उबलते समंदर, जलती धरती, क्या सुपर अल-नीनो बदलेगा दुनिया का मौसम?

Published on 16 अक्टू॰ 2026

उबलते समंदर, जलती धरती, क्या सुपर अल-नीनो बदलेगा दुनिया का मौसम?

अल-नीनो (El Niño) के असाधारण रूप से मजबूत होने की आशंका है.

अक्टूबर 2026 में प्रशांत महासागर पर दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिकों की नजरें टिकी हैं. वजह है अल-नीनो (El Niño) के असाधारण रूप से मजबूत होने की आशंका. वैज्ञानिकों को डर है कि इसका असर दुनिया के तापमान, बारिश, सूखे और खेती पर पड़ सकता है. पहले से ग्लोबल वार्मिंग का सामना कर रही धरती के लिए यह दोहरी चुनौती बन सकती है.

पर्यावरण विशेषज्ञ और जियोलॉजिस्ट राजेश सॉलमन पॉल कहते हैं, जलवायु विज्ञान की सबसे दिलचस्प घटनाओं में से एक है. इसको समझने के लिए हमें जानना होगा महासागर और वायुमंडल एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़े हुए हैं.

क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ रही चिंता?

अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान और हवाओं में होने वाला प्राकृतिक बदलाव है. सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक हवाएं गर्म सतही पानी को पूर्व से पश्चिम की ओर धकेलती हैं. इससे पश्चिमी प्रशांत में गर्म पानी जमा होता है, जबकि मध्य और पूर्वी हिस्से में अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर आता रहता है.

Super El Nino Wmo Warning October December 2026 Impact

अल-नीनो के मजबूत होने की आशंका जताई गई है. फोटो: PTI

राजेश सॉलमन पॉल बताते हैं, अल-नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं और मध्य तथा पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने लगता है. इससे समुद्र और वायुमंडल के बीच का संतुलन बदल जाता है. इस बदलाव का असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता. वाष्पीकरण, बादलों के बनने और बारिश वाले क्षेत्रों में बदलाव आता है. हवा के ऊपर उठने और नीचे उतरने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. इससे हवा का दबाव, जेट स्ट्रीम और बड़े पैमाने पर चलने वाली वायुमंडलीय प्रणालियां भी बदल सकती हैं.

पॉल कहते हैं, ये बदलाव हजारों किलोमीटर दूर दूसरे क्षेत्रों के मौसम को भी प्रभावित कर सकते हैं. इसे टेली-कनेक्शन यानी दूरस्थ जलवायु संबंध कहा जाता है. यही वजह है कि प्रशांत महासागर में होने वाला बदलाव भारत समेत दुनिया के दूसरे हिस्सों के मौसम को भी प्रभावित कर सकता है.

कितना ताकतवर हो सकता है सुपर अल-नीनो?

अल-नीनो की ताकत मापने के लिए वैज्ञानिक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के एक निर्धारित हिस्से को देखते हैं, जिसे नीनो 3.4 (Niño 3.4) क्षेत्र कहा जाता है. यहां समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कितना ऊपर है, इससे घटना की तीव्रता का अंदाजा लगाया जाता है. आम तौर पर सामान्य से कम-से-कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान के साथ संबंधित वायुमंडलीय बदलाव भी अल-नीनो की स्थिति का संकेत देते हैं.

अमेरिकी एजेंसी NOAA का पूर्वानुमान बताता है. सितंबर में नीनो 3.4 क्षेत्र का तापमान सामान्य से 2.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था. 8 अक्टूबर 2026 को जारी वर्ल्ड वेदर साइंस ऑर्गेनाइजेशन (WMO) के पूर्वानुमान के हिसाब से, अक्टूबर-दिसंबर के दौरान ये अंतर लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. NOAA के अनुमान में ऐतिहासिक रूप से मजबूत अल नीनो बनने की संभावना 83 फीसदी बताई गई है.

राजेश सॉलमन पॉल स्पष्ट करते हैं, 3.7 डिग्री का मतलब यह नहीं है कि पूरी दुनिया का तापमान इतना बढ़ जाएगा. यह प्रशांत महासागर के एक खास क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान का सामान्य से अंतर है. बहुत मजबूत अल नीनो को सुपर अल नीनो कहा जाता है.

Super El Nino Wmo Warning

अल-नीनो के कारण कुछ क्षेत्रों में गर्मी, कम बारिश या भारी बारिश की संभावना है. फोटो: PTI

ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ सकती है चुनौती

अल-नीनो नेचुरल घटना है, लेकिन ओशन ह्यूमन एक्टिविटीज़ से पैदा हुई एक्सट्रा गर्मी का बड़ा हिस्सा सोखते रहे हैं. राजेश पॉल कहते हैं इसकी इंटेसिटी के साथ इसका टाइम भी अहम है. पृथ्वी पहले से ग्लोबल वार्मिंग का सामना कर रही है. ऐसे में अगर अत्यंत मजबूत अल नीनो विकसित होता है, तो कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी और दूसरी जलवायु संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है.

हालांकि, 2027 दुनिया का सबसे गर्म साल होगा या नहीं, यह अभी निश्चित नहीं कहा जा सकता. इसके लिए अल नीनो की रियल इंटेसिटी, टाइम पीरियड और दूसरे जलवायु कारकों पर नजर रखनी होगी.

भारत के मानसून पर क्या होगा असर?

भारत के लिए यह बदलाव खास मायने रखता है, क्योंकि अल-नीनो की वजह से अक्सर भारतीय मानसून को कमजोर होता है. हर अल-नीनो के दौरान बारिश कम हो, ये जरूरी नहीं है. हिंद महासागर का तापमान, हवाओं की कंडीशन और दूसरे क्षेत्रीय कारक भी मानसून को प्रभावित करते हैं.

राजेश सॉलमन पॉल कहते हैं, भारतीय मानसून केवल स्थानीय तापमान या बादलों पर निर्भर नहीं करता. यह महासागरों और वायुमंडल के बीच होने वाली बड़ी प्रक्रियाओं से भी प्रभावित होता है.

अगर गर्मी और सूखे का दबाव बढ़ता है, तो खेती, बांधों के जलस्तर, बिजली की मांग और फूड सप्लाई पर असर पड़ सकता है. UNICEF की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट ऐसे जलवायु जोखिमों से दुनियाभर में लगभग 34.7 करोड़ बच्चों के गंभीर सूखे या विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आने की आशंका जताई गई है. राजेश पॉल कहते हैं हमें घबराने की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पूर्वानुमानों के आधार पर तैयारी करने की जरूरत है.

सुपर अल-नीनो का वास्तविक असर कितना होगा, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा. लेकिन एक बात साफ है, मौसम को समझने के लिए अब केवल अपने शहर या देश को देखना काफी नहीं. समुद्र, हवाओं और वैश्विक तापमान के बदलते पैटर्न को एक साथ समझना जरूरी है.

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प्रमिला दीक्षित

प्रमिला दीक्षित

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय... कश्मीर से केदारनाथ और काशी तक, अपराध से आतंकवाद तक, दंगों की क्रूरता से दरियादिली की कहानी तक, राजनीति से साहित्य की रवानी तक, तथ्य, तर्क और संवेदना के साथ हर विषय पर रिपोर्टिंग करती रही हैं. वीडियो, रेडियो, ब्लॉग- लेख, कविता और मॉडरेशन उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम है.

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