संयुक्त राष्ट्र की एक पहल के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से जम्मू-कश्मीर को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शुक्रवार को संरा महासभा ने दुनिया के मौजूदा नक़्शे को बदलने के लिए वोटिंग की है, दावा है कि यह नक्शा अफ्रीका के आकार को ज़्यादा सटीक रूप से दिखाता है। इस प्रस्ताव के समर्थन में 164 देशों ने वोट किया, जिसमें भारत भी शामिल है। छह देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया, वहीं अमेरिका एकमात्र देश था, जिसने इस प्रस्ताव का विरोध किया। दरअसल माना जाता है कि वैश्विक मानचित्र में किसी देश का आकार और उसकी भौगोलिक स्थिति से राजनैतिक रसूख भी प्रभावित होता है। इसलिए अफ्रीका चाहता था कि नक्शे में सुधार हो, क्योंकि उसे उसके वास्तविक आकार से काफी छोटा दिखाया जाता था। इसलिए जब वोट देने की बारी आई तो भारत ने भी इसमें साथ दिया। मगर इस नए नक़्शे में जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों को पाकिस्तान और चीन के हिस्से के तौर पर दिखाया गया है। इसी पर भारत ने अपनी आपत्ति जारी की है।
रविवार को भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि संरा की ओर से प्रस्तावित विश्व मानचित्र में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र-शासित प्रदेशों को भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए और कोई भी 'ग़लत' या 'गुमराह करने वाला' चित्रण स्वीकार्य नहीं होगा। बयान के अनुसार, 'संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर को समान क्षेत्रफल वाले विश्व मानचित्र से संबंधित एक प्रस्ताव पारित किया। इसका उद्देश्य ऐसे मानचित्र के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जिसमें महाद्वीपों के भू-भाग के वास्तविक आकार को बनाए रखा जाता है। इस प्रस्ताव में किसी ख़ास विश्व मानचित्र को अपनाया या प्रमाणित नहीं किया गया है। न ही इसमें राजनीतिक मानचित्र से जुड़े मुद्दों, जैसे अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, विवादित क्षेत्रों या जगहों के नामों पर कोई बात कही गई है।' बयान में कहा गया है कि भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया और अपने वोट की वजह बताते हुए समान क्षेत्रफल वाले मानचित्रों के इस्तेमाल के मूल सिद्धांत पर ज़ोर दिया। हालांकि बयान में कहा गया है, 'हमने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह प्रस्ताव किसी ख़ास नक्शे, प्रोजेक्शन या राष्ट्रीय सीमाओं के चित्रण का समर्थन नहीं करता है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों समेत भारत के संप्रभु क्षेत्र को भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए। ग़लत या भ्रामक तरी$के से किया गया कोई भी चित्रण स्वीकार्य नहीं है। भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर हमारा रुख़ स्पष्ट है और इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता है।'
भारत ने तो साफ कर दिया कि इस नक्शे को राजनैतिक मानचित्र की तरह नहीं देखा जा सकता और न ही ऐसी कोई कोशिश स्वीकार्य होगी। लेकिन पाकिस्तान ने इस मौके पर अपनी संकीर्ण स्वार्थी प्रवृत्ति का परिचय दिया। पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर ख़ान ने कहा, 'पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर की स्थिति को लेकर भारत के बेबुनियाद दावों को पूरी तरह ख़ारिज करता है। भारत के दावे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त तथ्यों के उलट हैं। भारत की एकतरफा कार्रवाई और लगातार जारी अवैध कब्जा जम्मू-कश्मीर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विवादित स्थिति को नहीं बदल सकता।'
पाकिस्तान शायद यह बात समझ नहीं रहा है कि संरा के इस प्रस्ताव में देशों के राजनैतिक विवाद को सुलझाने या उलझाने का मकसद नहीं था। यह महज एक ऐतिहासिक और परंपरागत रूप से चले आ रहे नक़्शे को इस तरह से सुधारना था जिसमें किसी देश के आकार को गलत न दिखाया जाए। इस प्रयास में किसी भी किस्म की राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन पाकिस्तान के हुक्मरान आदत से मजबूर हैं।
गौरतलब है कि संरा में इस प्रस्ताव पर वोटिंग बाध्यकारी नहीं थी, लेकिन फिर भी अधिकतर देशों ने इसमें हिस्सा लिया। अब दुनिया भर की संस्थाओं की ओर से इस्तेमाल होने वाले दुनिया के नक़्शे में बदलाव देखने को मिलेंगे। दरअसल इस समय जो नक़्शा दुनिया में इस्तेमाल किया जाता है, वो 16वीं सदी का बना हुआ मर्केटर मानचित्र है, इसमें अफ्रीका का आकार ग्रीनलैंड के बराबर दिखाता है जबकि वास्तव में यह उससे 14 गुना ज़्यादा बड़ा है। मर्केटर मानचित्र को 1569 में बेल्जियम के कार्टोग्राफ़र गेरार्डस मर्केटर ने डिज़ाइन किया था। समतल नक़्शे पर कोणों को सही रखने के लिए मर्केटर को भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए ग्रिड की रेखाओं के बीच की दूरी बढ़ानी पड़ी। भूमध्य रेखा, ज़ीरो डिग्री अक्षांश पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है। यह पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में बांटती है। मर्केटर के बनाए नक़्शे में पृथ्वी की गोलाई को इस तरह दिखाया गया है कि भूमध्य रेखा के पास के देश अपने असली आकार से काफ़ी छोटे दिखाई देते हैं। वहीं, ध्रुवों के पास के देश खिंचे हुए और बड़े दिखाई देते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि गोलाकार पृथ्वी की सतह को दो आयाम वाले समतल नक़्शे पर पूरी तरह सही दिखाना संभव नहीं है।
इस गड़बड़ी को दूर करने की कोशिश में, नक़्शा विशेषज्ञों की एक टीम ने 2018 में एक समान क्षेत्रफल वाला मानचित्र बनाया, जिसे उन्होंने इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन नाम दिया। फ़रवरी में, अफ्रीकन यूनियन के 54 सदस्य देशों ने इसे अपनाया और कहा कि यह 'सभी महाद्वीपों, विशेष रूप से अफ्रीका के आकार को ज़्यादा सटीक दिखाता है।' ऑनलाइन कैंपेन ग्रुप हैशटैग करेक्ट द मैप ने कहा, 'आप अफ्रीका के अंदर अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मैक्सिको और यूरोप के बड़े हिस्से को समेट सकते हैं और फिर भी कुछ ज़मीन बच जाएगी।'
मर्केटर नक्शे के आलोचकों का कहना है कि इसमें कुछ जगहों को उनके असली आकार से छोटा और कुछ को बड़ा दिखाया जाता है। इसका लोगों की सोच पर असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि हम अक्सर बड़ी चीज़ों को ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। इसलिए इस तरह का नक़्शा लोगों की सोच को प्रभावित कर सकता है। बहरहाल, नए नक़्शे को समर्थन मिलने के बाद अफ्रीका को क्या नाइंसाफी दूर होने का अहसास होगा, यह देखना होगा। इस बात का भी इंतजार रहेगा कि संरा में भारत के साथ हुई गलती को सुधारा जाता है या नहीं। क्योंकि नक़्शे बदलने से सोच और नीयत नहीं बदलती, यह बात पाकिस्तान की प्रतिक्रिया से जाहिर हो ही गई है।