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अगर आप बड़वानी बस स्टैंड से सफर करने की सोच रहे हैं, तो जरा संभलकर! यहां आपको बस तो मिल जाएगी, लेकिन बैठने के लिए कुर्सी, पीने के लिए साफ पानी और सिर छिपाने के लिए छाया ढूंढनी पड़ेगी। कहने को तो नगर पालिका परिषद ने साल 2008-09 में ही बस स्टैंड की कमान बड़वानी प्राइवेट बस ऑपरेटर एसोसिएशन को सौंप दी थी, लेकिन 18 साल बीत जाने के बाद भी सुविधाएं शून्य हैं। आलम यह है कि हर दिन जेब ढीली करने के बावजूद यात्री और बस चालक परेशान हो रहे हैं।
प्रदेश के कई शहरों में रक्षाबंधन जैसे पर्वों पर बहनों और आम यात्रियों को सिटी व बसों में फ्री सफर का तोहफा दिया जा रहा है। वहीं, बड़वानी बस ऑपरेटर एसोसिएशन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। एसोसिएशन आम यात्रियों को राहत देना तो दूर, दिन-रात बसों का संचालन करने वाले अपने ही चालकों और परिचालकों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दे पा रहा है। प्रति बस वसूली तो लगातार बढ़ रही है, लेकिन यात्रियों और स्टाफ दोनों को उपेक्षा और अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है।
किराया बढ़ा, वसूली 20 रु. हुई, पर सुविधाएं गायब बस स्टैंड पर हर दिन लगभग 250 से 300 बसों की आवाजाही होती है। एसोसिएशन ने एक महीने पहले ही प्रति बस लिया जाने वाला शुल्क 15 से बढ़ाकर 20 रुपए कर दिया है। करीब 6,000 रुपए रोजाना बस मालिकों से वसूले जा रहे हैं। नपा अध्यक्ष अश्विनी निक्कू चौहान का कहना है कि नपा सिर्फ निर्माण एजेंसी है और हैंडओवर 2008-2009 के आसपास ही हो गया था। हालांकि, विडंबना देखिए कि सफाई का काम आज भी नगर पालिका को ही करना पड़ रहा है।
दुकानों के सामने ओपन गैरेज, व्यापारी भी परेशान बस स्टैंड के मुख्य गेट और दुकानों के सामने पिछले छह-सात महीनों से गैर-कानूनी तरीके से बसें खड़ी कर मरम्मत का काम (खोल-खाल) किया जाता है। इससे आसपास के होटल और दुकानदारों का धंधा चौपट हो रहा है। एसोसिएशन सचिव का दावा है कि पुलिस बल की व्यस्तता के कारण कार्रवाई में देरी हुई है, लेकिन एक हफ्ते के भीतर इस अतिक्रमण को हटाकर व्यवस्था सुधार दी जाएगी।
एसोसिएशन का बहाना : आधे ही देते हैं पैसे, कुर्सियां शायद टूट गईं सुविधाओं की बदहाली पर जब एसोसिएशन सचिव संजय पुरोहित से बात की गई, तो उन्होंने अपनी लाचारी जताई। पुरोहित का कहना है कि रोज आने वाली लगभग 300 बसों में से आधे ऑपरेटर पैसे देने से साफ मना कर देते हैं। विवाद से बचने के लिए हम ज्यादा दबाव नहीं डालते। पंखे और लाइटें लगे हैं। रक्षाबंधन त्योहार की वजह से सफाई कर्मचारी छुट्टी पर थे और कुर्सियां पुरानी होकर टूट गई होगी, जिन्हें जल्द सुधारा जाएगा।
ड्राइवरों का दर्द : न आराम करने की जगह, न हमारे लिए अलग से शौचालय दिन-रात स्टेयरिंग थामकर सैकड़ों यात्रियों को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाने वाले ड्राइवर और कंडक्टर खुद उपेक्षा के शिकार हैं। चालक परिचालक सामाजिक कल्याण संघ ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए बताया कि दिनभर ट्रैफिक, सवारियों और एजेंटों का दबाव झेलने के बाद चालकों के लिए थकान मिटाने के लिए कोई विश्राम गृह तक नहीं है।
दिन-रात ड्यूटी करने वाले इन कर्मचारियों के लिए न तो अलग शौचालय की सुविधा है और न ही चाय-नाश्ते के लिए कोई रियायती कैंटीन। चालकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगर वे आवाज उठाते हैं तो बस मालिक उन्हें काम से निकाल देंगे, जिससे उनकी रोजी-रोटी पर संकट आ जाएगा।