तुकाराम मुंडे ने बताया- दवा की असली कीमत से कितनी ज्यादा महंगी दवा खरीदते हैं आप?

Published on 16 सित॰ 2026

तुकाराम मुंडे ने बताया- दवा की असली कीमत से कितनी ज्यादा महंगी दवा खरीदते हैं आप?

FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे

अस्पताल में इलाज कराने के दौरान मरीज के हाथ में जो बिल आता है, उसमें कई ऐसी चीजें शामिल होती हैं, जिनकी असली खरीद कीमत शायद ही मरीज को पता होती है. अब महाराष्ट्र के IAS अधिकारी तुकाराम मुंडे ने एक पोस्ट के जरिए मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमत और उनकी ट्रेड प्राइस के बीच के अंतर पर सवाल उठाया है. उन्होंने महाराष्ट्र के एक सर्वे का हवाला देते हुए बताया कि 11.50 रुपये के IV इन्फ्यूजन सेट की MRP 325 रुपये थी.

अस्पताल का बिल देखते वक्त क्या आपने कभी सोचा है कि जिस मेडिकल सामान के लिए आप भुगतान कर रहे हैं… अस्पताल ने उसे कितने में खरीदा होगा? महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन के कमिश्नर IAS अधिकारी तुकाराम मुंडे ने इसी सवाल को उठाया है. उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में महाराष्ट्र के अस्पतालों में मेडिकल कंज्यूमेबल्स के एक सर्वे का हवाला दिया. इसके मुताबिक, 11.5 रुपये के ट्रेड प्राइस वाला एक IV इन्फ्यूजन सेट करीब 29 गुना महंगा बिल होता है.

सिरिंज और कैथेटर का भी यही हाल?

सिर्फ IV सेट ही नहीं. तुकाराम मुंडे के पोस्ट में दो और उदाहरण दिए गए हैं. 6 रुपये 75 पैसे में खरीदी गई सिरिंज की MRP 57 रुपये 20 पैसे बताई गई. वहीं 29 रुपये 41 पैसे में खरीदे गए कैथेटर की MRP 310 रुपये थी. यानी इन तीनों उदाहरणों में ट्रेड प्राइस और MRP के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है. जब आप किसी मेडिकल स्टोर पर दवा खरीदते हैं… तो आपके पास कीमत देखने और दूसरे ब्रांड से तुलना करने का विकल्प हो सकता है.

लेकिन अस्पताल में भर्ती मरीज के मामले में स्थिति अलग होती है. इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले IV सेट, सिरिंज या कैथेटर को लेकर मरीज आमतौर पर न तो अलग-अलग दुकानों पर कीमत तलाश सकता है. न ही इलाज के बीच में विकल्पों की तुलना कर सकता है. सामान इस्तेमाल होता है और उसका खर्च सीधे अस्पताल के बिल में जुड़ जाता है. यानी जिस व्यक्ति की जेब से पैसा जा रहा है… उसी के पास कीमत की पूरी जानकारी नहीं है.

असली कीमत और MRP में इतना अंतर क्यों?

अब सवाल ये कि आखिर किसी मेडिकल कंज्यूमेबल की कीमत इतनी बढ़ती कैसे है? मेडिकल सप्लाई की एक पूरी चेन होती है… निर्माता से सामान निकलता है… फिर डिस्ट्रीब्यूटर और सप्लायर के जरिए अस्पताल तक पहुंचता है… इस पूरी प्रक्रिया में कीमत बदलती रहती है… लेकिन मरीज को आखिर में सिर्फ बिल दिखाई देता है… उसे ये जानकारी अक्सर नहीं होती कि अस्पताल ने सामान कितने में खरीदा और बिल में कितनी कीमत लगाई गई.

दवाओं पर प्राइस कंट्रोल, कंज्यूमेबल्स पर सवाल

IAS अधिकारी तुकाराम मुंडे ने अपने पोस्ट में मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों के नियमन का मुद्दा भी उठाया है. दवाओं की कीमतों के लिए Drugs (Prices Control) Order, 2013 के तहत कीमत तय करने की व्यवस्था है. NPPA यानी National Pharmaceutical Pricing Authority भी दवाओं की कीमतों के नियमन में भूमिका निभाता है, लेकिन अधिकतर मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स पर कीमत सीमा लागू नहीं है.

सरकार के सामने सिफारिश

तुकाराम मुंडे की पोस्ट में बताया गया है कि Department of Pharmaceuticals और NPPA के सामने ट्रेड खरीद मूल्य और घोषित MRP के बीच अंतर को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की सिफारिश की गई है. मकसद सिर्फ कीमत कम करना नहीं… बल्कि मरीज और अस्पताल के बीच मौजूद इनफॉर्मेशन गैप को भी कम करना है… यानी मरीज को ये पता हो कि उसके इलाज में इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमत किस आधार पर तय हुई.

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