टाटा संस की लिस्टिंग होना तय! RBI ने खारिज की सरेंडर अर्जी, समझें देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट ग्रुप पर असर

Published on 12 सित॰ 2026

RBI ने Tata Sons की उस अर्जी को ठुकरा दिया है जिसमें उसने अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट स्वेच्छा से सरेंडर करके ‘अन-रजिस्टर्ड कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी’ (CIC) के तौर पर क्लासिफाई होने की मांग की थी. इस फैसले से भारत के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप (जिसका कारोबार कई सेक्टर और देशों में फैला है) की होल्डिंग कंपनी के पब्लिक लिस्टिंग का रास्ता साफ हो गया है. ईटी क रिपोर्ट के अनुसार 11 सितंबर, 2026 के एक लेटर में, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने कहा कि Tata Sons की 28 मार्च, 2024 की अर्जी और उसके बाद हुई बातचीत पर विचार करने के बाद, वह CoR को स्वेच्छा से सरेंडर करने की मांग को मंजूरी नहीं दे सकता.

RBI ने टाटा संस को गाइडलाइंस पूरा करने को कहा

RBI ने Tata Sons को सलाह दी है कि वह NBFC-अपर लेयर (UL) कंपनियों पर लागू होने वाले सभी गाइडलाइंस और निर्देशों का पूरी तरह से पालन करने के लिए जरूरी कदम उठाए. इस घटनाक्रम का मतलब है कि Tata Sons पर NBFC-UL कंपनियों के लिए लागू रेगुलेटरी फ्रेमवर्क लागू रहेगा. इस निर्देश ने उस अहम रेगुलेटरी रास्ते को बंद कर दिया है जिसे Tata Sons ने पब्लिक लिस्टिंग से बचने के लिए अपनाया था. कंपनी ने मार्च 2024 में अपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने के लिए अजी दी थी. RBI ने Tata Sons को 16 अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियों (NBFC) की लिस्ट में भी शामिल किया है, जिससे उस पर कड़ी रेगुलेटरी निगरानी होगी और लिस्टिंग अनिवार्य हो जाएगी. Tata Sons ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की. RBI की ओर से भी कोई बयान सामने नहीं आया है.

2 लाख करोड़ का टाटा संस

सेंट्रल बैंक का यह फैसला जून 2026 में उसके स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में किए गए बदलाव के बाद आया है, जिसमें उसने किसी कंपनी को अपर-लेयर NBFC के तौर पर क्लासिफाई करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपए की एसेट लिमिट तय की थी. 31 मार्च, 2026 तक Tata Sons की कुल एसेट 2.01 लाख करोड़ रुपए थी, जो तय लिमिट से दोगुने से भी ज्यादा थी. कंपनी ने डी-रजिस्ट्रेशन पाने और लिस्टिंग से बचने की कोशिश में अपना सारा कर्ज़ चुका दिया था. हालांकि, RBI की शर्तों के अनुसार, सिर्फ वही कंपनियां 31 दिसंबर तक डी-रजिस्ट्रेशन के लिए योग्य हो सकती हैं जिनके पास पब्लिक फंड नहीं है, जिनका ग्राहकों से कोई सीधा संपर्क नहीं है और जिनकी संपत्ति 1,000 करोड़ रुपए से कम है.

2022 से है अपर लेयर एनबीएफसी

टाटा संस, जिसका कारोबार स्टील और ऑटोमोबाइल से लेकर फाइनेंशियल सर्विस और सेमीकंडक्टर तक फैला है, 2022 से ‘अपर-लेयर NBFC’ की श्रेणी में शामिल है. सेंट्रल बैंक ने यह भी कहा है कि एक बार जब कोई NBFC ‘अपर लेयर’ में आ जाती है, तो उस पर कम से कम पांच साल तक सख्त रेगुलेटरी नियम लागू रहेंगे, भले ही बाद की जांच में वह योग्यता की शर्तों को पूरा न करे. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने पहले कहा था कि ‘अपर लेयर NBFC’ वर्गीकरण के लिए बदले गए नियम सिद्धांतों पर आधारित हैं. मल्होत्रा ​​ने इस सवाल के जवाब में कहा ​कि तो, उन सिद्धांतों के अनुसार, सभी जानते हैं कि लिस्ट क्या है. और मामला यहीं तक है, कि क्या टाटा संस ‘अपर लेयर’ में बनी रहेगी.

शापूरजी पलोनजी ग्रुप को मिल सकती है राहत

टाटा ट्रस्ट्स, जो सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के जरिए टाटा संस में 66 फीसदी हिस्सेदारी रखती है, ने जुलाई 2025 में एक प्रस्ताव पास करके होल्डिंग कंपनी को प्राइवेट ओनरशिप में ही रखने का फैसला किया. शापूरजी पलोनजी ग्रुप, जो 18.37 फीसदी हिस्सेदारी के साथ टाटा संस का सबसे बड़ा माइनॉरिटी शेयरहोल्डर है, कंपनी की लिस्टिंग को वैल्यू अनलॉक करने का सबसे व्यावहारिक तरीका मानता है. SP ग्रुप अपने अनुमानित 60,000 करोड़ रुपए के कर्ज का कुछ हिस्सा चुकाने के लिए अपनी होल्डिंग का कुछ हिस्सा बेचना चाहता है. फंड जुटाने के लिए उसके टाटा संस के कुछ शेयरों को गिरवी रखा गया है.

सौरभ शर्मा

सौरभ शर्मा

2008 से शेयर मार्केट, इकोनॉमी और कमोडिटी कवर कर रहे हैं. टीवी9 के साथ जुड़ने से पहले डीएनए, ए​शियानेट, जनसत्ता, दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका जैसे कई बड़े संस्थानों के साथ भी जुड़े रहे.

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