सूई चिड़िया, मम्मी के बातें और पक्षियों से मेरा रिश्ता, पक्षियों को समझने का सफर

Published on 4 अक्टू॰ 2026

सूई चिड़िया (फोटो साभार: सोनम)

उनकी बात सुन कर मेरी जिज्ञासा बढ़ गई। मैं पीछे बाड़ी (बगीचे) में गई तो देखा कि वहां एक सुंदर सी चिड़िया बैठी हुई थी। ‘ओहो.. मम्मी यह तो magpie Robin है। यह तो बहुत सुंदर पक्षी है ! क्या आपने इसे कभी देखा है?

मम्मी ने बताया कि उन्होंने इसे कई बार देखा है। ये काले सफ़ेद रंग का गौरैया से थोड़ा बड़ा होता है। इनके पंखों में सफेद लंबी धारी बनी होती है। चोंच छोटी होती है और पूछ सामान्य मध्यम आकार की। जिसे वह बार-बार ऊपर नीचे करता रहता है। इसी कारण से इसे दमफुदकी भी कहा जाता है। 

मैने मम्मी को बताया कि ये बांग्लादेश का राष्ट्रीय पक्षी भी है। पर मैने उनसे पूछा कि वो इसे भगाने क्यों कह रही हैं। आपको किसने कहा यह अच्छा पक्षी नहीं होता ? तब मम्मी ने बताया बड़े बुजुर्ग कहा करते थे कि यह जब घर के आसपास आवाज करें तो कभी अच्छी खबर तो कभी बुरी खबर सुनाई पड़ती है, और इसीलिए लोग इसे अक्सर आवाज करने पर भगा दिया करते हैं। 

उस दिन सुई चिड़िया से हुई हमारी बातचीत धीरे-धीरे उन तमाम पक्षियों और उनसे जुड़ी मान्यताओं तक पहुंच गई, जिनके बारे में मम्मी ने अपने बड़े बुजुर्गों से सुना था। 

कौवे की आवाज और मेहमान आने की बात 

और जानने की चाह और जिज्ञासा के साथ मैने मम्मी से पूछ लिया कि ‘अच्छा तो और क्या-क्या बताते थे आपके बड़े बुजुर्ग पक्षियों के बारे में।’ फिर मम्मी ने बताया कि उनकी बऊ (मां) कहा करती थी कि अगर घर की छत में कोई कौवा काँव-काँव करें तो समझ जाना कोई मेहमान आने वाला है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि कौवा छत पर चिल्लाए और उसके थोड़ी देर बाद ही मेहमान घर पर आ गए। इन्हीं अनुभवों की वजह से हमारे यहां इन मान्यताओं और अनुभव के ऊपर कई फ़िल्मी गीत भी बनाए गए हैं जैसे की

माही की माही मुंडेर पे तेरे बोल रहा है कागा……

कौवा एक चतुर पक्षी भी माना जाता है।ऐसे कई पक्षी की प्रजातियाँ हैं जिन्हें उनकी व्यवहार के कारण बेहद चतुर और होशियार मानते हैं।इन अनुभवों को देख कर ही लोगों द्वारा कई कविताएँ और कहानी भी लिखी गई है। बचपन में सुनी कौवे और घड़े वाली कविता भी एसी ही एक कहानी है। जिसमें एक घड़े में पत्थर के मदद से कौवा पानी ऊपर लता है। अपनी प्यास बुझाता है। 

पतली डाली में बैठा हुआ कौवा (फोटो साभार: सोनम)

मैने मम्मी से पूछा कि क्या ऐसी कथाएँ और कविताएँ सच हैं या इसे ऐसे ही मनोरंजन के लिए बनाई गई है? तो उन्होंने बताया कि वे कौवे को कई बार इस तरह की गतिविधियाँ करते हुए पाया गया है। 

निलकंठ और उल्लू से जुड़ी मान्यताएँ 

बातचीत में निलकंठ का जिक्र भी आया। मम्मी ने बताया कि भारत के हिंदू धर्म के लोगों की मान्यता है कि नवरात्रि के अंतिम दिन यानी दशहरे के दिन अगर किसी व्यक्ति को निलकंठ दिखाई दे जाए तो उसे शुभ माना जाता है। मैने मां से पूछा क्या उन्होंने कभी दशहरे के दिन निलकंठ देखा है या किसी और को दिखा है? उनका जवाब था कि उन्होंने तो कभी नहीं देखा। पर पहले के समय में दशहरे के दिन लोग बहुत दूर-दूर से सिर्फ नीलकंठ देखने के लिए शहरों से गांव और गांव से जंगलों की ओर जाया करते थे ।

उल्लू को लेकर भी मान्यता है। मम्मी ने बताया कि अगर कोई व्यक्ति किसी अच्छे काम के लिए कहीं जा रहा हो और रास्ते में उसे उल्लू दिख जाए तो उसके काम बिगड़ जाते थे। इन मान्यताओं को लेकर लोगों के अनुभव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के रहे हैं। 

मम्मी ने अपने जीवन के अनुभवों के बारे में भी बताया। इन सारी बातों को सुनते हुए मुझे लगा कि पक्षियों को लेकर हमारे आसपास सिर्फ उनके नाम या पहचान की जानकारी नहीं रही है। उनके साथ लोगों का अनुभव, कहानियाँ और मान्यताएँ भी जुड़ी रही है।

बुजुर्गों से मिली बातें अब कितनी दूर है? 

मम्मी ने एक बात कही जो मेरे लिए इस बातचीत का दूसरा हिस्सा खोलती है। उन्होंने कहा कि तुम्हारी पीढ़ी के बच्चे अपने बड़े बुजुर्गों के साथ बैठते ही नहीं है। न उनसे बात करते हैं, न ही उन्हें सुनते हैं। उनका मानना था आज की पीढ़ी टीवी और मोबाइल की दुनिया में ज़्यादा व्यस्त है। 

उनके समय में ये सब कुछ नहीं था। मनोरंजन के साधन अलग थे जैसे नानी, दादी की कहानियाँ, कविताएँ, पहेलियाँ चुटकुले ही बच्चों तक पुराने समय का ज्ञान और अनुभव पहुँचाने का ज़रिया हुआ करते थे। 

मुझे लगता है कि इसके पीछे सिर्फ टीवी और मोबाइल ही ज़िम्मेदार नहीं है। हमारी जीवनशैली में भी बड़ा बदलाव आया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोगों का गांवों से शहरों की ओर जाना बढ़ता रहा है। परिवार के कुछ सदस्य रोजगार या दूसरी जरूरतों के कारण गांवों से निकलकर शहरों में रहने लगते हैं। ऐसे में पहले की तरह एक ही घर में कई पीढ़ियों का साथ रहना हमेशा संभव नहीं रहता।

भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी लगभग 31.2% हिस्सा शहरी क्षेत्रों में रहता था। जबकि 2001 में ये हिस्सा 27.8% था। यानी एक दशक में भारत की शहरी आबादी का हिस्सा लगभग 3.4% अंक बढ़ा। भारत में शहरी आबादी के लंबे बदलाव की बात करें तो वर्ष 1901 में शहरी आबादी 10.8% थी, लेकिन वर्ष 2011 में यही आबादी बढ़कर 31.16% हो गई। Census 2011 में migration के कारणों में काम या रोजगार, शिक्षा और परिवार के साथ स्थानांतरण जैसी वजहें भी दर्ज की गई हैं।

क्या मान्यताएँ बदली हैं या पक्षियों से रिश्ता भी 

मम्मी का मानना है कि आज भी बुजुर्ग अपना अनुभव और पारंपरिक मान्यताएँ नई पीढ़ी को देते हैं। लेकिन नई पीढ़ी उनमें पहले जैसा विश्वास नहीं करती। मुझे लगता है “शायद इसलिए भी कि आज हम किसी बात को स्वीकार करने से पहले उसका वैज्ञानिक आधार जानना चाहते हैं। जो सही भी है। हमारी कई लोकमान्यताएँ और प्रकृति से जुड़े अनुभव पीढ़ियों तक मौखिक रूप से चलते रहे। लेकिन उनमें से हर बात को वैज्ञानिक तरीके से देखा परखा या समझाया नहीं गया।

दूसरी ओर, जब परिवार और जीवनशैली बदली, तो बुजुर्गों से युवाओं तक उस ज्ञान के पहुँचने के अवसर भी कम हुए। पारंपरिक ज्ञान पर हुए शोध बताते हैं कि जब उसका transmission और practice कमजोर होता है, तो वह ज्ञान धीरे-धीरे भी कमजोर पड़ जाता है।

बच्चे पक्षियों को देखने, पहचानने और ढूँढने की तलाश में (फोटो साभार: सोनम)

लेकिन मेरे मन में इससे जुड़ा एक और सवाल है। क्या सिर्फ बच्चों की रुचि बदली है या उनके आसपास पक्षियों की मौजूदगी भी पहले जैसे नहीं रही? एक और बात है, शायद आज बच्चों को पक्षी पहले जैसे दिखाई और सुनाई भी नहीं देते। ऐसा क्यों? क्या पक्षियों की संख्या कम हो गए हैं?

हर पक्षी नहीं, लेकिन कई प्रजातियों की अनुपस्थिति जरूर चिंताजनक है। State of India’s Birds 2023 ने भारत की 942 पक्षी प्रजातियों का अध्ययन किया है। जिन 338 प्रजातियों के 25 साल से अधिक के long-term trends स्पष्ट थे, उनमें 204 प्रजातियों में गिरावट दज की गई। यानी जिन प्रजातियों के लिए पर्याप्त और स्पष्ट long-term data उपलब्ध था, उनमें लगभग 60% में गिरावट देखी गई।

मम्मी पूछती हैं तो क्या बच्चों को पक्षी कम दिखना सिर्फ उनकी रुचि कम होने की वजह नहीं है? शायद नहीं। इसका मतलब ये भी है कि बच्चों को पक्षी कम दिखाई देना सिर्फ उनकी रुचि कम होने की वजह नहीं है। एक तरफ हमरी जीवनशैली और पीढ़ियों के बीच संवाद बदला है। दूसरी तरफ कई कारणों से पक्षी प्रजातियों की संख्या और उनका फैलाव भी बदल गया है। 

जब किसी बच्चे के आसपास पक्षी कम दिखाई देंगे, उनकी आवाज़ें कम सुनाई देंगी और उनके घोंसले या रहने की जगह कम दिखेगी तो उनसे रोज़मर्रा का स्वभाविक रिश्ता बनना भी मुश्किल होता जाएगा।

पक्षी हमारे आसपास की प्रकृति का हिस्सा है 

मम्मी पूछ ही पड़ी कि ‘हां लेकिन आज तुम पक्षियों से टूटते रिश्तों को लेकर इतनी चिंतित क्यों हो रही हो?’ मैने जवाब दिया “क्योंकि पक्षी सिर्फ हमारे आँगन और जंगल की शोभा नहीं हैं। वे प्रकृति के ऐसे हिस्सेदार हैं, जो पेड़ों के बीज फैलाने से लेकर कीटों की संख्या नियंत्रित करने और पर्यावरण में होने वाले बदलावों के संकेत देने तक कई भूमिकाएँ निभाते हैं।”

एक पक्षी (फोटो साभार: सोनम)

इसे हम ऐसे समझ सकते हैं…

  1. प्रकृति के सफाई कर्मी: गिद्ध और कौए जैसे पक्षी मरे हुए जानवरों के शवों को खाकर प्रकृति को साफ रखने में मदद करते हैं। यदि ये पक्षी न हों तो सड़ते हुए शवों से प्लेग, रेबीज और एंथ्रेक्स जैसी भयानक महामारियाँ और बीमारियाँ इंसानों व अन्य जानवरों में फैल सकती है। 
  2. किसानों के सबसे बड़े मित्र: उल्लू, गौरैया, बगुले और मैना जैसे पक्षी खेतों में लगने वाले हानिकारक कीड़े-मकोड़ों, टिड्डियों और चूहों को खाते हैं। यदि पक्षी न हों, तो कीड़े पूरी फसलें तबाह कर सकते हैं।जिससे भुखमरी की नौबत आ सकती है। पक्षियों के कारण ही किसानों को फसलों पर कम कीटनाशक छिड़कने पड़ते हैं।
  3. जंगलों को उगाने वाले: पक्षी जब फल खाते हैं, तो वे उनके बीजों को भी निगल लेते हैं। जब वे उड़कर दूसरी जगहों पर मल (Droppings) त्यागते हैं तो वे बीज दूर-दूर तक फैल जाते हैं, और नए पेड़ उगते हैं। दुनिया के कई घने जंगल इंसानों ने नहीं, बल्कि पक्षियों और गिलहरियों द्वारा बिखेरे गए बीजों से ही उगे हैं।
  4. परागण में मदद: गुंजन पक्षी और सनबर्ड जैसे छोटे पक्षी जब फूलों का रस चूसते हैं, तो परागकण (Pollens) एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँचते हैं। इससे पौधों में प्रजनन होता है और नए फल व फूल बनते हैं। हमारी कई खाद्य फसलें इसी परागण पर निर्भर हैं।
  5. मौसम और पर्यावरण के संकेतक: पक्षी पर्यावरण में होने वाले में होने वाले बदलावों को बहुत जल्दी भांप लेते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी इलाके में प्रदूषण बढ़ रहा है या पानी प्रदूषित हो रहा है, तो वहाँ से पक्षी गायब होने लगते हैं। इससे इंसानों को चेतावनी मिल जाती है कि उस इलाके का पर्यावरण खराब हो रहा है।
  6. मानसिक शांति और सौंदर्य: सुबह-सुबह पक्षियों की चहचहाहट सुनना और उन्हें देखना इंसानी दिमाग़ को सुकून देता है। वैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार, प्रकृति और पक्षियों के बीच समय बिताने से इंसानों का मानसिक तनाव बहुत हद तक कम होने में मदद मिल सकती है। 

बच्चों को पक्षियों से जोड़ने की कोशिश 

फिर मम्मी कहती है “अच्छा तो अब समझी कि तुम रोजाना सुबह शाम बच्चों को पक्षी क्यों दिखाती रहती हो।” शायद यही वजह है कि अब मैं सिर्फ पक्षियों को देखने तक सीमित नहीं रहना चाहती। मैं चाहती हूं कि बच्चे भी अपने आसपास मौजूद पक्षियों को देखें। उन्हें पहचाने और उनके व्यवहार को समझे। 

इसी सोच के साथ मैंने अपने गांव मध्य प्रदेश सिवनी जिले के कुरई ब्लॉक के छोटे से गांव कोदाझिरी में गांव के ही बच्चों के साथ पक्षियों को जानने और उनसे जुड़ने की छोटी सी  पहल शुरू की है। 

बच्चों को पक्षियों के बारे में बता रही है (फोटो साभार: सोनम)

पिछले करीब दो वर्षों से 8 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चों के साथ हम अलग-अलग गतिविधियों के माध्यम से पक्षियों को उनके आसपास की दुनिया का हिस्सा बनाने की कोशिश  कर रहे हैं। सुबह और शाम की बर्ड वॉक में बच्चे अपने आसपास की आवाजों को सुनते हैं। पक्षियों को देखते हैं और उनकी पहचान करने की कोशिश करते हैं। कभी कोई पक्षी हमारी कहानी का पात्र बन जाता है। कभी बच्चे उसकी तस्वीर बनाते हैं, तो कभी कविता, खेल और बातचीत के ज़रिए उसके व्यवहार को समझते हैं।

पक्षियों की आवाज पहचानने के लिए हम Merlin Bird ID जैसे डिजिटल टूल का भी इस्तेमाल करते हैं। यानी जिस तकनीक को अक्सर बच्चों को प्रकृति से दूर करने वाली चीज माना जाता है, उसी तकनीक को हमने प्रकृति के करीब लाने के एक माध्यम की तरह इस्तेमाल किया।

मेरा उद्देश्य केवल बच्चों को पक्षियों के नाम याद करवाना नहीं है। मैं चाहती हूँ कि वे अपने आसपास रहने वाले पक्षियों को देखें, पहचानें, उनके व्यवहार को समझें और उनके साथ एक भावनात्मक रिश्ता बनाए। क्योंकि जिस जीव को हम पहचानने लगते हैं, उसके गायब होने पर हमें उसकी कमी महसूस होने की संभावना भी बढ़ती है। 

यह प्रयास अभी एक छोटे से गाँव से शुरू हुआ है, लेकिन मेरी कोशिश है कि इसे और अधिक बच्चों, परिवारों और समुदायों तक ले जाया जाए। ताकि पक्षियों को जानना केवल एक गतिविधि न रह जाए बल्कि हमारे रोज़मर्रा के जीवन और प्रकृति से जुड़ने का हिस्सा बने। 

चम्बल एकेडमी फेलो – सोनम/ रिपोर्ट, लेखन 

एडिट – रचना 

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