक पहुंची और 2024 लोकसभा चुनाव में 3,52,671 निर्वाचक दर्ज हुए। 2026 की अंतिम सूची में संख्या घटकर 3,26,572 रह गई।

निघासन विधानसभा में मतदाताओं का ट्रेंड

वर्षकुल मतदाता
20123,20,502
20173,27,486
2019 लोकसभा3,35,987
2022 विधानसभा3,40,374
2024 लोकसभा3,52,671
SIR पूर्व3,53,604
2026 अंतिम सूची3,26,572

2024 की तुलना में 2026 का वोटर आधार करीब 26 हजार छोटा है। इससे 2022 और 2024 के पुराने बूथ गणित को 2027 में नई मतदाता सूची से फिर मिलाना जरूरी हो गया है।

2022 में BJP ने 41,009 वोट से दर्ज की बड़ी जीत

2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा के शशांक वर्मा को 1,26,488 वोट, यानी करीब 53.41 प्रतिशत वोट शेयर मिला। समाजवादी पार्टी के आर.एस. कुशवाहा को 85,479 वोट, जबकि BSP के आर.ए. उस्मानी को 15,392 वोट मिले। BJP ने 41,009 वोट से जीत दर्ज की।

निघासन विधानसभा चुनाव 2022

प्रत्याशीपार्टीवोटवोट शेयर
शशांक वर्माBJP1,26,48853.41%
आर.एस. कुशवाहाSP85,47936.10%
आर.ए. उस्मानीBSP15,3926.50%
अटल कुमार शुक्लाकांग्रेस2,7621.17%
कमरुल हुदाअन्य2,7071.14%
NOTA2,1910.93%
BJP की जीत41,009 वोट

कुल 3,40,374 मतदाताओं में 2,36,815 ने मतदान किया और मतदान प्रतिशत 69.57 प्रतिशत रहा। BJP और SP को मिलाकर करीब 89.5 प्रतिशत वोट मिले, जिससे मुकाबला काफी हद तक दो प्रमुख दलों में केंद्रित हो गया था।

2019 उपचुनाव में शशांक वर्मा की 51,282 वोट की जीत

2017 में भाजपा के पटेल रामकुमार वर्मा विधायक चुने गए थे। सितंबर 2018 में उनके निधन के बाद सीट खाली हुई। 2019 के उपचुनाव में भाजपा ने उनके पुत्र शशांक वर्मा को मैदान में उतारा।

शशांक वर्मा को 1,20,269 वोट, जबकि सपा प्रत्याशी मोहम्मद कय्यूम को 68,987 वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर 51,282 वोट रहा। कांग्रेस को 18,402 वोट मिले।

निघासन उपचुनाव 2019

प्रत्याशीपार्टीवोट
शशांक वर्माBJP1,20,269
मोहम्मद कय्यूमSP68,987
अटल कुमार शुक्लाकांग्रेस18,402
परमजीत सिंहनिर्दलीय8,053
BJP की जीत51,282 वोट

2019 की जीत ने शशांक वर्मा को पिता की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी बनाया और 2022 में उन्होंने सामान्य विधानसभा चुनाव भी बड़े अंतर से जीत लिया।

2017 में BJP ने 46,123 वोट से जीती सीट

2017 में भाजपा के पटेल रामकुमार वर्मा को 1,07,487 वोट, सपा के कृष्ण गोपाल पटेल को 61,364 और BSP के गिरजाशंकर सिंह को 40,674 वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर 46,123 वोट था।

निघासन विधानसभा चुनाव 2017

प्रत्याशीपार्टीवोटवोट शेयर
पटेल रामकुमार वर्माBJP1,07,48748.97%
कृष्ण गोपाल पटेलSP61,36427.96%
गिरजाशंकर सिंहBSP40,67418.53%
NOTA2,6631.21%
BJP की जीत46,123 वोट

2017 में BJP का वोट 2012 के 75 हजार से बढ़कर एक लाख के पार पहुंचा और बसपा का 40 हजार से अधिक वोट होने के कारण विपक्ष का बड़ा हिस्सा अलग-अलग खेमों में बंटा रहा।

2014 उपचुनाव में SP ने BJP को 45,976 वोट से हराया था

निघासन की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सबक 2014 का उपचुनाव भी देता है। 2012 में BJP से विधायक बने अजय कुमार मिश्रा के लोकसभा पहुंचने के बाद सीट खाली हुई। सितंबर 2014 के उपचुनाव में सपा के कृष्ण गोपाल पटेल ने भाजपा को 45,976 वोट से हराकर सीट अपने नाम कर ली।

यह नतीजा बताता है कि बड़े विधानसभा मार्जिन के बावजूद निघासन में राजनीतिक परिस्थितियां बदलने पर मतदाता तेजी से दिशा बदल सकते हैं।

2012 BJP, 2014 उपचुनाव SP, 2017 BJP और 2019 उपचुनाव फिर BJP—यह क्रम सीट के राजनीतिक लचीलेपन की बड़ी मिसाल है।

2012 में BJP ने 31,039 वोट से जीती सीट

2012 विधानसभा चुनाव में भाजपा के अजय कुमार को 75,005 वोट मिले। समाजवादी पार्टी के आर.ए. उस्मानी को 43,966 और BSP के दरोगा सिंह को 35,798 वोट मिले। भाजपा ने 31,039 वोट से सीट जीती।

निघासन विधानसभा चुनाव 2012

प्रत्याशीपार्टीवोटवोट शेयर
अजय कुमारBJP75,00536.39%
आर.ए. उस्मानीSP43,96621.33%
दरोगा सिंहBSP35,79817.37%
अजय प्रकाशकांग्रेस16,4838.00%
कमाल अहमदअन्य9,1384.43%
BJP की जीत31,039 वोट

BJP सिर्फ 36.39 प्रतिशत वोट लेकर जीत गई थी, क्योंकि विपक्ष SP, BSP, कांग्रेस और दूसरे उम्मीदवारों के बीच काफी बंटा हुआ था।

2007 में SP की सिर्फ 2,800 वोट की जीत

2007 विधानसभा चुनाव में सपा के कृष्ण गोपाल पटेल को 52,867 वोट, भाजपा के अजय कुमार टेनी को 50,067 वोट और BSP के आर.एस. कुशवाहा को 42,557 वोट मिले। सपा केवल 2,800 वोट से जीत सकी।

निघासन विधानसभा चुनाव 2007

प्रत्याशीपार्टीवोट
कृष्ण गोपाल पटेलSP52,867
अजय कुमार टेनीBJP50,067
आर.एस. कुशवाहाBSP42,557
निर्वेंद्र कुमारRLD10,474
SP की जीत2,800 वोट

2007 का चुनाव 2008 के परिसीमन से पहले की विधानसभा सीमा पर हुआ था। इसलिए इसका गांववार और सामाजिक भूगोल 2012 के बाद वाली वर्तमान सीट से पूरी तरह समान नहीं माना जाना चाहिए।

निघासन विधानसभा चुनाव 2007-2022 का तुलनात्मक इतिहास

चुनावविजेतापार्टीवोटउपविजेताजीत का अंतर
2007*कृष्ण गोपाल पटेलSP52,867अजय कुमार, BJP2,800
2012अजय कुमारBJP75,005आर.ए. उस्मानी, SP31,039
2014 उपचुनावकृष्ण गोपाल पटेलSPBJP45,976
2017पटेल रामकुमार वर्माBJP1,07,487कृष्ण गोपाल पटेल, SP46,123
2019 उपचुनावशशांक वर्माBJP1,20,269मोहम्मद कय्यूम, SP51,282
2022शशांक वर्माBJP1,26,488आर.एस. कुशवाहा, SP41,009

*2007 का चुनाव परिसीमन से पहले की सीमा पर हुआ था।

हालिया इतिहास में BJP सबसे मजबूत दल दिखाई देती है। लेकिन 2007 और 2014 में SP की जीत तथा 2002 में BSP की सफलता बताती है कि निघासन का मतदाता अलग राजनीतिक परिस्थितियों में सत्ता बदल चुका है।

2024 लोकसभा चुनाव में BJP आगे, लेकिन मार्जिन घटकर 17,306 वोट

2024 लोकसभा चुनाव में पूरे खीरी संसदीय क्षेत्र में समाजवादी पार्टी विजयी हुई, लेकिन निघासन विधानसभा खंड में भाजपा आगे रही। भाजपा प्रत्याशी को यहां 1,16,230 वोट, जबकि सपा को 98,924 वोट मिले। BJP की बढ़त 17,306 वोट रही।

निघासन विधानसभा खंड: लोकसभा चुनाव 2024

पार्टीवोटवोट शेयर
BJP1,16,23048.12%
SP98,92440.95%
BJP की बढ़त17,306करीब 7.17 अंक

2022 विधानसभा में BJP का अंतर 41,009 था। 2024 लोकसभा चुनाव में यह बढ़त घटकर 17,306 रह गई। दोनों चुनावों के उम्मीदवार और मुद्दे अलग थे, इसलिए इसे सीधा विधानसभा स्विंग नहीं माना जा सकता। फिर भी 2027 के लिए यह SP के लिए अवसर और BJP के लिए सतर्कता का संकेत है।

2019 से 2024 में BJP की लोकसभा बढ़त 59 हजार से घटकर 17 हजार

2019 लोकसभा चुनाव में निघासन विधानसभा खंड से BJP को 1,28,195 वोट, जबकि SP को 68,674 वोट मिले थे। BJP की बढ़त 59,521 वोट थी।

2024 में BJP को 1,16,230 और SP को 98,924 वोट मिले। भाजपा आगे तो रही, लेकिन बढ़त सिर्फ 17,306 रह गई।

निघासन में लोकसभा चुनाव का बदलता अंतर

चुनावBJPSPBJP बढ़त
2019 लोकसभा1,28,19568,67459,521
2024 लोकसभा1,16,23098,92417,306

दो लोकसभा चुनावों के बीच भाजपा की विधानसभा-खंड बढ़त करीब 42 हजार वोट कम हुई। यह 2027 से पहले निघासन के चुनावी ट्रेंड में सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में है।

खीरी लोकसभा SP ने जीती, निघासन फिर भी BJP के साथ रहा

2024 में खीरी लोकसभा क्षेत्र से सपा को 5,57,365 वोट, जबकि BJP को 5,23,036 वोट मिले। सपा ने संसदीय सीट 34,329 वोट से जीती। इसके बावजूद पांच विधानसभा खंडों में निघासन और पलिया में BJP ने बढ़त बनाए रखी।

इससे निघासन का अलग चुनावी चरित्र सामने आता है।

जहां पूरे संसदीय क्षेत्र में सत्ता विरोधी या विपक्षी लहर BJP को पीछे ले गई, वहीं निघासन ने उसे 17 हजार से ज्यादा की बढ़त दी।

यही 2027 में भाजपा के लिए सबसे सकारात्मक चुनावी संकेत है।

2026 की नई वोटर लिस्ट ने पुराने बूथ गणित को बदला

निघासन में तीन आंकड़ों को एक साथ देखना जरूरी है—

चुनावी डेटासंख्या
2022 BJP जीत41,009
2024 BJP लोकसभा बढ़त17,306
2026 SIR नेट कमी27,032

मतदाता सूची का बदलाव 2024 की BJP बढ़त से बड़ा है, हालांकि 2022 विधानसभा जीत के अंतर से छोटा है।

इसका मतलब यह नहीं है कि 27 हजार BJP या SP मतदाता कम हुए हैं। मतदाता सूची से हटे या जुड़े नामों की जाति और राजनीतिक पसंद का आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है।

इस बदलाव का वास्तविक असर बूथ मैनेजमेंट पर पड़ेगा। 2022 और 2024 के बूथों पर बने पुराने पार्टी मार्जिन को 2026 की 3,26,572 मतदाताओं वाली सूची के हिसाब से फिर से समझना होगा।

किसान और गन्ना राजनीति निघासन की बड़ी साझा धुरी

निघासन की लगभग 90 प्रतिशत ग्रामीण संरचना के कारण जाति के साथ खेती-किसानी चुनाव का बड़ा फैक्टर है। पुराने स्थानीय चुनावी विमर्श में महंगाई, गन्ना मूल्य और भुगतान तथा विकास महत्वपूर्ण मुद्दों में रहे हैं।

तराई क्षेत्र में किसान की समस्या जातीय सीमा नहीं देखती। कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, सिख, दलित और मुस्लिम किसान परिवार एक ही कृषि बाजार, खाद-बीज, बिजली, सिंचाई और फसल मूल्य के सवालों से प्रभावित हो सकते हैं।

इसीलिए 2027 में किसान मुद्दे पर बड़ा बदलाव पारंपरिक जातीय मतदान में भी सेंध लगा सकता है।

सीमा, तराई और ग्रामीण कनेक्टिविटी भी अहम

निघासन की भौगोलिक स्थिति इसे लखीमपुर खीरी की सामान्य मैदानी सीटों से अलग करती है। विधानसभा में निघासन तहसील के साथ धौरहरा तहसील के कुछ हिस्से शामिल हैं और क्षेत्र का बड़ा भाग तराई तथा ग्रामीण इलाकों में फैला है।

इस वजह से सड़क, पुल, गांव से कस्बे तक कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य, शिक्षा, बाढ़-जलभराव और ग्रामीण रोजगार जैसे सवाल स्थानीय चुनाव में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

2027 में जातीय समीकरण तभी निर्णायक बनेगा जब वह स्थानीय विकास के अनुभव के साथ मेल खाएगा।

महिला मतदाता भी जातीय गणित से अलग निर्णायक वर्ग

2026 के अंतिम विधानसभा-वार आंकड़ों में निघासन के कुल मतदाता 3.26 लाख से अधिक हैं। हालांकि उपलब्ध अंतिम सीटवार सारांश में महिला-पुरुष विभाजन अलग से प्रकाशित नहीं है, लेकिन जिले की अंतिम सूची में महिला मतदाताओं की संख्या 11.59 लाख से अधिक है।

ग्रामीण महिला मतदाताओं के लिए राशन, आवास, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, सुरक्षा, बच्चों की शिक्षा और घरेलू आय जैसे विषय जातीय पहचान के समानांतर प्रभाव डाल सकते हैं।

2027 में BJP अपने लाभार्थी और महिला मतदाता आधार को मजबूत रखने की कोशिश करेगी, जबकि SP घरेलू अर्थव्यवस्था और ग्रामीण मुद्दों के जरिए इसमें सेंध लगाने का प्रयास कर सकती है।

BJP का 2027 का संभावित सामाजिक फॉर्मूला

निघासन में भाजपा का संभावित सामाजिक फॉर्मूला इस तरह देखा जा सकता है—

कुर्मी + मौर्य व दूसरे गैर-यादव OBC + दलित का हिस्सा + सवर्ण + सिख किसान का हिस्सा + महिला लाभार्थी वोट + मुस्लिम-Yadav में सीमित सेंध

पार्टी की सबसे बड़ी ताकत हालिया चुनावी निरंतरता है।

2017 विधानसभा में BJP +46,123।

2019 उपचुनाव में +51,282।

2022 विधानसभा में +41,009।

2024 लोकसभा खंड में +17,306।

चारों हालिया परीक्षणों में BJP आगे रही है।

लेकिन 2019 के 59 हजार से अधिक लोकसभा खंड मार्जिन का 2024 में सिर्फ 17 हजार रह जाना यह भी दिखाता है कि पुराने सामाजिक गठजोड़ को स्वतः स्थायी नहीं माना जा सकता।

SP के लिए दलित-मुस्लिम के साथ मौर्य-कुशवाहा वोट जरूरी

समाजवादी पार्टी के लिए संभावित 2027 सामाजिक फॉर्मूला हो सकता है—

मुस्लिम + यादव + कुशवाहा-मौर्य + दलित मतों में सेंध + सिख किसान + कुर्मी वोट का हिस्सा

SP का सबसे मजबूत ताजा संकेत 2024 लोकसभा चुनाव है। 2019 में निघासन में उसे 68,674 वोट मिले थे, जो 2024 में बढ़कर 98,924 हो गए।

2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी के आर.एस. कुशवाहा को 85,479 वोट मिले थे। यानी SP के पास 80-100 हजार के बीच का हालिया प्रतिस्पर्धी वोट आधार मौजूद है।

लेकिन BJP को हराने के लिए उसे 2022 के मुकाबले लगभग 40 हजार वोट की कमी को भरना होगा। इसके लिए केवल मुस्लिम-Yadav राजनीति पर्याप्त नहीं होगी। दलित और गैर-यादव OBC मतों में बड़ा विस्तार जरूरी होगा।

BSP की वापसी से सबसे ज्यादा बदलेगा दलित-मुस्लिम गणित

निघासन में BSP का इतिहास मजबूत है। पार्टी 2002 में सीट जीत चुकी है। 2007 में भी उसे 42,557 वोट और 2017 में 40,674 वोट मिले थे।

लेकिन 2022 में BSP सिर्फ 15,392 वोट पर रह गई।

निघासन में BSP का प्रदर्शन

चुनावBSP वोट
200244,367
200742,557
201235,798
201740,674
202215,392

BSP यदि 2027 में अपने पुराने 35-45 हजार वाले स्तर की ओर लौटती है तो चुनावी गणित काफी बदल सकता है।

दलित उम्मीदवार BJP और SP दोनों के SC समर्थन को प्रभावित कर सकता है।

मुस्लिम प्रत्याशी SP के सामाजिक समीकरण को चुनौती दे सकता है।

कुशवाहा-मौर्य उम्मीदवार गैर-यादव OBC वोट में अलग बंटवारा पैदा कर सकता है।

इसलिए BSP के टिकट की सामाजिक पृष्ठभूमि निघासन में खास महत्व रखेगी।

2027 में किन सामाजिक समूहों पर सबसे ज्यादा नजर?

पहला और सबसे बड़ा सवाल दलित मतदाताओं का रहेगा। पुराने राजनीतिक आकलनों में यही सबसे बड़ा सामाजिक समूह माना गया है और BSP की पुरानी चुनावी ताकत इसकी पुष्टि करती है।

दूसरा, कुर्मी वोट। मौजूदा विधायक और उनके परिवार की लंबे समय की राजनीतिक मौजूदगी इस समूह को BJP की रणनीति में महत्वपूर्ण बनाती है।

तीसरा, मौर्य-कुशवाहा मतदाता। पुराने जातीय विश्लेषण उन्हें निर्णायक बताते हैं और 2022 में SP का उम्मीदवार भी इसी व्यापक सामाजिक आधार से आया था।

चौथा, मुस्लिम मतदाता। विपक्ष के लिए यह बड़ा सामाजिक आधार है, लेकिन BSP की रणनीति इसकी एकजुटता प्रभावित कर सकती है।

पांचवां, यादव मतदाता। SP के लिए आधार है, लेकिन सीट जीतने के लिए दूसरे OBC और दलित समर्थन जोड़ना जरूरी है।

छठा, सिख किसान मतदाता। तराई क्षेत्र की कृषि राजनीति में उनकी स्थानीय भूमिका महत्वपूर्ण है।

सातवां, नई मतदाता सूची। 27 हजार की नेट कमी के बाद हर दल को 2022 के जातिगत बूथ गणित का पुनर्मूल्यांकन करना होगा।

निघासन विधानसभा चुनाव 2027 का जातीय गणित क्या संकेत देता है?

निघासन के हालिया चुनावी इतिहास, 2024 लोकसभा नतीजे और 2026 की वोटर लिस्ट को एक साथ रखें तो तस्वीर इस तरह बनती है—

चुनावी संकेतस्थिति
2007 विधानसभा*SP +2,800
2012 विधानसभाBJP +31,039
2014 उपचुनावSP +45,976
2017 विधानसभाBJP +46,123
2019 उपचुनावBJP +51,282
2022 विधानसभाBJP +41,009
2019 लोकसभा खंडBJP +59,521
2024 लोकसभा खंडBJP +17,306
2012 मतदाता3,20,502
2022 मतदाता3,40,374
2024 मतदाता3,52,671
2026 मतदाता3,26,572
SIR नेट कमी27,032

*2007 का चुनाव 2008 परिसीमन से पहले की सीमा पर हुआ था।

हालिया विधानसभा चुनावों के आधार पर BJP निघासन में मजबूत स्थिति में है। 2017, 2019 उपचुनाव और 2022—तीनों में पार्टी बड़े अंतर से जीती। 2024 लोकसभा चुनाव में भी पूरे खीरी संसदीय क्षेत्र में BJP हार गई, लेकिन निघासन खंड से पार्टी 17,306 वोट आगे रही।

फिर भी Nighasan Assembly Caste Equations में 2027 को पूरी तरह एकतरफा चुनाव मानना उचित नहीं होगा।

2014 के उपचुनाव में सपा भाजपा को लगभग 46 हजार वोट से हरा चुकी है।

2019 से 2024 के बीच BJP की लोकसभा-खंड बढ़त 59,521 से घटकर 17,306 रह गई।

2026 में वोटर आधार 3.53 लाख से घटकर 3.26 लाख रह गया।

भाजपा के लिए सबसे मजबूत रास्ता कुर्मी, मौर्य और दूसरे गैर-यादव OBC, दलित मतों के एक हिस्से, सवर्ण, सिख किसान और महिला लाभार्थी वोट का व्यापक गठजोड़ बनाए रखने का है।

सपा के लिए मुस्लिम-Yadav आधार के साथ कुशवाहा-मौर्य, दलित और दूसरे पिछड़े समुदायों में बड़ा विस्तार जरूरी होगा। 2024 में उसका वोट लगभग 99 हजार तक पहुंचना उसे चुनौती देने की स्थिति में रखता है, लेकिन BJP की 17 हजार से ज्यादा खंडीय बढ़त अभी भी महत्वपूर्ण है।

BSP की भूमिका भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। पार्टी निघासन की पूर्व विजेता है और 2017 तक 40 हजार के आसपास वोट हासिल करती रही है। यदि वह 2027 में पुराने स्तर की ओर लौटती है तो दलित, मुस्लिम और OBC वोट के बंटवारे से मुख्य BJP-SP मुकाबला बदल सकता है।

जातीय समीकरण के समानांतर गन्ना मूल्य और भुगतान, किसान आय, खाद-बीज, सड़क और ग्रामीण कनेक्टिविटी, बाढ़-जलभराव, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय रोजगार जैसे मुद्दे भी 2027 में मतदान को प्रभावित कर सकते हैं। करीब 90 प्रतिशत ग्रामीण सामाजिक संरचना के कारण कृषि और गांव की बुनियादी सुविधाओं का सवाल किसी एक जाति तक सीमित नहीं रहेगा।

यानी निघासन विधानसभा चुनाव 2027 को केवल दलित-मुस्लिम या कुर्मी-मौर्य के जातीय जोड़ अथवा BJP बनाम SP की सीधी लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली फैसला दलित मतों का बंटवारा, कुर्मी वोट की दिशा, मौर्य-कुशवाहा समर्थन, मुस्लिम मतों की एकजुटता, सिख और किसान वोट, BSP उम्मीदवार की सामाजिक पृष्ठभूमि, मौजूदा विधायक की व्यक्तिगत पकड़ और 2026 की नई मतदाता सूची के बूथवार बदलाव मिलकर करेंगे।

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