जनगणना के नए नियम पर विवाद क्यों - Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

Published on 20 अक्टू॰ 2026

छह साल की देरी से हो रही जनगणना के लिए इसके नियमों में संशोधन किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले भारत के महापंजीयक कार्यालय ने जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 18 की उपधारा एक के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जनगणना नियम 1990 में कुछ और बदलाव करने के लिए निर्देश जारी किए हैं। इनमें प्रस्तावित बदलावों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस की आपत्तियों पर बात करने से पहले उन दो बदलावों को रेखांकित करने की आवश्यकता है, जो अपनी प्रकृति में बिल्कुल नई हैं। पहला, महापंजीयक कार्यालय ने पहली बार सरकारी स्कूलों व कार्यालयों के कर्मियों के साथ साथ निजी स्कूलों और ट्रस्टों के कर्मियों को भी जनगणना के काम में शामिल करने का प्रस्ताव किया है और दूसरा, किसी सामान्य नागरिक को भी बतौर वॉलंटियर इसमें शामिल करने का प्रस्ताव है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के मुताबिक, ‘ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, प्रगणक के रूप में कर्तव्यों का निष्पादन करने के लिए उपयुक्त समझे’ उसे जनगणना के काम में लगाया जा सकता है।

कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति की है। कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों को जनगणना के काम में शामिल करने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया है कि इस साल 10 से 12 जुलाई को कर्नाटक के बेलगाम में आरएसएस के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसका एकमात्र एजेंडा जनगणना 2027 था। उनका कनहा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को देश की बदलती डेमोग्राफी पर सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी में सभी सदस्य आरएसएस हैं और उसके सुझाव पर ही जनगणना के नियमों में बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस को आशंका है कि डेमोग्राफी पर बनी कमेटी और आरएसएस के लोगों को जनगणना में शामिल करके एसआईआर की तरह जनगणना के आंकड़ों में भी खतरनाक तरीके से हेरफेर किया जाएगा। हालांकि खतरनाक रूप से क्या हेराफेरी हो सकती है यह कांग्रेस ने नहीं बताया है। फिर भी कांग्रेस की आशंका को आधारहीन बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या भारत में ऐसी एक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है, जहां वालंटियर्स यानी स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की मदद से जनगणना, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, सामाजिक व आर्थिक सर्वेक्षण, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे जैसे काम कराए जाएं?

ध्यान रहे दुनिया भर के देशों में ऐसी व्यवस्था है। पता नहीं कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने कभी इसका अध्ययन करने का प्रयास किया है या नहीं कि अमेरिका में लगभग पूरा चुनाव वालंटियर्स की देखरेख में होता है। वहां भारत के चुनाव आयोग जैसी कोई केंद्रीय संस्था नहीं है। राज्यों में अपनी अपनी संस्थाएं हैं। लेकिन उनमें भी बहुत लंबी चौड़ी वर्क फोर्स नहीं है और न चुनाव कराने के लिए स्कूलों के शिक्षक व सरकारी कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर शामिल किया जाता है। थोड़े से सरकारी कर्मचारी और ढेर सारे वॉलंटियर मिल कर चुनाव कराते हैं। दशकों से ऐसे ही चुनाव होते हैं और डोनाल्ड ट्रंप के आने से पहले किसी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप भी नहीं लगाए थे। भारत में इस तरह की व्यवस्था बनाने की बहुत आवश्यकता है।

भारत में आजादी के बाद से ही तदर्थ प्रक्रिया चल रही है। सरकारी कर्मचारियों को और उसमें भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को किसी भी तरह की ड्यूटी में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची का ‘संक्षिप्त’ या ‘विशेष संक्षिप्त’ या ‘विशेष गहन’ पुनरीक्षण होना है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, मतदान कराना है तो सरकारी शिक्षक कराएंगे, मतगणना करनी है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, सामाजिक व आर्थिक सर्वे करना हो, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे करना हो, पशुओं की गिनती करनी हो, टीकाकरण करना हो, कोरोना या बाढ़ जैसी कोई महामारी में राहत बांटना हो, सारे काम सरकारी शिक्षकों को करने होते हैं। कुछ दिन पहले ही एक शिक्षक ने सोशल मीडिया में तंज करते हुए कहा कि वह तो अच्छा है कि सरकार कृषि कार्य नहीं कराती है अन्यथा फसलों की बुवाई, कटाई भी सरकारी स्कूल के शिक्षक करते। सचमुच ऐसी ही स्थिति है। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। अभी एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है तो राजधानी दिल्ली जैसे राज्य में सैकड़ों स्कूल एक एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से ये सब काम कराने से साल के कई महीने तक पढ़ाई, लिखाई का काम लगभग पूरी तरह से ठप्प रहता है।

सरकार ने अब अनुदान प्राप्त और बिना अनुदान वाले निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी इसमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। इससे वहां भी सरकारी स्कूलों जैसे ही पढ़ाई प्रभावित होगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार स्कूली शिक्षा को पूरी तरह से बरबाद करने का संकल्प किए हुए है। वैसे पिछले दिनों आरएसएस से जुड़े रहे एक युवा स्कॉलर के मुंह से सुनने को मिला कि स्कूली शिक्षा को लेकर ‘भाई साहेब’ लोग क्या सोच रहे हैं। एक ‘भाई साहेब’ ने उस युवा स्कॉलर से कहा था कि कॉलेज पहुंचने वाले युवा इतने आंदोलित इसलिए हो रहे हैं क्योंकि देश में आज भी बड़ी संख्या में अच्छे स्कूल चल रहे हैं, जहां से वे पढ़ कर आते हैं। कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की पढ़ाई और प्रशासन की व्यवस्था तो पिछले कुछ बरसों में पूरी तरह से बिगाड़ दी गई है। लेकिन चूंकि वे अच्छे स्कूल से आते हैं तो बिगड़े हुई व्यवस्था वाले कॉलेजों में एडजस्ट होने में उनको दिक्कत होती है। सो, इसका उपाय यह है कि स्कूली शिक्षा को भी वैसे ही बरबाद कर दिया जाए जैसे कॉलेज और यूनिवर्सिटीज को किया गया है।

बहरहाल, अगर सरकार गंभीर है तो उसे कांग्रेस की आलोचना की परवाह नहीं करनी चाहिए और देश में ऐसे कामों के लिए वॉलंटियर्स का नेटवर्क तैयार करना चाहिए। इससे देश के युवाओं को सीजनल रोजगार भी मिलेगा और यह बड़ी वर्क फोर्स तैयार होगी। ध्यान रहे देश की आबादी डेढ़ सौ करोड़ है और यहां जनगणना और चुनाव से लेकर अलग अलग तरह के सर्वेक्षण का काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इसके लिए पढ़े, लिखे बेरोजगार नौजवानों को अगर वालंटियर के तौर पर शामिल किया जाए तो यह योजना ग्रामीण रोजगार की मनरेगा जैसी योजना से बड़ी हो सकती है और इसमें ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसके लिए बहुत गहन गंभीर प्रशिक्षण की आवश्यकता भी नहीं होती है। सरकार एक बार प्रशिक्षण की व्यवस्था करके वालंटियर्स की फौज तैयार कर सकती है। यह वर्क फोर्स सरकारी कामकाज तो करेगी ही साथ ही निजी कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, चुनावी सर्वे करने वाली कंपनियों आदि के लिए भी उपलब्ध रहेगी।

इस मामले में कांग्रेस की आलोचना का कोई खास आधार नहीं है। अगर सरकारी शिक्षक ही जनगणना करेंगे तो क्या गारंटी है कि जयराम रमेश जिस हेरफेर की आशंका जता रहे हैं वह नहीं होगी? आखिर मतदाता सूची का काम तो सरकारी लोग ही कर रहे हैं तो क्या कांग्रेस को उस पर भरोसा है? जयराम रमेश को यह समझना चाहिए सरकारी और निजी शिक्षकों में भी संघ और भाजपा के प्रति रूझान रखने वाले लोग होंगे और कांग्रेस व विपक्ष को पसंद करने वाले भी होंगे। वैसे ही चुनाव कराने या जनगणना के लिए वॉलंटियर नियुक्त होंगे तो उसमें भी हर विचार और राजनीतिक रूझान वाले लोग होंगे। अगर पेशेवर तरीके से कामकाज का वातावरण बनता है, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल होता है और निगरानी की ईमानदार व्यवस्था बनती है तो वॉलंटियर वाली व्यवस्था एक साथ भारत की कई समस्याओं का समाधान कर सकती है।